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सुख ऐसा होना चाहिए, जो सबको सुख दे – मुनि ध्यानप्रभ विजय

योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी के शिष्य मुनि ध्यानप्रभ विजयजी ने प्रवचन में कहा कि सम्यक् दर्शन का अर्थ है भगवान की वाणी के ऊपर पूर्ण श्रद्धा रखना। सम्यक् दर्शन को पारसमणि, चिंतामणि, चंद्रकांतमणि आदि की उपाधि दी गई है। उन्होंने कहा सम्यक् दर्शन होने के बाद ही हमारे भव शुरू होते हैं। परमात्मा के उपकार से हमें दुर्लभ मनुष्य भव मिला है। मनुष्य भव ही एक हैं जिसमें हम आराधना – साधना कर अनादिकाल से हमारे अंदर भरे कुसंस्कारों, पापों को तोड़ सकते हैं। मनुष्य भव में हम दुर्जन भी बन सकते हैं और सज्जन भी बन सकते हैं, साधु भी बन सकते हैं परमात्मा भी बन सकते हैं। मानव को पांच इंद्रियों, स्मरण शक्ति, मन की शक्ति आदि मिली है, यदि वह इनका सदुपयोग करे, तो वह अपने लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। हम सोचते हैं, संसार में बहुत सुख है लेकिन संसार...

संकल्पित मन कभी ध्येय से नहीं डिगता: देवेंद्रसागरसूरि

आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन श्वेतांबर संघ में प्रवचन देते हुए कहा कि दृढ़तापूर्वक किया गया निश्चय संकल्प कहलाता है। संकल्पजनित् दृढ़ता ही संकल्प को वह बल प्रदान करती है कि संकल्पी अपने लक्ष्य के प्रति आस्थावान बना रहता है और उसे पाने के लिए अपने कर्म की अग्नि जगाए रखता है। दृढ़ता के कारण ही व्यक्ति अपने लक्षित कर्म से विचलित नहीं होते। वे निरंतर कर्मलीन रहते हुए अपना उद्देश्य समय से पूरा करना चाहते हैं। हर कोई अपने अभीष्ट कार्य अपने ढंग से करता है। किसी को पूर्ण सफलता मिलती है, किसी को आंशिक तो किसी के हाथ असफलता ही लगती है। आंशिक सफलता या असफलता के कारण बहुतेरे कार्य छोड़कर बैठ जाते है तो कुछ नये कार्य को लक्ष्य बना उसकी ओर उन्मुख हो जाते है। कभी-कभी एक के बाद एक कार्य बदलते रहने के कारण उनकी स्थिति अस्थिर और सोचनीय हो जाती है कि वे अपने को अभागा तथा दूस...

बने चरण हमारे ऐसे कि जिस राह पर कदम रखें वह राह मंगल हो जाए : प्रवीण ऋषि

लालगंगा पटवा भवन में बह रही महावीर के अंतिम वचनों की अमृत गंगा Sagevaani.com/रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि मंगल राहों पर चलने वाले बहुत होते हैं, लेकिन जहाँ-जहाँ चरण धरें वह राह मंगल हो जाए, ऐसे चरणों को संत चरण कहते हैं। सोमवार को लालगंगा पटवा भवन में जारी श्रीमद उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के सप्तम दिवस उपाध्याय प्रवर ने उत्तराध्ययन सूत्र के 11, 12 एवं 13 वें अध्याय के पाठ किया। आराधना के पूर्व आज के लाभार्थित परिवार विजय कुमार तरूण कुमार बसंत कुमार विनोद कुमार कटारिया परिवार, हरिलालजी रमणीकलालजी सिसोदिया (सेठ) परिवार, आशा यशवंत पुंगलिया परिवार ऋतु महावीर सुराना परिवार चेन्नई, राजेंद्र-माया, डॉ. यश, महिमा सेठिया परिवार ने धर्मसभा में आने वाले श्रावकों का तिलक लगाकर स्वागत किया। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवी...

आत्मा को साधने पर परमात्मा मिल जाता है: साध्वी स्नेहप्रभा

Sagevaani.com/चैन्नई। परमात्मा की शरण मे जाने से पहले मनुष्य को स्वंय की आत्मा की शरण में जाना पड़ेगा। तभी वह परमात्मा तक पहुंच सकता है। सोमवार को साहुकारपेट जैन भवन साध्वी स्नेहप्रभा ने श्रीमद उत्तराध्ययन सूत्र के तेरहवें अध्याय अज्झयणं चित्तसंभूइज्जं पाठ का वर्णन करते हुए श्रध्दांलूओ से कहा कि संसार मे आत्मा से बढ़कर कुछ भी नहीं है। और मनुष्य संसारिक और भौतिक वस्तुओं से परमात्मा को प्राप्त करना चाहता है जबकि आत्मा को साधने बिना परमात्मा से आत्मा का मिलन नहीं हो सकता है। वही व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त कर सकता है जिसने स्वंय की आत्मा को साध लिया तो वह परम् पिता परमेश्वर से अपनी आत्मा का मिलन करवा सकता है। इस आत्मा को संसार से मुक्ति दिलवा सकता है। महासती धर्मप्रभा ने अंजना चारित्र का वांचन करते हुए कहा कि इंसान के कर्म ही उसके भाग्य की रचना करते हैं। लेकिन संसार मे भाग्य सभी के एक जैसे नहीं...

समाज के बगैर व्यक्ति का अस्तित्व उतना ही है जितना किसी पेड़ से पृथक हुए पत्ते का हैं: देवेंद्रसागरसूरि

मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है इसका अर्थ है मानव समाज के लिए है तथा समाज मानव के लिए हैं. दोनों का अस्तित्व पूरी तरह से एक दूसरे पर आश्रित है पूरक हैं. उपरोक्त बातें श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन देते हुए कही, वे आगे बोले कि मानव ने स्व भावना का त्याग कर पर भावना को आधार बनाकर समाज बनाया तो समाज ने भी मानव के सर्वांगीण विकास में अहम भूमिका अदा की. इस तरह समाज व परिवार एक दूसरे से अभिन्न बन गये. किसी राष्ट्र या वर्तमान के देशों का स्वरूप भी इसी तरह निर्मित हुआ, व्यक्ति से समाज, समाज से नगर और नगर से छोटे छोटे राज्य और राष्ट्र का निर्माण हुआ. समाज के बगैर व्यक्ति का अस्तित्व उतना ही है जितना किसी पेड़ से पृथक हुए पत्ते का हैं. व्यक्ति अपना चहुमुखी विकास समाज में रहकर, उसके संसाधनो का उपयोग करके, सुविधाओं का उपभोग करके...

विकट परिस्थिति में भी धर्म के प्रति श्रद्धा कम नहीं होनी चाहिए: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी महाराज

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. ने नवपद के गुणों की विवेचना करते हुए कहा कि अरिहंत परमात्मा का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे मार्गदर्शक है। मार्गदर्शक यानी यथार्थ प्ररूपणा, स्यादवाद ‌आदि। यह कार्य कोई दूसरा नहीं कर सकता। ज्ञानावरणीय कर्मों का क्षय होने पर ही परमात्मा केवलज्ञानी बन सकते हैं। वे जीवात्मा की पात्रता, सामर्थ्य और समय देखकर उसे धर्म का मार्ग बताने की प्रेरणा देते हैं। सिद्ध भगवंतों का गुण है कि वे अविनाशी है। अविनाशी यानी जिस सुख का कभी विनाश न हो। उन्हें अंदर का आनंद ही रहता है। जो सुख आने पर कभी जाता नहीं हो। आचार्य का गुण आचार शुद्धि व आचार संपन्नता है। ज्ञानी कहते हैं ज्ञान दिखता नहीं है, आचार दिखता है। उपाध्याय का गुण विनय होता है। साधु का गुण यह होता है कि वे ज्ञान, तप, प्रवचन, भक्ति में म...

चार अंग संसार में दुर्लभ है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन के ए यम के यम स्थानक में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बंधुओ :- चार अंग संसार में दुर्लभ है। पहला है मनुष्य जन्म, ये मनुष्य जन्म अनन्त -2 समय तक संसार में परिभ्रमण कर, प्रबल पुण्यवाणी होने पर पाता है। निगोद में जीव एक समय में 17 बार जन्म-मरण करता है। फिर भी मुक्त नहीं हो पाता। इतने जन्म-मरण के बाद भी निगोद में जीव को रहना पड़ता है । भयंकर वेदना निगोद मे मिलती है। ऐसी वेदना को सहन करते हुए जीव अकाम निर्जरा करता है। पुण्यवाणी को बढ़ाता है। पुण्यवाणी होने पर भी जीव आसानी से व्यवहार राशि में नहीं आ पाता। जब संसार से एक जीव मुक्त हो मोक्ष में जाता है तब निगोद से एक जीव व्यवहार राशि में आता है। मोक्ष की ओर ले जाने वाला और संसार से तारने वाला एक मात्र धर्म ही है । धर्म-ध्यान सिर्फ मनुष्य गति में ही कर सकते है। व्यवहार राशि में भी आने पर जीव स्थावर काय, तिर्यंच इन सबक...

रजत द्वारा आयोजित राजस्थानी बाजार सफलतापूर्वक संपन्न

राजस्थानी एसोसिएशन तमिलनाडु (रजत) की ओर से राजस्थानी बाजार की शुरुआत 28 व 29 अक्टूबर को किलपाक स्थित सेंट जार्ज स्कूल के विंग्स कन्वेशन सेंटर में की गई। मुख्य अतिथि तमिल सिनेमा की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री कलैमामणी सुकन्या रमेश एवं विशिष्ट अतिथि नीलिम रानी एवं रेफेक्स इंडस्ट्रीज के डाइरेक्टर जगदीश बूरड़ ने फीता काट कर बजार का शुभारंभ किया। अध्यक्ष मोहनलाल बजाज ने सभी का स्वागत किया। राजस्थानी बाजार में राजस्थानी संस्कृति की झलक देखने को मिली। शनिवार को शाम होते होते बड़ी संख्या में खरीदार उमड़ पड़े। इस दिन मिडनाइट तक शापिंग हुई। रविवार तक चलने वाले इस बाजार का विशेष आकर्षण राजस्थानी कल्चरल शो रहा। बाजार में एयरकंडीशन्ड हाल में ज्वेलरी के लिए बनाया गया। विजिटर फैशन, डेकर, एक्सक्लूसिव पैवेलियन बनाया गया। राजस्थानी बाजार में एक सौ पचास से अधिक स्टाल थे। राजस्थानी प्रदर्शनी में रविवार को बड़ी संख्य...

वृद्धावस्था तथा बीमारी की स्थिति में सिर्फ धर्म की शरण ही मिलती है: साध्वी नूतन प्रभाश्री

साध्वी जी ने बताया कि ढाई हजार वर्ष वाद भी प्रासंगिक है भगवान महावीर की वाणी Sagevaani.com/शिवपुरी। भगवान महावीर स्वामी ने उत्तराध्यन सूत्र में फरमाया है कि अपने असंस्कृत जीवन पर लेश मात्र भी प्रमाद न करो। जब वृद्धावस्था का प्रकोप आता है तथा शरीर पर रोगों का आक्रमण होता है। उस समय कोई रिश्तेनाते काम नहीं आते। सिर्फ धर्म की शरण ही काम आती है। इसलिए समय से पहले धर्म को अपने जीवन का अंग बना लो। उक्त बात साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने जिन वाणी का वाचन करते हुए व्यक्त की। इससे पूर्व साध्वी जयश्री जी ने प्रभू महावीर की वाणी सभी दुखड़े मिटाती है, भजन का गायन कर श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने अपने संबोधन में कहा कि जिनवाणी चाहे मन से सुनो अथवा विना मन से सुनो वह दोनों ही स्थिति में कल्याणकारी होती है। उन्होंने कहा कि पुण्यात्मा वह होता है जो जिन वाणी सुनने के लिए तैयार र...

जीवन में जलाए आत्म जागरण का दीप: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि जीवन में जलाए आत्म जागरण का दीप मेरी प्रभु जीवन के अच्छेयों को बाद में देखना पहले बुराइयों का सामना तो कर लो जीवन में जो अंधकार समय है उसे रख लो अस्त प्रवृत्तियों को भली-भांति पहचान लो ऐसा कर लेने पर संसार में रहकर भी तुम आनाशक्त जीवन की सकोगेl अनासक्ति जीवन शरीर संबंध के साथ नहीं है और नहीं लाल पीले सफेद वस्तुओं के साथ हैl इन श्वेत वस तोको धारण करके भी व्यक्ति आ सकती के कीचड़ में जी सकता हैl इन रंगीन वेस्टन के साथ भी व्यक्ति आना शक्ति योगी हो सकता है संसार में ऐसे जियो जैसे कीचड़ में कमल पैरभले ही संसार में हो पर मस्तिक आकाश में रहना चाहिएl आपने देखा व्यक्ति 70 वर्ष का हो जाए तब भी मेर...

आत्मा का कल्याण ज्ञान दर्शन चारित्र की साधना से होगा: महासती धर्मप्रभा

Sagevaani.com/चैन्नई। आत्मा का कल्याण ज्ञान दर्शन चारित्र से ही होगा। रविवार साहुकारपेट जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने स्वाध्यायो के सम्मान समारोह मे श्रध्दांलूओ को सम्बोधित करते हुए कहा कि जिस मनुष्य मे ज्ञान दर्शन और चारित्र के गुण नहीं वह जीवन का निर्माण और आत्मा का कल्याण नहीं करवा सकता है। ज्ञान दर्शन और चारित्र की आराधना करने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। साध्वी स्नेह प्रभा ने श्रीमद उत्तराध्ययन सूत्र के बारवें अध्याय का अर्थ बतातें हुए कहा कि मनुष्य की पहचान जाति से नहीं उसके आचरण व्यहवार और गुणों होती है। जाति मनुष्य कितनी भी निची क्यों न हो पर कर्म अगर उसके उच्च के है तो ऐसे साधक पुरूष को जाति का बंधन भी मुक्ति के मार्ग मे बाधा नहीं बनता है और ऐसे सिध्द पुरूष को देवता भी शीश झुकाते है और उसके गुणागान करते है। साहुकार पेट श्रीसंघ के कार्याध्यक्ष महावीरचन्द सिसोदिया ने...

इंसानियत के पैमाने पर खरा उतरकर अपने मानव जीवन को करें सार्थक: साध्वी नूतन प्रभाश्री

 जिन वाणी का वाचन करते हुए साध्वी जी ने बताया कि मनुष्य होना आसान है, लेकिन मनुष्यत्व होना मुश्किल Sagevaani.com/शिवपुरी ब्यूरो। दीपावली की रात्रि को भगवान महावीर दो दिन की धर्मदेशना के पश्चात मोक्ष को प्राप्त हुए थे। उनकी अंतिम देशना उत्तराध्यन सूत्र में उल्लेखित है। भगवान की अंतिम देशना का वाचन करते हुए प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने बताया कि मनुष्य होना आसान है लेकिन मनुष्यत्व को प्राप्त करना मुश्किल है। मनुष्य का जीवन तब सार्थक होता है जब वह इंसानियत की कसौटी पर अपने आपको खरा साबित करे। साध्वी जी ने अपने प्रवचन में इंसानियत का क्या पैमाना होता है, इसे भी विस्तार पूर्वक बताया। धर्मसभा में साध्वी वंदनाश्री जी ने श्रद्धा से भजो महावीर, नैया तेरी भव से पार लगेगी, भजन का गायन किया। धर्मसभा में बाहर से पधारे श्रावकों का जैन श्री संघ ने सम्मान किया। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने बताया...

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