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सुनना भी एक कला है: पुज्य जयतिलक जी म सा

सुनना भी एक कला है: पुज्य जयतिलक जी म सा

पुज्य जयतिलक जी म सा ने जैन भवन, रायपुरम में प्रवचन में बताया कि अनंत उपकारी प्रभु महावीर ने भव्य जीवों के उत्थान के लिए जिनवाणी प्ररूपित की! गौतम स्वामी ने पुछा की सुनने से क्या फल मिलता है। सुनना भी एक कला है! सुनकर समझना आवश्यक है! बराबर सुनने समझने की शक्ति सही नहीं होने से अनर्थ हो जाता है। अत: ज्ञानीजन कहते है सुनना विवेक से है। जब तक सही बात को समझ नही लेते उसकी दूसरों से चर्चा नहीं करनी चाहिए। गलत प्ररूपणा से कर्म बंधन होता है! आधी अधुरी बात से संशय उत्पन्न हो जाता है। घर की शांति, राष्ट्र की शांति, समाज की शांति के लिए कभी कभी गुप्त मन्त्रणा करनी पड़ती है ऐसे समय में कुछ शब्द हमारे कानो में पड़ जाय और उसका अर्थ गलत समझ कर प्ररूपणा कर दी तो दूसरे व्रत में दोष गलत लगता है।

“दिजे तो वैश्या ने दीजे ब्राह्मण ने दिया तो नरक पडेला” ऐसा एक संत कहते है। वैश्या को देने से वंश बढेगा। एक ब्राह्मण यह बात सुन कर कुपित होता है! और ब्राह्मण समाज को इकट्ठा कर बात बताता है कि संत ऐसी गलत बात प्ररूपणा कर रहे है। सारा ब्राह्मण समाज लड़ने क लिए आता है। मुनिराज समझ नहीं पाए। पूछा क्या बात है। ब्राहमण ने कहा: आपने ऐसी बात कहीं मैंने सुना है।

दिजे तो वेश्या ने दिजे, ब्राह्मण को देने से नरक पडेगा। वैश्या को दे तो वंश बड़ेगा, ब्राह्मण को देने से वंश घटेगा। भाई तुमने सुना किंतु समझा नहीं। एक गाँव में एक ब्राहमण था जिसका पुत्र भोला भाला था ।

आज का युग ऐसा है कि जो धार्मिक प्रवृत्ति करता है उसका रिश्ता भी होना मुश्कील हो जाता है। ऐसा ही वह पुत्र भोला था। संसार से परे था! मित्र को बुलाकर भोले पुत्र को होशियार करने के लिए कहते है! कुमित्र सारी आदतें सीखा देते है! ब्राह्मण पुत्र की आदतों से दुःखी हो जाता है। ब्राह्मणी कहती है शीघ्र विवाह कर दो! संस्कार ब्राह्मण की लड़की सुचारू रूप से जीवन चलाती है किंतु दु:खी होकर पिता को स्थिति से अवगत कराती है। कहती हैं कि जहर देने का मन करता है ! पिता, स्थिति को समझ कर वापिस पुत्री को खत में लिखते है कि जहर देना है तो वैश्या को दो। ब्राहमण को देने से नरक मिलेगा । वैश्या को जहर देने से तेरा वंश बड़ेगा, ब्राहमण को नहीं देने से तुम आबाद रहोगी, संत पूरी बात का खुलासा करते हैं। ब्राह्मण सही बात को समझता है और झगड़े की झड़ मिटती है! किसी गुप्त बात को सुनने की चेष्टा नहीं करे। पहले व्रत में “रहसय खाणे” दोष लगने की संभावना रहती है। कर्म बंध होने के बाद मुक्त होना मुशकिल हो जाता है।

तीसरी बात है “सदारमंनमेए”, पति पत्नी के गुप्त बातो को प्रकट नहीं करना। इससे जीवन में अनर्थ की संभावना है। वर्तमान में सुख से जीओ! भूतकाल की बात को मत टटोलो। एक सेठजी संपन्न थे किंतु समय का फेर हो था। सेठजी रंक हो गये। परदेश जाने का विचार करते हैं। ऐसी कहावत है कि जहाँ पर नुकसान हो जाता है, तो उस क्षेत्र को छोड़कर दूसरे क्षेत्र में आजीविका के लिए जाना चाहिए। सेठ सेठानी प्रस्थान करते हैं। जंगल में प्यास लगी! सेठजी कुएँ से पानी भरने झुकते है तो रस्सी छोटी पड़‌ जाती है सेठानी से कहते मेरे पैर पकड़ लो मैं पानी खींच लेता हूँ । उसी समय सेठानी को कुबुध्दी सुझती है वह पैर को छोड़ देती है। सेठ जी कुँए में गिर जाते है! सेठानी चली जाती है। सेठ जी मदद की इंतजार करते है उसी समय एक सार्थवाह निकला। सार्थवाह ने मदद की। जिविकापार्जन के लिए सार्थवाह के साथ चले जाते है। पुण्यवानी से फिर से धर्नाजन कर लेते है। कुछ समय सेठजी सेठानी को लेने पिहर जाते हैं। सेठानी भी खुशी खुशी वापिस आ जाती है! लीला लहर हो जाती है! एक पुत्र प्राप्ति होती है। पुत्र का विवाह भी कर देते हैं।

एक दिन सेठजी भोजन कर रहे थे धूप आ रही थी तो सेठानी पल्लू पकड़कर खड़ी थी! सेठजी मन में कुछ सोचकर हँसने लगे! सेठजी को हंसते देख सेठानी भी मुस्कुराने लगी! उसी समय बहु देखती है तो जिद ठान लेती है कि सेठ सेठानी क्यूं हँसे । मुझे मालूम होनी चाहिए। पुत्र की जिद पर पुरानी घटना सुनाई ! पुत्र ने अपनी पत्नी को सुनाई। पुत्रवधु ने सासुजी पर कचरा डाला! सेठानी ने पूछा तो बहु ने कहा मैने तो कचरा ही डाला। आपने तो सेठजी को ही डाल दिया। यह बात सुनते ही सेठानी जड़वत हो गई और आत्म हनन कर लिया। सेठजी बात समझ जाते है सेठ जी भी आत्म हत्या कर लेते हैं। बहुत देर बाद पुत्र आता है! पुत्र भी आत्महत्या कर लेता है। थोडी देर इंतजार के बाद पुत्र वधु देखती है वह सोचती है में अकेली जी कर क्या करूंगी वह भी आत्म हनन कर लेती है। उस समय वह गर्भवती रहती है। इस तरह पूरा परिवार खत्म हो जाता है!

अत: कीसका रहस्य जाने नहीं! जान भी गये तो उसका उदघाटन नहीं करना चाहिए! पति पत्नी की बात आपस में रहे। अन्यथा बड़ा अनर्थ होने की संभावना रहती है। कर्म बंंध भी होता है! इहभव परभव दोनो बिगड़ जाते है! अत: ऐसे क्लिष्ट कर्मों से बचे। सभा का संचालन प्रचार-प्रसार मंत्री ज्ञानचंद कोठारी ने किया। अशोक खटोड ने प्रवचन पर आधारित पाँच प्रश्न पूछे सही जवाब देने वाले सभी को पुरस्कार दीये गये।

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