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सुंदेशा मुथा जैन भवन कोंडितोप चेन्नई मे जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सुरीश्वरजी म.सा ने कहा कि:- केवलज्ञान की प्राप्ति के बाद तीर्थंकर परमात्मा प्रतिदिन पहले और अन्तिम प्रहर में धर्म देशना प्रदान करते है। उनकी वाणी 35 गुणों से युक्त होती है ।
अर्धमागधी भाषा ओर मालकोश राग में उनकी वाणी , जगत के सभी पदार्थो से अति मीठी होती है। प्रभु की वाणी मात्र कर्ण प्रिय ही नहीं बल्कि हृदय प्रिय होती है। जो आत्मा के भीतर रहे अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर ज्ञान की ज्योति जगाती है।
प्रभु के समवसरण में उपस्थित मनुष्य , असंख्य देवता और पशु , प्रभु की वाणी को अपनी अपनी भाषा में समझ लेते है। प्रभु की वाणी के प्रत्येक शब्द अनंत अर्थों से गर्भित होती है। जिसके श्रवण मात्र से सभी जीवों के मन की शंकाओ का स्वतः समाधान होता है।
छह महिनो से भूखा प्यासा व्यक्ति के कान में प्रभु की वाणी के शब्द पडते है। तब अपनी भूख प्यास भुल जाता है।प्रभु के वचनों को गणधर भगवंत सूत्र के रुप मे गुथते है। ग्रंथस्थ बने उनके वचन प्रभु के अभाव मे, प्रभु वचन का साक्षात परिचय कराते है। उनके मार्ग पर चलने वाले सदगुरू भगवंत उनकी वाणी का रहस्यार्थ समझाते है।
धर्म के प्रवचन तथा ग्रंथो से हमारी आत्म चेतना जागृत होती है। प्रभु के वचन हमे पाप विराम की प्रेरणा करते है। आत्मा को शुद्ध करने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है।” भव आलोचना” । पुर्व के अनंत भावों में हमारी आत्मा ने जाने – अंजाने में अनंत पापाचरण किये है।
पुर्व के जन्मों का तो हम विचार नहीं कर सकते परन्तु इस जन्म मे हुए पापों की शुद्धि के लिए, सदगुरू के सन्मुख भव आलोचना अवश्य करनी चाहिए । अपराधी हृदय से एक बालक की भांति सारे पापों का स्वीकर एवं पश्चाताप के आँसुओ में इतनी शक्ति है।
कि हमारे जीवन के सारे पाप धुल जाय । भव आलोचना के साथ पुनः उस पापाचरण न करने की प्रतिज्ञा भी अवश्य करनी चाहिए।