किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि पयन्ना आगमों में वैराग्य के प्रबल भावों के बारे में बताया है। अमुक चुनंदे ही श्रावक, आराधक आदि आत्माओं को भी गुरु की आज्ञा से ही पयन्ना आगमों को पढ़ने का अधिकार दिया गया है। इन आगमों में मनुष्य सौ साल में किस तरह दस अवस्थाओं से गुजरता है, उसका भी वर्णन है। गर्भावस्था और जन्म के बाद आहारचर्या का वर्णन भी इनमें आता है। उन्होंने कहा शरीर का सबसे सेंसिटिव भाग गला है। शरीर में 99 लाख रोमकूप और साढ़े तीन करोड़ रोमराजी व्याप्त है। मानव बारह साल तक मां की कोख में रह सकता है लेकिन नौ महीने रहने से स्वस्थ रहता है। परमात्मा के अतिशय के बारे में उन्होंने बताया कि परमात्मा जहां विचरण करते हैं, उसका प्रभाव होता है कि वह क्षेत्र शुद्ध बन जाता है। रास्ते के कांटे भी उल...
लालगंगा पटवा भवन में जैन धार्मिक शिक्षण बोर्ड के परीक्षा परिणाम घोषित Sagevaani.com @रायपुर। धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि कथा के माध्यम से जीवन के सत्य को पहुँचाने का काम होता है। श्रीपाल-मैनासुन्दरी की कथा उतार-चढ़ाव से भरी हुई है। इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि कितनी भी कठनाई आये, अपनी श्रद्धा कभी टूटने मत देना। श्रीपाल को नवकार महामंत्र पर विश्वास है, और मैनासुन्दरी को श्रीपाल पर विश्वास है। कथा को लेकर कई सवाल भी आते हैं, जैसे श्रीपाल ने कुबड़े का रूप क्यों धरा? वह सामान्य रूप में भी तो जा सकता था? फिर उसने यह स्वांग क्यों रचा? उसने सभा में सबके गहने क्यों चुराए? और चुराने के बाद गहनों को वापस क्यों रख दिया? ऐसे कई सवाल धर्मसभा में पूछे गए। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि यह कथा है, और इसमें रस भरने के लिए नाटक करने पड़ते हैं। श्रीपाल ने कुबड़े का रूप क्यों ब...
संघ अनुशास्ता आचार्य भगवंत पुज्य श्री विजयराजजी महाराज साहब का 65 वां जन्मदिवस दिनांक 18-10-2023 को श्री SS जैन संघ, नोर्थ टाउन के तत्वावधान में श्री साधुमार्गी शांत क्रांति जैन श्रावक संघ, चेन्नई द्वारा श्रद्धेय महाराज साहब श्री जयतिलक मुनि जी के सानिध्य में ए यम के यम स्थानक नार्थ टाउन में जन्मोत्सव का कार्यक्रम जप, तप, त्याग से मनाया गया। गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आज का दिवस आचार्य विजयराज जी का 66 वीं जन्म जयन्ती का दिवस है आचार्य विजयराज जी में चुम्बकीय आकर्षण था वे शरीर से सम्पन्न आचार्य पद पर सुशोभित थे। शोभा तब होती है जब व्यक्ति पद के योग्य होता है। यदि व्यक्ति एक बार ह्रदय में बैठ गया तो उसे बाहर नहीं निकाला जा सकता। आचार्य विजयराज का भक्तों के हृदय में वास उनके गुणों के कारण है। ये पद पाना एक पुण्यवाणी है। उनका नाम भी भक्त हृदय से लेता है। उनके आगे सभी नतमस...
Sagevaani.com @चैन्नई। आत्म साधना के लिए प्रमाद न करें। प्रमाद ही आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु है। बुधवार साहुकार पेट जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने श्रावक-श्राविकाओं से कहा कि मनुष्य का क्षण मात्र का प्रमाद उसके जीवन प्रयाय मे की गई साधना को मिट्टी में मिला देता है और उसकी आत्मा को नरक गति दिलवा देता है। इंसान को शरीर की चिंता होती है, परन्तु आत्मा की चिंता नहीं ।शरीर की शोभा पसंद आती है परन्तु आत्मा की शोभा नहीं। शरीर को कुछ भी नहीं होना चाहिए यही सोचकर मनुष्य आत्मा के लिए कुछ भी नहीं करता है वह प्रमाद मे रहकर साधना करता है तो उसे साधना का प्रतिफल नहीं मिलने वाला है। साधना आत्मा के लिए होगी तभी मनुष्य अपनी आत्मा को मोक्ष दिलवा सकता है आज तक हमारी आत्मा ने जितना पुरुषार्थ संसार के सुख को प्राप्त करने के लिए किया है अगर व्यक्ति ने अपने शरीर को छोड़कर अपनी आत्मा को मोक्ष दिलवाने केलिए वह साधना क...
लालगंगा पटवा भवन में जारी है श्रीपाल-मैनासुन्दरी की कथा Sagevaani.com @रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि नवकार महामंत्र की क्या महिमा है, यह हमें श्रीपाल-मैनासुन्दरी की कथा बताती ही। यह कथा हमें लेश्या के चरित्र के बारे में भी बताती है। नीच और उच्च लेश्या में क्या अंतर है, ये हम श्रीपाल और धवल सेठ के चरित्र से समझ सकते हैं। नीच लेश्या वाला कभी किसी की सफलता से खुश नहीं होता, उसके मन में ईर्ष्या की भवन उत्पन्न होती है। सत्कार भी उसे तिरस्कार प्रतीत होता है। श्रीपाल की सफलता धवल सेठ को हजम नहीं होती है, वह तो इसी ताक में रहता है कि कैसे मैं श्रीपाल को अपने रास्ते से हटाऊँ? वहीं श्रीपाल धवल सेठ को सम्मान देता है, पितातुल्य मानता है, उसकी सहायता करता है, लेकिन कहते हैं न कि नीच लेश्या वाले को फूल भी कांटे की तरह चुभते हैं, इसलिए मौका मिलते ही धवल सेठ श्रीपाल को नाव से धक्का दे देता ...
Sagevaani.com @रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि ऐसा जीवन जीना चाहिए कि आपका अस्तित्व आपका कुल बता दे। जैसे श्रीपाल का जीवन है। श्रीपाल अकेला ही सफर पर निकला था, लेकिन उसकी शुभ लेश्या उसके साथ थी। नवकार महामंत्र की शक्ति के बल पर उसने कई कार्य किए, जिसके कारण उसका जीवन एक उदाहरण बन गया। सोमवार को लालगंगा पटवा भवन में श्रीपाल-मैनासुन्दरी की कथा को आगे बढ़ाते हुए उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने बताया कि धवल सेठ के साथ श्रीपाल समुद्री यात्रा पर निकल पड़ा। समुद्र के रास्ते दोनों बब्बरकूल नगरी पहुंचे। यहां धवल सेठ व्यापर करने लगा। लेकिन लालच वश सेठ ने कर चोरी की, राज्य का टैक्स नहीं पटाया तो सैनिकों के उसे पकड़ लिया। इस दौरान उसने राजा महाकाल के कर्मचारियों पर हमला भी कर दिया, तो राजा के आदेश से सैनिकों ने उसके सभी जहाज और सारा सामन जब्त कर लिए। श्रीपाल तो अपना मजे से नगर भ्रमण कर रहा था, ज...
जैन साध्वी ने बताया कि बुरे स्वभाव वाला व्यक्ति खुद दुखी होता है और दूसरों को भी दु:खी करता है Sagevaani.com @शिवपुरी ब्यूरो। सामान्य तौर पर कर्मों के फल के कारण इंसान दु:खी होता है लेकिन आज कल देखने में यह आ रहा है कि लोग कर्मों के कारण नहीं बल्कि अपने स्वभाव के कारण दु:खी हो रहे है। यदि वह अपना स्वभाव सुधार लें तो दु:ख से मुक्ति से संभव है। बुरे स्वभाव वाला व्यक्ति न केवल खुद दु:खी होता है बल्कि दूसरों को भी दु:खी करता है। उक्त प्रेरणास्पद उदगार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने स्थानीय कमलाभवन में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। धर्मसभा में साध्वी जयश्री जी ने इस जहां में कर्मों का फल पाना होता है, प्रेम जिसको पाना होता है भजन का गायन किया। नवरात्रि के तीसरे दिन मंगलवार को जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने बताया कि मंगल धैर्य, साहस और बल का प्रतीक है। उन्होंने कहा इसी कारण मंगलवार क...
किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने 45 आगमों का विश्लेषण करते हुए कहा कि अंग और उपांग आगम विश्व व्यवस्था देने के स्रोत है। अंग की बातों को थोड़े से विस्तार से समझने का कार्य उपांग करते हैं। आत्मा की शुद्धि का विश्लेषण और व्यवहार छह छेद आगम के अंदर है। उन्होंने कहा तीर्यंच के जीवों की संख्या अन्य गति के जीवों से अधिक होती है, निगोद के जीव भी तीर्यंच में आते हैं। मानवभव इसीलिए प्रशंसनीय है कि यहां अच्छे निमित्त ज्यादा और बुरे निमित्त कम मिलते हैं। देव भव में बुरे निमित्त ही होते हैं। छेद पापों का विनाश करता है। पाप तीन होते हैं वर्तमानकाल के पाप, भूतकाल के पाप और भविष्यकाल के पाप। आत्मा में भूतकाल के पाप सबसे ज्यादा रहे हुए हैं। भविष्य के पापों को अटकाने की ताकत हमारे अंदर है। वर्तमान में पाप को खत्म करने के ल...
नार्थ टाउन में विराजमान गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि गृहस्थ के पांच समिति तीन गुप्ति का निर्देश नहीं है पर विवेक पूर्वक प्रवृत्ति करने व 12 व्रत का पालन करने से उनकी भी संयम आराधना होती है। दो प्रकार के परिग्रह होते है । 9 बाह्य परिग्रह होते है। साधन प्राप्त होने पर भी यदि बिना आसक्ति के उनका भोग किया जाये तो केवल ज्ञान, केवल दर्शन की प्राप्ति हो सकती है। भिखारी के पास कुछ नहीं है फिर भी वे परिग्रही है उसकी इच्छाएँ अनन्त है, कामनाएं है, आसक्ति है इसलिए वे अपरिग्रही नहीं है। 14 प्रकार के आभ्यन्तर परिग्रह है। जहाँ कर्म बन्ध है वहाँ परिग्रह है। सबसे ज्यादा पाप परिग्रह से होते है यदि परिग्रह छूट गया आसक्ति छूट गई तो पाप का सेवन अपने आप छूट जाता है। इसलिए बाह्य के साथ आभ्यन्तर परिग्रह का भी त्याग करना चाहिए जिस धर्म में हिसां को हिसां पाप को पाप माना जाये वो ही सम्यक धर्...
सुखी, सफल और स्वस्थ जीवन के लिए नियमितता एवं समयबद्धता जरूरी है। इनके बिना कोई भी व्यक्ति अपने कर्तव्य का पालन सुचारू ढंग से नहीं कर सकता। आज व्यक्ति का जीवन असंतुलित एवं दिग्भ्रमित है। आर्थिक समृद्धि की दौड़ में जीवन की धारा एकांगी हो रही है। भौतिक सुखों के आकर्षण में जीवन के अन्य महत्वपूर्ण पक्ष गौण हो रहे हैं। इसकी वजह से जीवन समस्याग्रस्त हो रहा हैl उपरोक्त बातें श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन संघ में प्रवचन देते हुए पूज्य आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कही। उन्होंने आगे कहा कि कल नहीं आज सफलता का परम मंत्र है। हमें जीवन के हर क्षेत्र में इसका अनुसरण करना चाहिए। भूतकाल इतिहास है, भविष्य रहस्य है, वर्तमान उपहार है। इसलिए वर्तमान को प्रेजेंट कहते हैं। हमें आज के प्रति वफादार और जागरूक बनना चाहिए। जो आज को सार्थक बनाता है, उसके भूत और भविष्य दोनों सफल बन जाते हैं। जीवन की असफलता के जो का...
Sagevaani.com @चैन्नई। मोक्ष की प्राप्ति का चरण है सम्यक ज्ञान।मंगलवार साहुकारपेट जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को सम्बोधित करतें हुए कहा कि मनुष्य ने ज्ञान प्राप्त कर लिया और आचरण मे बदलाव और सुधार नहीं आता है तो उसका समस्त ज्ञान और चारित्र मिथ्या है और उसके ज्ञान का कौई भी मतलब और अर्थ नहीं है। जैसे अंक बिना बिन्दुओं की लम्बी लकीर बना देने पर भी,उसका कोई अर्थ नहीं निकलता है। उसी प्रकार ज्ञान आ जाए और आचरण और चारित्र में हमारे बदलाव नहीं आता है तो ज्ञान का कौई मतलब नहीं है ज्ञान और चारित्र के बिना आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता है ज्ञान और चारित्र जो मनुष्य प्राप्त कर लेता है उसका ज्ञान सम्यक ज्ञान बन जाता है वही आत्मा संसार से मोक्ष प्राप्त कर सकती है। साध्वी स्नेहप्रभा ने उत्ताराध्यय सूत्र के बतीस अध्याय की दुसरी गाथा का वर्णन करतें हुए कहा कि सम्यक दर्शन अर्...
Sagevaani.com @चेन्नई . श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पूज्य आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि आत्मविश्वास मनुष्य के अंदर ही समाहित होता है। बस जरूरत है अपने अंदर की आंतरिक शक्तियों को इकट्ठा कर अपने आत्मविश्वास को मजबूत करने की। जीवन में सफलता के लिए आत्मविश्वास उतना ही आवश्यक है, जितना मनुष्य के लिए ऑक्सीजन और पानी। बिना आत्मविश्वास के व्यक्ति सफलता की ऊंचाइयों पर कदम बढ़ा ही नहीं सकता। आत्मविश्वास बनाने में समय और अभ्यास लगता है। इसमें यथार्थवादी लक्ष्य निर्धारित करना, उपलब्धियों का जश्न मनाना और असफलताओं से सीखना शामिल है। याद रखें, गलतियाँ हर कोई करता है, लेकिन मायने यह रखता है कि हम उनसे कैसे सीखते हैं। आत्मविश्वास वह ऊर्जा है, जो सफलता की राह में आने वाली हर अड़चनों, कठिनाइयों और परेशानियों से मुका...