विजयनगर स्थानक भवन में विराजित जैन दिवाकरिय साध्वीश्री प्रतिभाश्री जी म सा ने अपने प्रवचनो की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए आज स्वाध्याय पर विवेचन करते हुए स्वाध्याय अर्थात स्व के भीतर देखना।स्वाध्याय हमारा दवाखाना व ओषध है जँहा आत्मा की चिकित्सा होती है।स्वाध्याय करने से जीवात्मा का ज्ञानावर्णीय कर्मों का क्षय होता है।व्यक्ति अपने दुःख से इतना दुःखी नहीं है,जितना दूसरों के सुख को देखकर दुःखी है।स्वाध्याय करने में प्रथम एकाग्रता द्वितीय नियमितता,तीसरा विषयवाचना व चौथा लक्ष्य निर्धारित होना आवश्यक हैं।
साध्वी प्रेक्षाश्रीजी ने स्वभाव पर व्याख्या करते हुए बताया कि व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं एक जो खुद की ही प्रशंसा करना व दूसरा सदैव दूसरों में बुराई ढूंढना। इस प्रकार का स्वभाव निन्दा की श्रेणि में आता है।लोगों को स्वयं की पीठ कभी दिखती नहीं है,उसी प्रकार स्वयं के दोष उन्हें दिखते ही नहीं है।व्यक्ति यदि स्व की निंदा करले तो उसे कभी पर की निन्दा की जरूरत नही पड़ती।साध्वीश्री ने कहा कि जिन्होंने हमारी परवरिश की हो अर्थात माता पिता व गुरु इनकी कभी निंदा नहीं करनी चाहिए क्योंकि इनके समक्ष स्व की निंदा से आत्मलोचना हो जाती है।संघ के मंत्री कन्हैया लाल सुराणा ने बाहर से पधारे हुए मेहमानों का हार्दीक स्वागत किया।