गुरुपूर्णिमा पर अपने गुरु को दी भावांजलि
तेरापंथ सभा भवन, साहुकारपेट मे 261वें तेरापंथ स्थापना दिवस पर आचार्य श्री भिक्षु के प्रति भावांजलि अर्पित करते हुए निर्देशिका समणी विनितप्रज्ञा ने कहां कि संसार में अनेक महापुरुष हुए है, उनमें से एक है आचार्य भिक्षु।
आज हम उस महायोगी, महातेजस्वी, महानप्रतापी महापुरुष की स्मृति कर रहे हैं। राजस्थान के कंटालिया ग्राम में विक्रम संवत 1783 आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी को सिंह स्वप्न के साथ माता दीपा और पिता बल्लूशाह के घर एक तेजस्वी बालक में जन्म लिया। नाम रखा गया भीखण।
समणी ने आगे कहां कि बालक भीखण बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों के लिए अनासक्ति के संस्कारों को वृद्धिंगत करता हुआ संसार के बंधनों में बंध गया। वैराग्य परिपुष्टि के साथ नश्वरता का प्रत्यक्ष बोध तब हुआ जब पत्नी सुगणीबाई का अचानक स्वर्गवास हो गया। सजोड़ें दिक्षा का संकल्प अधूरा रह गया।
स्थानकवासी परंपरा के आचार्य रघुनाथजी के पास दीक्षा लेकर साधना के क्षेत्र में आगे बढ़े और आगमों का गहन अध्ययन किया। किंतु साध्वाचार संबंधी कुछ विचारों को लेकर मुनि भीखण ने शिथिलाचार के विरोध में क्रांति का शंखनाद कर दिया और बढ़ चले कंटकाकीर्ण मार्ग पर आत्मोंद्वार करने के लिए।
समय की मांग कहें या जिनशासन का भाग्य – काफिला जुड़ता गया और तेरापंथ के रूप में सहज ही एक संघ बन गया। तेरह साधु और तेरह श्रावक – तेरह की संख्या के आधार पर एक सेवक कवि के मुख से शब्द निकले – ए’ तेरापंथी तंत। नाम पड़ गया तेरापंथ।
आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा विक्रम संवत 1817 का वह शुभ मुहूर्त, शुभ बेला में तेरापंथ का जन्म हुआ और वह दिन हर एक तेरापंथी का जन्मदिन बन गया।
आज तेरापंथ स्थापना दिवस के अवसर पर हम कोटिश: नमन करते हैं – तेरापंथ के आध्य प्रवर्तक आचार्य भिक्षु को, भिक्षु के संघ को दीपित करने वाली उस तेजस्वी आचार्य परंपरा को। सराहना करें हम अपने सौभाग्य की, कि हमें इस संघ में जीने का और साधना करने का सुंदर अवसर प्राप्त हुआ हैं।
समणी ने आगे कहा कि तेरापंथ का अर्थ है – अहंकार और ममकार का विसर्जन, देव, गुरु और धर्म के प्रति दृढ़ आस्था, गुरु के प्रति सर्वात्मना समर्पण। आज के दिन हम संकल्प करें आचार्य भिक्षु के विचारों और सिद्धांतों को समझने का और जीने का। शतशः नमन आचार्य भिक्षु के प्रति –
आचार्य भिक्षु सार्वभौम धर्म के व्याख्याता थे।
महावीर के भक्त और आगमों के विज्ञाता थे।
भगीरथ बन लाए धर्म की गंगा को धरती पर,
आचार्य भिक्षु हम सबके भाग्य विधाता थे।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर समणी शीलप्रज्ञा, समणी जगतप्रज्ञा एवं समणी ओजस्वीप्रज्ञा ने अपने आराध्य गुरु के प्रति अपनी भावाभिव्यक्ति समर्पित की।
प्रचार प्रसार प्रभारी
श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, चेन्नई