क्षमापना पर्व सामूहिक रूप से कल
चेन्नई. पूरे विश्व में एक जैन धर्म ही ऐसा है-जो क्षमा को भी पर्व के रूप में मनाता है। इस क्षमा पर्व को संवत्सरी महापर्व कहा जाता है। वर्ष भर में जाने अनजाने में हुई भूलों (गलतियों) के लिए क्षमा का आदान-प्रदान किया जाता है। यह विचार ओजस्वी प्रवचनकार डॉ. वरुण मुनि ने जैन भवन, साहुकारपेट में अभिव्यक्त किए। उन्होंने कहा जैसे एक व्यापारी प्रतिदिन शाम को रोकड़ मिलाता है, हिसाब लगाता है कि- कितना लाभ हुआ, कितना नुकसान। ऐसे ही प्रभु महावीर कहते हैं एक सच्चे धर्मात्मा को भी प्रति दिन सायं हिसाब लगाना चाहिए कि आज दिन भर में कौन सा अच्छा काम हुआ और कहां-कहां गलती हुई, किस किस का मैंने दिल दु:खाया, तो उसके लिए प्रतिक्रमण करें यानी जहां-जहां अतिक्रमण हुआ, वहां-वहां से अपनी आत्मा को विभाव से स्वभाव में लाना- इसे ही प्रतिक्रमण कहते हैं।
आज की भाषा में कहें तो आज की फाईल, आज ही क्लीअर कर लेना। परंतु कभी-कभी घटना ऐसी घट जाती है कि 2-4 दिनों तक मन में उथल-पुथल मची रहती है तो भगवान फरमाते हैं- पक्खी प्रतिक्रमण (अमावस या पूनम) तक अर्थात 15 दिनों में अपने मन को क्लीअर कर लेना। यदि तब भी गांठें न खुलें मन की तो फिर चातुर्मासि प्रतिक्रमण यानी महीने में अवश्य ही उस बात को छोड़ देना।
यदि इतने पर भी मन नहीं माने तो भगवान फरमाते हैं 1 वर्ष में तो अवश्य मन को शुद्ध कर लेना। आप से गलती हुई तो माफी मांग लेना और यदि सामने वाले से भूल हुई तो माफ कर देना। परंतु एक साल के बाद भी यदि आप मन की गांठ नहीं खोलते, क्षमा याचना नहीं करते तो भगवान महावीर फरमाते हैं – आप आराधक नहीं विराधक हो।
उप प्रवर्तक पंकज मुनि ने कहा क्षमा मांगना और क्षमा देना, यह कायरों का नहीं शूरवीरों का काम होता है। कायर व्यक्ति न तो क्षमा मांग सकता है और न ही क्षमा दे सकता है। इसीलिए क्षमा वीरस्य भूषण क्षमा को शूरवीरों का आभूषण कहा गया है। श्री संघ के मंत्री महीपाल चोरडिय़ा एवं भरत नाहर ने बताया कि- 3 सितंबर के दिन चारों ही संप्रदाय का श्री जैन महासंघ द्वारा सामूहिक क्षमापना पर्व मनाया जाएगा।













