Sagevaani.com /Chennai: किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. के शिष्य मुनि धन्यप्रभ विजयजी ने प्रवचन में कहा कि लोभ का कोई अंत नहीं होता। लोभ को दूर करना है तो संतोष गुण को अपनाना जरूरी है। उन्होंने सुख और आनंद में अंतर बताते हुए कहा कि सुख वह है, जो प्रतिबंधात्मक होता है और आनंद वह है जो प्रतिबंधात्मक नहीं होता है, उसमें किसी तरह की कंडीशन नहीं होती है। बहुत से लोगों को सुख में ही आनंद मिलता है क्योंकि पैसा में ही सुख है, वे यह मान लेते हैं। उन्हें यह स्वीकार करना चाहिए कि पैसे में सुख नहीं है। पैसा जब तक रहेगा व्यक्ति का जीवन तनाव से भरा ही होगा। उन्होंने कहा आनंद समाधि देने वाला होता है। समाधि के अनुभव को पाने के पांच तत्व बताए गए हैं पिंडबल, पीठबल, प्रज्ञाबल, पुण्यबल और परमात्मा का पी...
नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बंधुओं अकाम माया का उपदेश श्री उत्तरायण के पाँचवे अध्ययन में दिया। भगवान कहते है कि मरण के अर्थ को समझो मरण भी धर्म -ध्यान से युक्त होना चाहिए। अन्तिम सांस तक मन में धर्म का वास होना चाहिए धर्म रग-रग में खुन की हर बूंद में होना चाहिए । हर पल, हर समय धर्म स्मृति में होना चाहिए। ये भूलने योग्य नहीं। जो धर्म को याद रखता है उसका मरण धर्मज्ञ होता है जो धर्म को भूल जाता है उसका मरण धर्म युक्त नहीं होता। जैसे आभूषण को जीवन पर्यन्त के लिए धारण करते है वैसे ही धर्म को जीवन पर्यन्त के लिए ही धारण करना चाहिए। ज्ञानीजन कहते है पति-पत्नी गाड़ी के दो पहिये के समान है कोई छोटा कोई बड़ा नही । विवाह के समय दोनो को समान संकल्प दिये जाते है। जैसे वर-वधु एक बार दोनों को स्वीकार कर लेते है तो अन्तिम सांस तक एक दूजे का ...
Sagevaani.com /Chennai । जीवन में कर्मो की लीला बड़ी न्यारी है। बुधवार साहुकारपेट जैन भवन मे महासती धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा में श्रध्दांलूओ को सम्बोधित करतें हुए कहा कि संसार में मानव जीवन अति दुर्लभ है,बड़ी मुश्किल से यह मानव जीवन मिला है। मानव शरीर ही मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।अपनी सोई हुई आत्मा को जगाने पर ही मनुष्य आत्मा पर कर्मों के आवरण को हटाकर अपनी आत्मा का कल्याण करवा सकता है। लेकिन मनुष्य मोह और राग मे संसार के सुख को स्थाई समझकर नश्वर काया को सुख देने के लिए पाप पर पाप करके जीवन के लक्ष्य भूल रहा है।आत्मा का उत्थान तभी हो सकता है जब मनुष्य अपने कर्मो निर्जरा कर लेता है तो वह अपनी आत्मा को संसार से मुक्ति दिलवा पाएगा। साध्वी स्नेहप्रभा ने श्री मद उत्तराध्ययन सूत्र के सत्तर और अठारवें अध्याय का वर्णन करतें हुए कहा कि सच्चा साधक वही है जो संसार में रहकर भी अपनी जीवन के लक्ष्य क...
आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरीश्वरजी ने श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में धर्म प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि आधुनिकीकरण के नाम पर आज का भारतीय समाज पाश्चात्य प्रभावों से अछूता नहीं रहा हैं. यूरोपीय देशों के समाजों में माँ बाप, महिलाओं एवं बच्चों के दायित्व तथा भारतीय समाज में इनकी परम्परा बिलकुल उलट हैं. मगर पाश्चात्य प्रभाव में हमारा समाज भी इन विकारों से प्रभावित हो रहा हैं. इस रुग्ण मानसिकता के चलते ही भारतीय परिवार का मूल स्वरूप संयुक्त परिवार विघटित हो चूका हैं. वृद्धावस्था में बच्चें माँ बाप को वृद्धाश्रम भेजने लगे है इन्हें केवल सामाजिक विकार ही कह सकते हैं. समाज एक यथार्थ है शाश्वत सत्य है जिसकी छत्रछाया में हम सभी सुरक्षा के भाव की अनुभूति करते हैं. मगर कई बार समाज की मान्यताओं के नाम पर प्राचीन रुढियों तथा रीती रिवाजों को भी थोप...
Sagevaani.com /चैन्नई। अभिमान नहीं करना और स्वाभिमान को छोड़ोगे नहीं तो जीवन में दुःख नहीं सुख पाओगे। मंगलवार साहुकार पेट जैन भवन मे श्री मद उत्तराध्ययन सूत्र के सोलहवें अध्याय का साध्वी स्नेहप्रभा ने वर्णन करतें हुए श्रध्दांलूओ से कहा कि अभिमान एक रोग है जिस मनुष्य को यह रोग लग जाता है वह जीवन भर दुःख झेलता है वह थोड़ी सी कामयाबी और अल्प धन के बल पर दुसरोँ के स्वाभिमान को गिराने वाला व्यक्ति जीवन मे कभी श्रेष्ठ और महान नहीं बन सकता है ऐसा इंसान जीवन प्रयाय सुख की अनूभूति नहीं कर सकता है और ना ही कभी महान बन पाएगा। वही व्यक्ति श्रेष्ठ और महान बन सकता है। जिसके भीतर मे करूणा, दया और अपनत्व की भावना के साथ स्वाभिमान होगा वही मनुष्य जीवन मे महान बन सकता है। और अपनी ख्याति को बढ़ा सकता है। महासती धर्मप्रभा ने अंजना चारित्र वांचन करतें हुए कहा कि कर्म बलवान होते है जिससे मनुष्य पीछा नहीं छुड़ा सकता...
इस साल 1 नवंबर को करवा चौथ की पूजा चंद्र दर्शन व चंद्र अर्घ से पूर्ण होगी। 1 नवंबर को सुहागिन महिलाएं अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना करते हुए । करवा चौथ की पूजा करती है , करवा चौथ की कथा का पाठ किया जाता है। इस दिन महिलाएं सवेरे से व्रत रखकर शाम को चंद्र दर्शन करने के बाद भोजन करती है । करवा चौथ की कथा एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी । कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर सेठानी उसकी बहू और बेटी ने करवा चौथ का व्रत रखा था। रात के दौरान साहूकार के लड़के भोजन करने लगे तो उन्होंने अपनी बहन से भी भोजन करने का आग्रह किया फिर बहन ने अपने भाई को बताया कि आज उसने करवा चौथ का व्रत रखा है। चांद को अर्ध्य देकर ही व्रत का पारायण कर सकती है । भाइयों से बहन की यह हालत देखी नहीं जा रही थी फिर सबसे छोटे भाई ने दूर पेड़ पर दीपक जलाकर छलनी की आड़ में रख देता है। वह दीपक ऐसा प्रतीत होता है जै...
आत्मा पर जो वास्तविक नहीं है, जो नाशवंत है, जो क्षणिक है, वह पदार्थ शासन करे यह तो बिलकुल अनुचित है। धर्म का अधिकार प्राप्त करनेवाला व्यक्ति अन्य पदार्थों को स्वयं पर शासन नहीं करने देता। आनंदमयी बनकर प्रवाहित रहनेवाली नदी को समंदर में मिलना ही है। इसलिए उसने अपना स्वरुप विराट बना लिया। हमारी आत्मा को परमात्मा । स्वरूप प्राप्त करना है, तो छोटी बातों से दूर रहकर विराट लक्ष्य को प्राप्त करना । | ही पड़ेगा। समंदर को प्राप्त करने के लिए नदी सब कुछ त्याग करने हेतु, न्योछावर करने हेतु तैयार है। किन्तु क्या हम सत्य की खोज हेतु कोई प्रयत्न | करते हैं? नदी बहती है इसीलिए स्वच्छ है अन्यथा उसे मलिन होने से कोई | नहीं रोक सकता। अस्खलित धारा में बहने से ही आनंद प्राप्त होता है। आत्मा बंधन में फँसता है क्योंकि वह सदा बंधनों के आसपास ही | रहता है। आत्मा के बंधन को जानने से ही संसार के बंधनों से मुक्त बना...
जैन साध्वी जी ने बताया कि पंडित मरण से होती है जीव की सदगति Sagevaani.com /शिवपुरी ब्यूरो। जन्म लेने वाले जीव का मृत्यु को प्राप्त करना निश्चित होता है। लेकिन अपने जन्म और मृत्यु को सार्थक करने की साम्र्थय सिर्फ मनुष्य में है। भगवान महावीर ने हमें जहां जीने की कला सिखार्ई है वहीं वह मृत्यु की कला भी सिखाते हैं। भगवान महावीर के अनुसार जीवन उत्सव है वहीं मृत्यु महोत्सव है उक्त वात प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने ओसवाल गली स्थित कमला भवन में आयोजित एक विशाल धर्मसभा में कही। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी इन दिनों भगवान महावीर की अंतिम देशना जो उत्तराध्यन सूत्र में वर्णित है का वाचन कर रही हैं। साध्वी जी ने बताया कि उत्तराध्यन सूत्र जैन दर्शन की महागीता है। धर्मसभा में साध्वी जयाश्री जी ने हे महावीर तेरे भक्त हम, तेरे पथ पर चलें हमारे हर कदम भजन का गायन कर भगवान महावीर की गरिमा को रेखांकित ...
हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि अधिक आशा से उपजे निराशा बुढ़ापे में अपने भाग्य का रोना ना रो जो प्रकृति से मिल रहा है उसे प्रेम से स्वीकार करें बच्चों से अधिक आशाएं केप्राय कहते हैं कि बेटा तो बुढ़ापे का सहारा है पर मैं कहती हूं ज्यादा आसान ना पहले जीवन भर अगर आशाएं रखे हैं तो बुढ़ापा में निराश होना पड़ सकता हैl अगर आशा ही ना रखोगे तो निराश भी नहीं होना पड़ेगा देखे तो होगी पड़ोसी का बेटा अपने पिता की सेवा नहीं कर रहा तुम भी अपने पिता की सेवा नहीं कर रहे हो तो अपने बेटे से यह आशा क्यों कर रहे होl यह आशा है जब टूटते हैं तो बुढ़ापे में शिवाय दुख के कुछ हासिल नहीं होताl तुम निस्वार्थ भाव से बेटों के लिए जितना कर सको कर दो ...
नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि जीवन का कोई भरोसा नहीं है जीवन असंस्कृत है जब तक इस शरीर में श्वास चलती है तब इंजन रूपी शरीर गतिमान है। श्वास बिगड गयी, थम गयी तो इसे सुधारने वाला न देवगति में है ना मनुष्य गति में। सर्वज्ञ, सर्वदर्शी तीर्थकंर सभी का उपाय बताने में समर्थ है परन्तु रुकी हुई साँस को गतिमान करने का उपाय उनके पास भी नहीं है फिर साधारण मनुष्य का क्या कहे। कितना भी धन क्यों न हो कितना ही प्रेम करने वाला परिवार हो पर मरण आने पर कुछ भी काम नही आता। सिकंदर ने पूरे विश्व पर अपना अधिकार जमा लिया परन्तु मरण काल निकट आने पर उसे कोई बचा न सका। चाहे कोई भी कुलदेवी हो, या अन्य कोई भी देवता है, थमी हुई साँस को चलाने में कोई समर्थ नही है तीर्थकंर कहते है सासें थमने के पहले पाल बाँध सकते है। सभी टूटी हुई चीजों को जोड़ा जा सकता है परन्तु टूटी सांस को जोड़ने का साम्थर्...
8 टीमों के 250 प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा Sagevaani.com /Chennai राजस्थान काॅस्मो क्लब (आरसीसी) के तत्वावधान में रविवार को तीन अलग-अलग खेलों की एकदिवसीय इंटर क्लब स्पोर्ट्स प्रतियोगिता का आयोजन मीनम्बाक्कम स्थित अगरचंद मानमल जैन कॉलेज में किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ग्रैंड मैग्नम के एमडी विजय सुराणा, विशिष्ट अतिथि आटो माॅल के चैयरमेन हस्तीमल चौधरी, अभिषेक सुराना और एएम जैन कॉलेज के प्रबंध समिति के सदस्य पन्नालाल चौरडिया थे। प्रतियोगिता में 8 क्लब के 250 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। आरसीसी के अध्यक्ष प्रवीणचंद नाहर और अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर इस प्रतियोगिता का शुभारंभ किया। नाहर ने स्वागत भाषण में संस्था द्वारा किए जाने वाले कार्य- कलापों का ब्यौरा दिया। प्रातः 8 बजे शुरू हुई इस प्रतियोगिता में टेबल टेनिस, शतरंज और बैडमिंटन को शामिल किया गया। प्रतियोगिता में आरसीसी, आरसीसी दिव...
योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी के शिष्य मुनि ध्यानप्रभ विजयजी ने प्रवचन में कहा कि सम्यक् दर्शन का अर्थ है भगवान की वाणी के ऊपर पूर्ण श्रद्धा रखना। सम्यक् दर्शन को पारसमणि, चिंतामणि, चंद्रकांतमणि आदि की उपाधि दी गई है। उन्होंने कहा सम्यक् दर्शन होने के बाद ही हमारे भव शुरू होते हैं। परमात्मा के उपकार से हमें दुर्लभ मनुष्य भव मिला है। मनुष्य भव ही एक हैं जिसमें हम आराधना – साधना कर अनादिकाल से हमारे अंदर भरे कुसंस्कारों, पापों को तोड़ सकते हैं। मनुष्य भव में हम दुर्जन भी बन सकते हैं और सज्जन भी बन सकते हैं, साधु भी बन सकते हैं परमात्मा भी बन सकते हैं। मानव को पांच इंद्रियों, स्मरण शक्ति, मन की शक्ति आदि मिली है, यदि वह इनका सदुपयोग करे, तो वह अपने लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। हम सोचते हैं, संसार में बहुत सुख है लेकिन संसार...