कोडमबाक्कम वडपलनी श्री जैन संघ प्रांगण में आज तारीख 6 सितंबर में प.पू. सुयशा श्रीजी के मुखारविंद से: हमारी जिंदगी दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत होना चाहिए! हमें चाहिए कि हम से कमजोर वर्ग की सहायता करें! हम दूसरों की कितनी सहायता करते हैं उसका भी परिमाण होना चाहिए! ऐसे ही हम दूसरों से कितना प्यार करते हैं या कितनी नफरत करती हैं इसका भी अंदाजा हमें होना चाहिए! समय बहुत और दुर्लभ है, इसलिए समय के अनुसार हमें दूसरों की गलतियों को भूलने की आदत डालनी चाहिए और माफ कर देना चाहिए!
हम कितने भी बड़े हो जाएं, धनाढ्य हो जाए तो भी हमारी जिंदगी में एक ऐसा निर्भीक व्यक्ति होना चाहिए जो हमारी अच्छाइयों एवं बुराइयों का विश्लेषण हमारे सामने कर सके और हमें सुधरने की प्रेरणा दे सके! हमारी जिंदगी में अनायास ही पुण्य कम और पाप ज्यादा होते हैं! हमारी विचारधारा हमारे भाव और हमारी सोच पवित्र है तो पुण्य का उपार्जन होता है और अगर हमारी सोच अपवित्र है तो पापों का उपार्जन होता है! हमारे जीवन में “जीरो” यानि शून्य का बहुत महत्व रहता है! 1 के बाजू में लगातार शून्य लगाने से वे दस, सौ, हजार और लाख में भी परिवर्तित हो सकते है, लेकिन “0” अलग से कितने भी हो जाए वे “0” ही रहते हैं!
हमें हमारी जिंदगी मे भी जीरो जैसा समभाव अपनाना चाहिए! हमारे जिंदगी का आधार गणित है सुबह शाम उठते बैठते, सोते जागते, भोजन, सभी के लिए टाइम, देखते हैं, सब गणित है! दुकान में या ऑफिस में हिसाब किताब देखते हैं तो वह भी गणित है! हमारा धन जितना बढ़ते जाता है, हमारी सुख सुविधाएं जितनी बढ़ती जाती है, हम उतना ही हमें असुरक्षित महसूस करते हैं! जिसके पास कुछ भी नहीं है खोने को वह हमेशा सुरक्षित रहता है! हमें हमारी जिंदगी में पूरी तरह से समभाव में जीना है सुरक्षित रहना है और सुखी जीवन जीना है!