Sagevaani.com @रायपुर। अपनी तरंगों से परिचित होना, अपनी ही लहरों के चरित्र को जानना, इसे कहते हैं अपनी लेश्या से परिचित होना। प्रभु महावीर ने लेश्या, जिसे औरा या आभामंडल भी कहते हैं, इसे समझने का एक तरीका दिया है। वर्ण, गंध, स्पर्श और भाव का मापदंड दिया है। उक्त बातें उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने गुरुवार को लालगंगा पटवा भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही। लेश्या (औरा) से श्रद्धालुओं को परिचित कराने उपाध्याय प्रवर की विशेष प्रवचन माला चल रही है। इस दौरान उपाध्याय प्रवर ने नीच लेश्या का वर्णन किया। उन्होंने कृष्ण, नील और कपोत लेश्या के बारे में विस्तार से बताया। अब वे उच्च लेश्या का वर्णन कर रहे हैं। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। समस्या छोड़ समाधान पर ध्यान लगाओ धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपाध्याय प्रवर ने कहा कि समस्या और समाधान ध्यान से जन्म लेते हैं।...
साध्वी नूतन प्रभाश्री जी और वंदनाश्री जी ने जीवन को पाप मुक्त बनाने का दिया संदेश Sagevaani.com @शिवपुरी। दीपावली के पावन त्यौहार पर अपने घरों की साफ सफाई और अपनी सुख सुविधा का ही ध्यान ना रखें, बल्कि इस पर्व की खुशियों में उन जरुरतमंदों को शामिल करें जिनके घरों में घनघोर अंधेरा है। समाज के ऐसे जरुरतमंद व्यक्तियों के साथ यदि आपने अपनी खुशियां बांटी तो आपका दीपावली का पर्व मनाना सार्थक होगा। इसकी तैयारी अभी से शुरू कर देना चाहिए और देखना चाहिए कि किन के घरों को हम रोशन कर सकते हैं। उक्त उद्गार प्रसिद्ध जैन साध्वी रमणीक कुंवर जी ने पोषद भवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में व्यक्त किए। धर्मसभा में साध्वी नूतन प्रभाश्री जी और साध्वी वंदनाश्री जी ने भगवान महावीर के संदेशों की व्याख्या करते हुए जीवन को पाप मुक्त बनाने का आव्हान किया। धर्मसभा में पुणे, करही, वीणागंज आदि क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ध...
ऊंचे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य के भीतर ललक के साथ उत्साह आवश्यक है। ललक सब में होती है, लेकिन उत्साह के अभाव में अधिकांश लोग उलझ जाते हैं। उपरोक्त बातें आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने श्री सुमतिवल्लभ जैन संघ में प्रवचन देते हुए कही। उन्होंने आगे कहा कि सफलता के लिए किए जा रहे परिश्रम को ठीक से क्रियान्वित करना हो तो ललक के साथ उत्साह बनाए रखिए। लगन और उत्साह का लाभ समय प्रबंधन में मिलता है। सभी बड़ी हस्तियां समय प्रबंधन को साधकर ही सफलता की ऊंचाई तक पहुंची हैं। कार्य कितना महत्वपूर्ण है और उसे किस समय पर पूरा करना है, यह निर्धारित करना बहुत आवश्यक है। अधिकांश लोग ये दोनों बातें निर्धारित ही नहीं कर पाते। यहीं से उलझन शुरू हो जाती है। एक कार्य पूरा होता नहीं कि दूसरा काम हाथ में ले लिया जाता है। जो लोग सफलता के लिए जी-तोड़ मेहनत में लगे हैं, उन्हें यह समझ लेना होगा कि अपनी ललक को ...
यूनिकेम सिस्टम्स श्रृंगार परिवार T20 सीजन-4 क्रिकेट प्रतियोगिता का शानदार समापन Sagevaani.com @चेन्नै : तेरापंथ पारिवारिक संगठन श्रृंगार परिवार के तत्वावधान में आयोजित यूनिकेम सिस्टम्स श्रृंगार परिवार टी-20 सीजन-4 क्रिकेट प्रतियोगिता का फाइनल मैच दर्शकों से भरपूर मुरूगपा क्रिकेट ग्राउंड, आवड्डी में खेला गया। माईटी फाल्कंस व 916 वारियर्स के बीच खेले गए रोमांचक मैच में माईटी फाल्कंस ने 916 वॉरियर्स को 13 रन से हराकर विजेता ट्रॉफी पर कब्जा किया। पहले बल्लेबाजी करने उतरी माईटी फाल्कंस ने निर्धारित 20 ओवर में 6 विकेट खोकर 135 रन की चुनौती पेश की, जिसके जवाब में 916 वॉरियर्स की टीम 9 विकेट पर 122 रन ही बना सकी। वंश कोठरी को मैन ऑफ द मैच तथा विशेष प्रदर्शन के लिए प्रशन खिवेसरा का चयन किया गया। टूर्नामेंट के एमवीपी एवम बेस्ट बेट्समैन वंश कोठारी, बेस्ट बोलर आनंद गेलडा, इमर्जिंग प्लेयर ऑफ टूर्नाम...
प्रवचन 4-10-23 नार्थ टाउन में ए यम के यम स्थानक में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि श्रुत धर्म, चारित्र धर्म दो प्रकार का धर्म है। सर्वविरति धर्म तीन करण, तीन योग से लिया जाता है। ये पच्चकखाण साधु एवं साध्वी के लिये है। मन, वचन, काया इन तीन साधनों से जीव पाप करता है। करवाता है, अनुमोदन करता है। सम्पूर्ण पाप का त्याग कर संसार में जीवन यापन करना बहुत कठिन है। इसलिए भगवान ने आंशिक रूप से धर्म पालन करने के लिए देशविरति धर्म का निरुपण भी किया है। जो पाप करना जरूरी नहीं है उनका त्याग करने का निर्देश दिया। देशविरति धर्म का पालन करने से भी जीवन में पाप कम और धर्म ज्यादा होता है। अचार -पापड की भाँति पाप और मिष्ठान -रोटी की भाँति धर्म करना चाहिए। त्रसकाय की हिंसा करना आवश्यक नहीं है। इसलिए त्रसकाय की हिसां का त्याग और पाँच स्थावर काय जीवन निर्वाह के लिए खुला रखने का निर्देश दिया। किसी ...
किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने ठाणेणं सूत्र की विवेचना करते हुए कहा कि जीवन में अल्प आयुष्य का बंध होने के तीन कारण है। पहला, जो आत्मा अपने जीवन के अंदर प्राणों की विराधना करता हो या उनको पीड़ा देता हो। प्राण दस होते हैं पांच इंद्रियां, मन, वचन, काया, आयुष्य और श्वासोश्वास। दूसरा, जो जीवन में मृषावाद यानी असत्य का सहारा लेता हो, चाहे वह असत्य बड़ई करने के लिए हो या खुद को सच साबित करने के लिए हो। आचार्यश्री ने कहा मृषावाद (झूठ) के चार प्रकार होते हैं, पहला आस्तिक को नास्तिक बोलना, दूसरा नास्तिक को आस्तिक बोलना, तीसरा किसी की मार्मिक या रहस्यमय बात को उजागर करना और चौथा आरोप अथवा इल्जाम लगाना। उन्होंने कहा बासी, अभक्ष्य या कड़ा आहार का सुपात्रदान करना अल्पायुष्य के कर्मबंध का तीसरा कारण होता है। आचार्यश्री न...
Sagevaani.com @रायपुर। लेश्या, या जिसे सरल भाषा में आभामंडल या औरा (aura) कहते है यह व्यक्ति की अंतरात्मा में तरंगें पैदा कर देती है। जिस व्यक्ति का आभामंडल सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर रहता है, लोग उसके प्रति आकर्षित होते हैं। वहीं जिसका आभामंडल नकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है, उससे लोग दूर भागते है। लालगंगा पटवा भवन में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि लेश्या वे विज्ञान का ज्ञान दे रहे हैं। प्रवचन माला में अब तक प्रवीण ऋषि ने नीच लेश्या, या कहें नकारात्मक औरा के बारे में बताया। उपाध्याय प्रवर अब उच्चा लेश्या (सकारात्मक औरा) का वर्णन कर रहे हैं। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। बुधवार को उपाध्याय प्रवर ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सुगति-कुगति, सुमति-कुमति और सद्गति-दुर्गति का आधार लेश्या है। कृष्ण, नील और कपोत लेश्या कुगति, कुमति और दुर्गति का कारण है। इन तीन ल...
श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य के सत्कार्य ही उसके जीवन की सफलता के सार होते है। मानव के चरित्र में अनेक विकृतियां स्वयंकृत अथवा समाज के प्रदूषण से उत्पन्न होती है। मानव यदि विकृतियों से बचा रहता है तभी वह सफलता एवं सुख का अनुभव कर पाएगा। व्यक्ति की किसी भी वस्तु के प्रति आसक्ति उस वस्तु को प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न करती है और वह क्रियाशील हो जाता है। मनुष्य का आत्मसंयमित होना आवश्यक है अन्यथा उसे अनेक बुराइयां दबा लेंगी और वह असफलता के दलदल में धंस जाएगा। यदि संयम के साथ क्रियाशील रहेगा तो आत्मविश्वास सबल रहेगा और उत्साह के साथ अपने कर्म में सफलता प्राप्त कर सकेगा। उत्साह जहां संयमशीलता से किए कर्म के साथ होता है वहीं इसके विपरीत उत्तेजना होती है। उत्ते...
साध्वी जी ने बताया- अहंकार गर्दन में और छलकपट का स्थान दिल में होता है जैन दर्शन में वर्णित 18 पापों का बखान करते हुए साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने मंगलवार को अहंकार और माया पाप पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि छलकपट और प्रपंच को माया कहते हैं तथा इनका इस्तेमाल अच्छाई के लिए भी किया जाए तो उसका परिणाम भुगतना पड़ता है। उन्होंने कहा कि 19वे तीर्थंकर मल्लीनाथ भगवान जब महावत कुमार के भव में थे और उनके साथ उनके छह अन्य मित्रों ने दीक्षा लेकर बेले-बेले (दो उपवास) की तपस्या कर पारणा कर रहे थे। उस दौरान महावत कुमार ने अपने मित्रों से कपट कर उन्हें बताए बिना तीन उपवास की तपस्या कर ली। जिसका परिणाम यह हुआ कि मल्लीनाथ भगवान को स्त्री भव में जन्म लेना पड़ा। धर्म सभा में साध्वी वंदनाश्री जी श्रावक के 21 गुणों पर प्रकाश डाल रही हैं। आज उन्होंने पांचवे गुण मानवता की व्याख्या करते हुए कहा कि श्र...
रिश्ता हो तो इंद्रभूति गौतम और भगवान महावीर सा Sagevaani.com @रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने मंगलवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रभु महावीर ने जीवन में समाधान का स्रोत और समस्या का स्वरुप खोजने के लिए एक महत्वपूर्ण विज्ञान दिया है, जिसे लेश्या कहते हैं। अब तक नीच लेश्या (कृष्ण, नील और कपोत) लेश्या का वर्णन हुआ है। अब उच्च लेश्या (तेजो, पद्म और शुक्ल) लेश्या का वर्णन चल रहा है। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि आज के समय में प्रेम क्यों नहीं टिक रहा है? प्रेम होता है, लेकिन बरक़रार क्यों नहीं रहता? लेश्या विज्ञान कहता है कि जिसकी तेजो लेश्या रहती है, उसका प्रेम अटूट रहता है। और जिसकी तेजो लेश्या नहीं रहती है, वो प्यार तो करता है, लेकिन उसका प्यार टिकता नहीं है। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। लालगंगा पटवा भवन में निरंतर चल रही प्रवचन माला में उपाध्याय...
नार्थ टाउन में ए यम के यम स्थानक में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने फरमाया कि आत्मबन्धुओ धर्म दो प्रकार के आगार धर्म, आणगार धर्म । अणगार धर्म – जो अष्ट कर्मो से मुक्त होने का उपाय करते है वो साधु साध्वी रुप धर्म अणगार धर्म है। आगार धर्म -जो संसार में अभी तक अष्ट कर्मो से युक्त है उनसे मुक्त होने के लिए आंशिक रूप से व्रतों का पालन करता है ऐसे श्राविका -श्राविका धर्म आगार धर्म है । पहले व्रत में सभी व्रतों का समावेश हो जाता है बारह व्रत में मूल और प्रधान व्रत अहिंसा व्रत है जैसे खेत के चारों ओर बाड़ लगायी जाती है वैसे ही अंहिसा व्रत से शेष व्रतों की सुरक्षा होती है पहले व्रत की सुरक्षा के लिए चार व्रत बनाये है जिससे अहिंसा व्रत की सुरक्षा हो सकती है। पहले व्रत की रक्षा के लिए ग्यारह व्रत बनाए हैं। चार अणुव्रत, तीन गुणव्रत, चार शिक्षाव्रत। पहला व्रत के पाँच अतिचार हैं। बन...
गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सुरीश्वरजी महाराज के जन्मदिवस पर आराधना, साधना के कई कार्यक्रम हुए आयोजित किलपॉक श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ के तत्वावधान में उपशम गुणनिधि गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सुरीश्वरजी म.सा. के 56वें जन्मदिवस के उपलक्ष में मंगलवार प्रातः महामंगलकारी श्री गौतमस्वामी सूरिमंत्र महापूजन का आयोजन एससी शाह भवन में हुआ। यह महापूजन संगीत सरगम के साथ एवं विशुद्ध सामग्रियों के साथ संपन्न हुआ। पूजन प्रातः 9:00 बजे प्रारंभ होकर मध्यान्ह 1:00 बजे संपन्न हुआ। सूरिमंत्र की अपनी विशिष्टता है। इस पूजन में पांच पीठिका होती है जिनमें वाणी यानी सरस्वती, त्रिभुवन स्वामी, श्रीदेवी अर्थात लक्ष्मी, गणि पिट्टक और स्वयं गौतमस्वामी विराजमान होते हैं। गौतमस्वामी की आराधना, साधना लौकिक और लोकोतर फल देती है। आचार्यश्री ने सूरिमंत्र अनुष्ठान के दौरान कहा कि सकल संघ की सुंदर आराधना, साधना, शासन ...