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सही जवाब दे नहीं सको तो कोई गुनाह नहीं, लेकिन सवाल तो मंगल पूछना सीखो : प्रवीण ऋषि

सही जवाब दे नहीं सको तो कोई गुनाह नहीं, लेकिन सवाल तो मंगल पूछना सीखो : प्रवीण ऋषि

लालगंगा पटवा भवन में उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के बाद नया प्रसंग प्रारंभ

Sagevaani.com /रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने मंगलवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मरीचि के भव में प्रभु महावीर ने जहां नहीं करना था वहां अहंकार किया। अहंकार के बिना संसार में सत्ता-संपत्ति चलती नहीं है। लेकिन प्रभु के चरणों में साधना करते समय और उनके वरदानों को ग्रहण करते हुए अहंकार ऐसा चलता है कि मरीचि के भव से लेकर आखरी जन्म तक महावीर को कभी अवसर नहीं मिला कि वे अपने बड़प्पन का अहंकार कर सकें।

वापस कभी वो ज्येष्ठ बने नहीं। चाहे विश्वभूति का हो या त्रिपुष्ठ वासुदेव का भव हो, वे पराक्रमी बने लेकिन ज्येष्ठ नहीं बने। और वही आखरी जन्म में तीर्थंकर बने। लेकिन बड़े भाई नहीं बन सके, छोटे भाई बने। एक छोटा सा अहंकार जहां नहीं करना था, वहां किया। इस संसार में कई जगह अहंकार करते है, उस अहंकार को टूटने का भी मौका मिलता है। लेकिन देवगुरु धर्म की छत्र में किया हुआ अहंकार वज्र बन जाता है। महावीर ने तीर्थंकर नाम कर्म के पुण्य का बंधन किया, तीन लोक के पूज्य बने, लेकिन बड़े भाई नहीं बन पाए, छोटे भाई बने। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी।

प्रभु महावीर के निर्वाण कल्याणक की आराधना के बाद लालगंगा पटवा भवन में मंगलवार को नया प्रसंग प्रारंभ हुआ। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि यह प्रसंग जिनशासन में बड़ा अनूठा है। दो बहनें ब्राम्ही और सुंदरी, जिन्होंने बाहुबली को हाथी के हौदे से उतारा, अहंकार से नीचे ले आईं। एक योगी को योगीश्वर बनाया। कथा से पहले उन्होंने महावीर के एक छोटे से अहंकार के बारे में बताया कि कैसे वे कभी बड़े भाई नहीं बन सके। नन्दिवर्धन बड़े भाई हैं, वर्धमान छोटे। वर्धमान छोटे हैं, लेकिन बड़े बने। नन्दिवर्धन बड़े हैं, लेकिन बहुत छोटे हैं। इसमें बड़ा संघर्ष है, बड़ा बड़ा रहे तो संघर्ष नहीं होता और छोटा छोटा रहे तो संघर्ष नहीं होता।

लेकिन अगर छोटा बड़ा हो जाए, या बड़ा छोटा हो जाए तो संघर्ष को समाप्त करना मुश्किल हो जाता है। ऐसा ही भरत और बाहुबली के बीच में हुआ था, बाकी 98 भाई छोटे थे, लेकिन बाहुबली छोटा होते हुए भी बड़ा था। बाहुबली भरत चक्रवर्ती से छोटा था, लेकिन चक्रवर्ती का पुण्य होते हुए भी भरत उसे झुका नहीं सके। इस रिश्ते के द्वन्द को अगर समझ लेंगे तो अगला प्रसंग हमारे समझ में आ जाएगा। वर्धमान के जन्म के बाद नन्दिवर्धन की याद किसी को नहीं आती थी। वर्धमान कुछ नहीं होकर भी सबकुछ है, नन्दिवर्धन युवराज होते हुए भी कुछ नहीं है। एक अग्रज की वेदना देखनी है तो नन्दिवर्धन की देखो, न झुक पाया न झुका पाया।

उपाध्याय प्रवर ने बताया कि 15 नवंबर से एक नई आराधना प्रारंभ हो रही है। उन्होंने कहा कि यह एक चमत्कार था कि 16 साल का युवक, जिसका 8 सुन्दर कन्याओं के साथ विवाह होता है। और एक ही रात में वो आठों कन्याएं उसकी अनुगामी हो जाती हैं। भोग की सहयात्री बनने के लिए गई थीं, लेकिन प्रभु पथ की सहयात्री बन गईं। अपने 500 साथियों के साथ प्रभु के पथ पर चला। यह चमत्कार ही है कि जिनका वह जंवाई बना, वही उसके शिष्य बन गए।

जहाँ भी जंबूस्वामी लोगों को नजर आते, वे उनसे सवाल पूछते थे, प्रभु के बारे में पूछते थे। वे पूछते थे कि जिसे तुमने देखा ही नहीं है, उसके पीछे जा रहे हो? उसपर फ़िदा हो गए? जंबूस्वामी के पास कोई उत्तर नहीं था, वे पहुंचे सुधर्मा स्वामी के पास। जंबूस्वामी पूछते थे और सुधर्मा स्वामी उनके सवालों का जवाब देते थे। जंबूस्वामी ने सवाल पूछे और शर्त भी लगा दी कि आप जैसा जानते हैं, वैसे ही बोलना। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि यह बड़ी कठिन शर्त थी, गणित में यथातथ्य बोला जा सकता है, न्यास में यथातत्य बोला जा सकता है, लेकिन भगवान के विषय में यथातत्य नहीं बोला जा सकता।

उपाध्याय प्रवर ने कहा कि सही जवाब दे नहीं सको तो की गुनाह नहीं, लेकिन सवाल तो मंगल पूछना सीखो। जंबूस्वामी को कोई बात का आप अनुसरण करें या न करें, लेकिन एक बात तो फॉलो करो, उनमे भगवत्ता की जिज्ञासा थी, परम की जिज्ञासा थी। जिसकी तुम जिज्ञासा करोगे वो तुम्हे 100 फीसदी मिलेगा। जो भी मिला है माँगा हुआ मिला है, मांगने में गलती की तो गुनेहगार देने वाला नहीं तुम स्वयं हो।

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