श्री सुमतिवल्लभ मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने अपने प्रवचन के माध्यम से कहा कि शब्द के प्रयोग में लालित्य, माधुर्य और विवेक बड़ी साधना है, जो सदा सुवचन बोलता है वह समय पर बरसने वाले मेघ की तरह सदा प्रशंसनीय और जनप्रिय होता है। हम जिन शब्दों का उच्चारण करते हैं उनकी गूंज वातावरण के माध्यम से सामने वाले व्यक्ति के दिमाग में समा जाती है। अगर हम मृदु वचन बोलेंगे तो इनका प्रभाव दूसरे व्यक्ति पर अच्छा पड़ेगा। शब्दों की शक्ति अतुलनीय है। बोलने से पूर्व शुद्धता, विनम्रता और दयालुता को प्रतिबिंबित करने, व्यवहार को प्रभावी बनाने के लिए शब्दों का चयन हमेशा सावधानी से करें। वाणी की कोमलता, शब्दों की मधुरता, स्वभाव की शीतलता, विचारों की सुंदरता और हृदय की विशालता जीवन के सफर को सुमधुर और रिश्तों को सुगंध से भर देती है। वे आगे बोले कि शब्दों की शक्ति का आभास इस बात से लगाया जा ...
भद्रतप तपस्वियों एवं महोत्सव के लाभार्थियों का हुआ सम्मान चंद्रप्रभु जैन नया मंदिर ट्रस्ट, किलपॉक श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ सहित छह विभिन्न जैन संघ के संयुक्त तत्वाधान और गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सुरीश्वरजी की पावन निश्रा में 100 दिवसीय विराट भद्रतप की पूर्णाहुति के उपलक्ष्य में आयोजित महोत्सव के दूसरे दिन शनिवार को तपस्वियों एवं महोत्सव के लाभार्थियों का बहुमान एटकिंसन रोड़ स्थित गौतमकिरण के प्रांगण में हुआ। भद्रतप की शुरुआत 5 जुलाई को हुई थी। महोत्सव में दोपहर दो बजे गांवसांझी एवं मेहंदी वितरण के कार्यक्रम हुए, जिसमें दो हजार से अधिक महिलाओं ने हिस्सा लिया और उनको प्रभावना वितरित की गई। गांवसांझी में ऋषभ बालिका मंडल ने अपनी प्रस्तुति देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। सायंकाल चंद्रप्रभु जैन नया मंदिर में महाआरती एवं प्रभुभक्ति के रंगारंग कार्यक्रम हुए। दक्षिण भारत के इतिहास में...
Sagevaani.com @चैन्नई। वाणी में अमृत भी है और विष भी,शनिवार साहुकारपेट जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा में श्रध्दालुओं को सम्बोधित करतें हुए कहा कि मनुष्य अपने शब्दों मे मधुरता और विवेक नहीं रखता है और कुटता रखता है तो उसका जीवन बर्बाद हो जाऐगा। वचन ऐसे बोलने चाहिए की किसी के भी मन को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए वरना यह वाणी तुम्हारा अपमान करा देगी । इंसान की वाणी ही उसको पहचान और सम्मान दिलाती है। पढ़ लिखकर व्यक्ति कितनी भी डिग्रियां प्राप्त कर लेवें परन्तु उसने अपनी जिह्वा पर संयम और कन्ट्रोल नहीं रखा तो वाणी से वह अपना ही अहित करवा सकता है। किसी के भी प्रति अप्रिय शब्दो का उपयोग न हो जो कुछ भी बोला जाए उसकी अच्छाइयों से संबंधित ही बोला जाए तो इस वाणी से सुनने वाला तो प्रसन्न होगा ही,बोलने वाला भी आनंदित हो जाऐगा। वाणी मे संयम रखने वाला व्यक्ति ऊंचाइयों तक पहुंच जाता है। इसके वि...
हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैंl वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि बी वक्त में काम आए निभाइए प्रतिज्ञा और वचन को प्रभावित शायद के लिए जरूरी हैl अपने द्वारा किए गए वादों को जरूर पूरा करें अगर आप वचन देते हैं तो उसे पूर्ण करने की जिम्मेदारी निभाई जीवन में दिए गए वचन पूर्ण करने के लिए आपकी बुद्धिमत्ता इसी में हैl वचन देखने के पहले हजार दफा सोच लो अपने दिए गए वचन को मारकर भी निभाने की कोशिश करें ली गई प्रतिज्ञा और दिए गए वचन हर हालत में निभाने चाहिएl अपनी ओर से अगली बात कहना चाहती हूं आप अहसानमंद रहे पर किसी का अहसान न जताने की कोशिश ना करें जीवन में किसी से पकड़ कभी कीर्ति धन ना बने और किसी का कुछ करके उसे कृतज्ञ की अपेक्षा भी ना करें ने की कर दरिया में ड...
Sagevaani.com @रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि संकट के समय अगर धर्म का साथ रहेगा तो सफलता के द्वार खुलते हैं। धर्म का साथ रहता है तो सौभाग्य का उदय होता है। धर्म का साथ छोड़ा तो पाप का उदय होता है। धर्म के प्रति आस्था रहेगी तो मनुष्य कभी अपने आप को लाचार नहीं समझेगा। जैसे श्रीपाल की आस्था थी नवकार महामंत्र के प्रति। उसने कभी अपने आप को अकेला नहीं समझा। वह अकेला ही निकला था अपनी पहचान बनाने। उसके साथ मैनासुन्दरी की तपस्या और धर्म के प्रति आस्था थी। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। शुक्रवार को श्रीपाल-मैनासुन्दरी की कथा सुनाते हुए प्रवीणऋषि ने धर्मसभा को कहा की जीवन में संकट नहीं आते, ऐसा हो नहीं सकता। लेकिन संकट के समय आप क्या सोचते हो? आप यही कहते हो कि यह मेरे पिछले जन्मों का पाप है। यह पाप का उदय नहीं है, धर्म का जागरण है, धर्म के प्रति आस्था जगा...
श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि बुरे कर्मो का पुंज पाप है और अच्छे कर्मो का संग्रह पुण्य। परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्। अर्थात् परोपकार करने से पुण्य और परपीडन से पाप मिलता है। पुण्य का पुरस्कार सुख है और पाप का दु:ख। अनुभूत तथ्य है कि संसारी मनुष्य का स्वभाव विरोधाभासी है। वह पुण्य के सुखद फल की तो कामना करता है, किंतु पुण्य कर्म नहीं करना चाहता- पुणस्य फलमिच्छन्ति नेच्छन्ति पुण्य मानवा:। इसी तरह वह पाप के फल को भोगने से बचता है, किंतु बड़ी चतुराई से पाप कर्म करता रहता है- पापस्य फलम् नेच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नत:। उन्होंने आगे कहा कि कर्म की प्रमुखत: तीन कोटियां हैं- सकाम कर्म, निष्काम कर्म और स्वभावज कर्म। कर्ता को उसी कर्म का फल मिलता है, जिसको करने में उसके स्वयं का हाथ होता है। जो कर्म दबाव में क...
साध्वी जी ने बताया कि पापी सुुखी मिलेे तो धर्म पर अविश्वास से पहले समझ लेें कर्म की थ्योरी Sagevaani.com @शिवपुरी। मेेरे दाता के दरबार में सब लोगों का खाता है,जो जैसी करनी करता वैसा फल पाता है। उक्त भजन का गायन कर साध्वी नूतन प्रभा श्री जी ने कमला भवन में आयोजित धर्म सभा में कहा कि इस संसार में न्याय करने वाला सिर्फ ईश्वर है क्योंकि वह सब कुछ जानता है। उसे न तो सबूत और न ही गवाह की जरूरत है। उसकी लाठी में आवाज भी नहीं होती। साध्वी बंदना श्री जी ने बताया कि संसार में जिसने परमात्मा की शरण स्वीकार कर ली उसे औेर किसी शरण तथा सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ती। धर्मसभा में इंदौर से पधारे श्रावकों ने गुरूणी मैया के दर्शन और बंदन कर उनसे आशीर्वाद लिया। धर्म सभा में साध्वी नूतन प्रभा श्री जी ने बताया कि अक्सर लोग सवाल करते हैं कि संसार में जो बुरा काम कर रहा है, घोर पापी है, सारे नम्बर दो के काम कर रहा...
भद्रतप की सफल पुर्णाहुति पर तीन दिवसीय महोत्सव शुरू हुआ चेन्नई महानगर के छह जैन संघों के संयुक्त तत्वावधान और आचार्यश्री उदयप्रभ सुरीश्वरजी एवं आचार्यश्री युगोदयप्रभ सुरीश्वरजी के पावन सान्निध्य में सौ दिवसीय विराट भद्रतप की सफल पुर्णाहुति के उपलक्ष में तीन दिवसीय महोत्सव का आगाज हुआ। महोत्सव के दौरान परमात्म भक्ति स्वरूप शक्रस्तव महाभिषेक का आयोजन शुक्रवार प्रातः चंद्रप्रभु जैन नया मंदिर में संपन्न हुआ, जिसमें इंडियन आइडल सुप्रसिद्ध संगीतकार शिवमसिंह, उमंग भावसार और धीरज निब्जिया ने संगीत की मार्मिक प्रस्तुति देकर उपस्थित भक्तगणों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस मौके पर आचार्यश्री उदयप्रभ सुरीश्वरजी म.सा. ने उद्बोधन में कहा कि भद्रतप करके अपने मन, वचन एवं काया से किए हुए अनेक पापों एवं दोषों का निवारण हुआ है, परंतु इस भद्रतप के बाद हमें हमारा स्वभाव ‘भद्र’ बनाना होगा। ‘भद्र...
नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि देश विरति – जो ग्रहस्थ के अन्दर रहकर धर्म का पालन करते है सर्वविरति जो पंच महावत धारी है जो संयम लेकर धर्म का पालन करते हैl दोनों ही आत्मा के रज मैल धोने का काम करती है चार व्रतो को समझा, पाचंवा है परिग्रह। 9 प्रकार के परिग्रह है। शरिर के प्रति भी आसक्ति है, ममत्व है तो वह भी परिग्रह है शरीर के प्रति बहुत राग रहता है चाहे वो कैसा भी हो, वृद्ध हो, रोगी हो, चाहे कैसा भी पाप क्यों न हो, वह करने के लिए तैयार हो जाता है संसार के सारे पाप शरीर के लिए है। शरीर के प्रति लगाव है तो दिन रात आरम्भः समारम्भ करते है। शरीर का ख्याल रखते है आत्मा की चिन्ता नहीं करते है कितनों ने शरीर से ममत्व घटाया तो आत्मा का मेल दूर हो गया। ज्ञानीज़न कहते हैं शरीर के ममत्व को छोड़ो क्योंकि शरीर कभी भी धोखा दे सकता है आत्मा का ख्याल रखो। आत्मा कभी भी छोड़के...
Sagevaani.com @चैन्नई। घमंड जीवन मे दौलत का हो या शोहरत या शरीर का जब उतरता है तब इंसान न घर का रहता है और नाही बाहर का रहता हैं। शुक्रवार साहुकार पेट के जैन भवन मे महासती धर्मप्रभा ने अनेक भाई और बहनों को धर्मसभा में सम्बोधित करते हुए कहा कि मनुष्य जीवन मे कितना ही करोड़पति और अरबपति बन जाए लेकिन उसमें दया, परोपकार करूणा और मानवता की भावना नहीं है तो ऐसा व्यक्ति महान नहीं बन सकता है। दौलत से कौई भी व्यक्ति बड़ा नहीं बनता अपने आचरण,व्यवहार और अपने गुणों से महान बनता है। इस धरती पर अपनी दौलत और शक्ति का अंहकार और घमंड करने वाले न जाने कितने राजा और महाराजा शमशान की राख बनकर धरती की मिट्टी मे मिल चुके है। फिर साधरण मनुष्य की इस संसार क्या हैसियत है जो वो तुच्छ वस्तुओं और दौलत पर इतना अभिमान और घमंड करता है मरते वक्त ना दौलत साथ जाने वाली है और ना ही परिवार साथ मे जाने वाला है मनुष्य सही समय पर...
नवकार महामंत्र की शक्ति को ग्रहण करने की आराधना है नौपद की ओली Sagevaani.com @रायपुर। श्रीपाल-मैनासुन्दरी की कथा सुनाते हुए उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि 700 कुष्ठ रोगियों ने तो साधना नहीं की थी, लेकिन वो ठीक कैसे हो गए? यह ताकत थी अनुमोदन की। मैनासुन्दरी ने केवल पानी छिटका था, और कुष्ठ रोग दूर हो गया। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि कार्य करने से भी होता है, कराने से भी होता है और समर्थन से भी होता है। जिनशासन में ३ करण है : मन से, काय से और वचन से। मन से करवाना, मन से करना और मन से अनुमोदन देना। केवल मन से एक अकेले का अनुमोदन क्या कर सकता है, क्या ताकत होती है, यह इस कहानी से पता चलता है। अनुमोदन को समझने के लिए इसे आप आशीर्वाद का सामर्थ्य कह सकते हैं। आगम में अनुमोदन का अर्थ है आशीर्वाद। जो करने, करवाने से नहीं होता वह आशीर्वाद से होता है। देने का सामर्थ्य होना चाहिए। जिसे दिया जाता है, ...
भद्रतप तपस्वियों के पारणोत्सव पर तीन दिवसीय समारोह शुक्रवार से किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. ने ज्ञाता धर्मकथा के अंतर्गत भावनगर के कनक राजा के प्रधान मंत्री केतलीपुत्र के चरित्र के दृष्टांत की विवेचना करते हुए कहा कि वैभव और सत्ता के साथ विवेक का मिलना दुष्कर है। संसार के साथ धर्म का मिलना दुष्कर है। गुरुदेव ने कहा दृष्टांत यानी जो हमें नया दृष्टिकोण दे। इसका दूसरा अर्थ है उदाहरण। परमात्मा की बातों को जो ऊपर ले जाए, उन्हें उदाहरण कहते हैं। अनंतकाल के इतिहास में अनंत घटनाएं होती है। प्रेरणा पाने के लिए संवाद खड़ा करना पड़ता है। आचार्य प्रवर ने आगे कहा कि बहुत बार आवेश की दवा एक ही दो अक्षर की दवा प्रेम होती है। लेकिन उसकी जगह पर हम तो दूसरी दवाओं का उपयोग करते हैं। जो व्यक्ति अप...