साध्वी जी ने इसके पूर्व 45 दिन का सिद्धी तप भी किया था, जैन समाज ने तपस्या की अनुमोदना की तपस्वी रत्ना की उपाधि से अलंकृत प्रसिद्ध जैन साध्वी पूनम श्री जी ने 40 दिन की तपस्या कर प्राचीन काल में परदेशी राजा द्वारा की गई तपस्या को दोहराया। उनकी तपस्या का अनुकरण कर युवा पीयूष कर्नावट ने भी 12-12 बेले (दो उपवास) की तपस्या की और अंतिम बार एक तेला कर तपस्या की पूर्णाहुति की। पीयूष कर्नावट के अलावा श्रावक अशोक गूगलिया और श्राविका बहिन श्रीमती पुष्पा गूगलिया, कु. मंजूलता गुगलिया, श्रीमती शशिकांता गूगलिया, श्रीमती सुधा कास्टया, श्रीमती रीता गुगलिया और श्रीमती वीणा दूधेरिया ने भी उपवास के स्थान पर 12-12 एकासनें और तीन लगातार एकासनें कर अपनी तपस्या पूर्ण की। तपस्या पूर्ण होने पर जैन श्वेताम्बर श्री संघ, चार्तुमास कमेटी, श्वेताम्बर मूर्ति पूजक संघ और ब्राह्मी बहूमण्डल ने तपस्वी श्रावक और श्राविकाओं का...
लालगंगा पटवा भवन में बह रही महावीर के अंतिम वचनों की अमृत गंगा आज के लाभार्थी परिवार : गौतमचंदजी नीलेश बोथरा परिवार, प्रकाशचंद महेंद्र कुमार गोलछा परिवार एवं श्रीमती प्रेमलता प्रकाशचंद सुराना परिवार Sagevaani.com /रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा जो अपने अतीत को जनता है, वह अपने भविष्य का निर्णय कर सकता है। मृगापुत्र ने अपने अतीत को जाना, कि कैसे उसके अशुभ में से शुभ का जन्म होता था और शुभ में से अशुभ का। कैसे उसने पुण्य में जीते हुए नर्क के बीज बो दिए थे, और उसके शुभ में से नर्क का जन्म हो गया था। और कैसे उसने नर्क में रहते हुए शुभ के बीज बोये, जिसके कारण उसे संयम मिला। उसने शुभ-अशुभ का चक्र देखा था, और अपने अंतर मन में तय किया कि अब मेरे शुभ में से शुभ नहीं शुद्ध जन्मेगा। मेरे अशुभ में से न शुभ जन्मेगा न अशुभ जन्मेगा, बस सिद्ध जन्मेगा। और यही जीवन का सबसे गहरा रहस्य है। उक्ताशय क...
Sagevaani.com /चैन्नई। कर्म भगवान को भी नहींं छोड़ते है। शुक्रवार साहुकारपेट जैन भवन मे महासती धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा में श्रध्दांलूओ को सम्बोधित करतें हुए कहा कि कर्मफल भोगने से स्वंय भगवान नहींं बच सके तो अन्य संसारिक जीवों की क्या बिसात है जो वह कर्मो से बच पाएंगे। संसार में कर्म ही प्रधानता है कर्मो का फल तो लोगों को भोगना ही पड़ता है,चाहे वह इस जन्म में भोगे या अगले जन्म में भोगें बिना संसार से छुटकारा नहीं मिल सकता है। दुनिया ऐसा को प्राणी नहीं हुआ है जिसने कर्म से बचकर संसार से मुक्ति पाई हो। बिना भुगतान किये कर्म पीछा नहीं छोड़ते है चाहे हंस भुगते या रोकर कर्म किसी को भी नहीं बख्शते है। मनुष्य कर्म बांधते वक्त यह सोचता है उसे कौई नही देख रहा है लेकिन कर्मो के एक नहीं असंख्य आंखे है लाख जतन करले मनुष्य पर कर्म छिपाऐ छिपने वाले नहीं है। साध्धी स्नेहप्रभा ने श्रीमद उत्तराध्ययन सूत्र...
मरुधर केसरी जैन महिला कॉलेज, वानीयंबाडी का 1 नवंबर 2023 बुधवार को सुबह 10.30 बजे बैच 2020-21 के लिए दीक्षांत समारोह आयोजित किया गया। कॉलेज के अध्यक्ष श्री एम. विमल चंद जैन, सचिव श्री. सी. लिकमीचंद जैन, (पूर्वाध्यक्ष, राजस्थानी एसोसिएशन तमिलनाडु), मुख्य अतिथि जेप्पियार यूनिवर्सिटी चेन्नई की संस्थापक और चांसलर डॉ रेजिना जे मुरली, सम्मानित अतिथि राजस्थानी एसोसिएशन तमिलनाडु के अध्यक्ष श्री एन. मोहनलाल बजाज, जेप्पियार यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार श्री बीनू शिव सिंह, रजत के संयुक्त सचिव श्री एम. ज्ञानचंद कोठारी ने द्वीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। सभी अतिथियों का सम्मान साल व स्मृति चिन्ह से किया गया। इस अवसर पर कालेज के पदाधिकारी श्री के राजेश कुमार जैन, श्री एन ललित कुमार जैन, श्री के आनंद कुमार जैन, श्री एस नवीन कुमार जैन, ट्रस्टी, आदि उपस्थित रहे। प्रिंसिपल समारोह की अध्यक्षता डॉ....
आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरीश्वरजी ने सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन संघ में प्रवचन देते हुए कहा कि इस दुनिया में धर्म को लेकर जितनी बहस हुई है, उतनी शायद ही किसी और चीज पर हुई होगी। इसके पक्ष और विपक्ष बनते रहे हैं। आज तो और भी, सारी समस्याओं के लिए धर्म को ही दोषी ठहराया जा रहा है। लेकिन यह एक अजीब सी बात है कि धर्म को किसी ने भी सही अर्थों में नहीं लिया। उलटे उसे टकराव का एक स्थायी मुद्दा बना दिया गया है। सबसे विषम स्थिति तो यह है कि टकराव को धर्म से धर्म तक ले जाया गया है जबकि धर्म का संबंध मानव-जीवन के आधारभूत नियमों से है। वे आगे बोले की जीवन और जगत के अंतर्संबंधों को समझने की कोशिश में मनुष्य ने धर्म को पाया है। हरेक ऋषि मुनियों ने माना है कि संपूर्णतः स्वीकार न कर पाने पर भी यथासंभव जीवन में धर्म को धारण कर चलना चाहिए ताकि वह हमारे जीवन को धारण करता रहे। इस दृष्टि से कहा है, ‘धर्म को स्व...
दुर्भाग्य को सौभाग्य में कैसे बदलें, श्रुतदेव आराधना के 10 वें दिवस उपाध्याय प्रवर ने बताया Sagevaani.com /रायपुर। उपाध्याय प्रवर ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि क्यों एक व्यक्ति अपने सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदल देता है? क्या सोच होती है उसकी? परमात्मा उस व्यक्ति को पापी कहते हैं। उसे सौभाग्य तो मिला था, लेकिन उसने अपने कर्मों के कारण नहीं अपनी सोच के कारण उसे पाप बना दिया। क्या जीवन शैली होती है, जिसके कारण व्यक्ति अपने सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदल देता है, सुधर्म स्वामी श्रुतदेव आराधना के 18वें अध्याय में इसका सूत्र देते हैं। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। बुधवार को उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के दसवें दिवस लाभार्थित परिवार जवरीलाल बरमेचा परिवार चेन्नई ने श्रावकों का तिलक लगाकर धर्मसभा में स्वागत किया। धर्मसभ को संबोधित करते हुए प्रवीण ऋषि ने कहा क...
आत्मबन्धुओ क्षुल्लक निरग्रन्थिय- साधु के अन्दर कैसी चर्या होनी चाहिए इसका विधान है। साधु गृहत्यागी होते हैं जिन वस्तुओं का त्याग कर दिया, गृहत्याग कर दिया, ममत्व भाव नहीं रखना भी संयम को सुरक्षित रखता है वो जानते है कि किस लक्ष्य के लिए मैनें संयम लिया है। गृहत्याग करने के बाद कैसे रहना । विधा दो प्रकार की विधा और अविधा। जीव में उपयोग लक्ष्ण होता है जड़ में उपयोग लक्ष्य नहीं होता है अविधा को मित्यात्व बताया है। अविधा उसके पास है तो संसार परिभ्रमण बढ़ जाता है विधा है तो वो संसार से भव पार हो सकता है उनका लक्ष्य होता है मोक्ष रुपी लक्ष्मी को प्राप्त करना। उसके लिए प्रयत्न करना है। भगवान ने साधुजी की हर चर्या को गुप्त बताया है सबसे अनासक्त रहना। गृहस्थ के घर से ही गोचरी, पानी लाकर अपना जीवन निर्वाह करते है सभी के साथ मैत्री भाव रखते हैं किसी की भी विराधना करने की इच्छा नहीं करते है पातरे में ...
जैन साध्वी ने बताया कि तप को कैसे बनाया जा सकता है कारगर Sagevaani.com /शिवपुरी ब्यूरो। तप, मोक्ष का द्वार है, लेकिन तप के साथ-साथ जप, धर्म आराधना, संवर, सामायिक, पोषद और प्रतिक्रमण भी आवश्यक है। आज पहले की तुलना में तप करने वालों की संख्या बढ़ी है एक साथ 1500 सिद्धी तप और 307 मासखमण (30 उपवास की तपस्या) हो रही है, लेकिन इन तपस्याओं को करना कारगर तभी होगा जब हम एकांकी तप तक सीमित न हो और धर्मर् आराधना तथा जप भी करें। उक्त उदगार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने तप कैसे जीवन के लिए उपयोगी बनेंगा, इसे अपने व्याख्यान में स्पष्ट किया। भगवान महावीर की अंतिम देशना उत्तराध्यन सूत्र का वाचन करते हुए साध्वी जी ने बताया कि आगम के सातवें अध्ययन में भगवान ने जीवन की महत्वता बताई है। प्रारंभ में साध्वी जयश्री जी ने जो वीर प्रभू गुण गाएगा, वो भवसागर तिर जाएगा, भजन का सुमधुर स्वर में गायन किया। इस...
किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि द्वारा यानी द्वार, नारी, गुफा बिना की शेरनी, कन्या, सुंदरी, ललिता, कुमारी सहित स्त्री के 92 नाम बताए गए हैं। स्त्री सत्वधारी, सत्ताधारी लोगों को भी वश में करके बाजी पलट देती है। कहा गया है कि पुरुष के पास शक्ति है तो स्त्री के पास सहनशक्ति है। स्त्री स्वर्ग का भी द्वार है, नरक का भी द्वार है और मोक्ष का भी द्वार है। जब कभी अपना मन उदास, विचार से ग्रस्त हो तो चार शरणागति लेनी ही चाहिए। मात्र प्रवृत्ति ही शरणागति नहीं है, शरणागति का अर्थ कुछ अलग है। शरणागति का मतलब है मैं आपके चरणों में सर्वस्व दे रहा हूं, आप ही मेरे सर्वस्व हो और मेरा सर्वस्व आपका है। चिकने से चिकने पाप, मन के संक्लेश शरणागति से दूर हो जाते हैं। आचार्यश्री ने कहा कि शरणागति लेनी है तो 6...
हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि एक समय की बात है राजश्री प्रसंग चंद्र के बारे में बड़ा चर्चित प्रसंग है वह अपना राज पाठ त्याग करने के बाद संत बने थेl एक बार में जंगल में एक हाथ आकाश की ओर ऊपर की एक पांव के बल खड़े होकर घर तपस्या में लेते राजा श्रेणी भगवान महावीर के दर्शन अपनी शोभा यात्रा के साथ उधर से गुजर रहे थेl प्रश्न चंद्र को तपस्या देखकर राजा ने स्वयं को धन्यवाद समझा सोचा जब यह राजेश्री थे तब भी अपने सूत्रों का दमन करती है और अब सन्यासी होकर अपने भीतर के शत्रु को जीतने में लगेl धन्य राज्यश्री तुम्हारा छात्र धन है यही विचार करते-करते राजा श्रेणीक भगवान महावीर के समक्ष पहुंचे दर्शन वंदन के उपरांत उन्होंने भगवान से ...
Sagevaani.com /चैन्नई। विरक्ति के मार्ग को जो अपनाता है वही भगवान को पा सकता है।गुरूवार साहुकारपेट जैन भवन के मरूधर केसरी दरबार में महासती धर्मप्रभा ने श्रावक श्राविकाओं को धर्म संदेश देतें हुए कहा कि काम और राम साथ में नही रह सकते है। राग -द्वेष,काम-क्रोध,लोभ-मोह और विषयो और विकारो का जब तक मनुष्य त्याग और विरक्ति नहीं कर देता है तब तक वह परमात्मा से नहीं मिल पाएगा और नाहि संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। सांसारिक भोगों से इंद्रियों की तृप्ति नहीं होती है इन विषयों और विकारों से सुख नहीं दुःख मिलता है और आत्मा परमात्मा से नहीं मिल पाती है त्यागने पर ही संसार से मुक्ति मिलेगी और परमात्मा से आत्मा का मिलन हो सकता है। साध्वी स्नेहप्रभा ने श्री मद उत्तराध्ययन सूत्र का अर्थ सहित विवेचन करतें हुए कहा कि जीनवाणी एक ऐसा मार्ग है जो हमारी आत्मा को परमात्मा के नजदीक और स्पर्श करवा सकती है और संस...
महावीर निर्वाण कल्याणक के नवम दिवस श्रुतदेव आराधना के सोलहवें अध्याय का पाठ Sagevaani.com /रायपुर। उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के नवम दिवस बुधवार को उपाध्याय प्रवर ने कहा कि ब्रह्मचर्य की महिमा गाई जाती है, लेकिन आज का चिकित्सा विज्ञान भारतीय आध्यात्मिक शास्त्र को चुनौती देता है। उनके अनुसार ब्रह्मचर्य अस्वस्थता को, मानसिक व्याधियों को जन्म देता है। महावीर भी कहते हैं कि ब्रह्मचर्य बीमारियों को और पागलपन को जन्म दे सकता है। ब्रह्मचर्य किसी को बेकाबू भी कर सकता है। लेकिन मर्यादाओं के साथ ब्रह्मचर्य का पालन किया जाए हो व्यक्ति सिद्ध हो जात है। केवल जिनशासन ही है, जो केवल ब्रह्मचर्य की बात नहीं करता है, बल्कि उसके वातावरण की भी बात करता है। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के अष्टम दिवस लाभार्थित परिवार श्री दुलीचंदजी भूरचंदजी कर्नावट...