Share This Post

Featured News / Featured Slider / ज्ञान वाणी

श्रावक धर्म पांच अणुव्रत तीन गुणव्रत चार शिक्षा व्रत से संकलित है: जयतिलक मुनिजी

श्रावक धर्म पांच अणुव्रत तीन गुणव्रत चार शिक्षा व्रत से संकलित है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बन्धुओ, श्रावक धर्म पांच अणुव्रत तीन गुणव्रत चार शिक्षा व्रत से संकलित है, आंशिक रूप से व्रत प्रत्याख्यान को धारण कर श्रावक अपने जीवन को उज्जवल बनाता है। पुण्यवाणी के बिना किसी का वचन किसी पर लागु नही होता। ऐसा जरुरी नहीं सतं मुनिराज की वाणी ही सही मार्ग दिखाती है जो श्रावक धर्म को अपने जीवन धारण कर धर्म साधना करते है वे भी अपनी वाणी से दूसरो को प्रभावित कर धर्म मार्ग पर आरूढ़ करते है। तीर्थ का अर्थ है तिराने वाला भगवान ने साधु साध्वी श्रावक श्राविका चारो को तीर्थ कहा ‘साधु- साध्वी पूर्ण रूप से संयम धारण करते है और श्रावक-श्राविक आंशिक रूप से पर दोनों का लक्ष्य तो मोक्ष ही है।

सभी को अपने घर- ऑफिस, दुकान में काम करने वाले को मांसाहार का त्याग करने की प्रेरणा देनी चाहिए। गुरु भगवंतो के पास ला कर व्रत प्रत्याख्यान करवाना चाहिए। ज्ञानी जन कहते है जो धर्म को सुनता है तो उसमें रुचि जागृत होने से वह बार-2 धर्म श्रवण करेगा, जिससे वह निशिचित रूप से अपने हृदय में परिवर्तन ला पाता है और पाप से अवश्य निवृत्त होगा | भगवान जानते थे कि पढ़ने से ज्यादा सुनने से व्यक्ति, धर्म को अपने आचरण मे ला सकता है। भगवान के धर्म कोई जाति, कुल का भेद नहीं है भगवान के धर्म का पालन करने वाला कर्म से पहचाना जाता है जैन नाम से नही । धर्म के बारे अच्छी तरह से ना जानने वाला धर्म का सही ढंग से पालन नहीं कर सकता। ज्ञान के बिना दान भी तारने वाला नहीं । प्राप्त लक्ष्मी का सदुपयोग कुछ लोग ही कर पाते है। लक्ष्मी स्थायी नहीं है।

लक्ष्मी भोग, हाथ और पीछे से चली जाती है। जब तक दानान्तराय कर्म बंधा है तब तक वह दान नहीं दे सकता। मृत्यु के बाद व्यक्ति का संचित धन ऐसे ही यही संसार में छूट जाता है धन का सदुपयोग नही करने से वह पुण्यवाणी को बढ़ा नही पाता दान, शील, तप में जब भाव नहीं जुड़ते तब तक लाभ नहीं मिलता। जैसे करोड़ो का जहाज है पर पानी के बिना उसका मूल्य नहीं। पानी के बिना जहाज किस पर चलेगा। जहाज को गति पानी से ही मिलती है । उसी प्रकार भाव से दिया हुआ दान ही अच्छी गति में जीव को ले जा सकता है। इसलिए भगवान कहते हैं कि सुपात्र दान से मोक्ष, अनुकम्पा सहित दान देने से देवलोक का सुख और सांसारिक भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। अशुभ भाव से दान देने पर गलत फल मिलता है। ज्ञानीजन कहते है कि दान देते समय द्रव्य शुद्धि, पात्र शुद्धि, और भाव शुद्धि का विवेक ‘ रखना चाहिए। तभी दान तारने वाला बनता है अन्यथा दिये हुआ दान नष्ट हो जाता हूँ।

द्रव्य 32 दोषो से रहित होना चाहिए। मुनिराज सोने के रत्न के पात्र के समान है क्योकि वे पंच महाव्रतधारी है। सभी उनके आगे नतमस्तक होते हैं। ऐसे मुनिराज को उत्कृष्ट भाव से यदि एक दान भी दिया तो अवश्य मोक्ष में जाते है। अन्यथा दुर्गति की ओर ले जाता है। धर्मकार्य में किया जाने वाला दान गुप्त न रख प्रकट देना चाहिए जिससे दूसरों को भी प्रेरणा मिले पर सहधर्मी को दिया जाने वाला दान गुप्त रखना चाहिए। प्रवचन के पश्चात यस यस जैन बहु मण्डल, नार्थ टाउन का शुभारंभ गुरुदेव के मंगल पाठ द्वारा किया गया। बहु मण्डल की अध्यक्षा वंदना बोथरा, मंत्री अंकिता चोरड़िया, तथा कोषाध्यक्ष यशवंती मुथा को चुना गया।

अध्यक्ष अशोक कोठारी ने सुचना दी कि नार्थ टाउन में पर्युषण आध्यात्मिक महापर्व प्रारंभ दिनांक 14.08.2023 सोमवार से प्रारंभ होंगे। पर्युषण के आठ दिन तक अंतगड व प्रवचन प्रातः 8.30 से 11.30 बजे तक MLCP कार पार्किंग के पांचवें माला में होंगे। तथा कल्पसूत्र वांचन दोपहर 2 बजे से एवं प्रतिक्रमण सूर्यास्त वेला में होंगे।

सचिव ललित बेताला ने बताया कि पोषद करने वाले भाईयो के लिए AMKM स्थानक भवन विला NO 7 में तथा महिलाओं के लिए टावर NO 18 FLAT NO 103‌ में व्यवस्था रखी गई है।

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

Skip to toolbar