श्री जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में जय वाटिका मरलेचा गार्डन में जयधुरंधर मुनि के सानिध्य में वीर निर्वाण कल्याणक के उपलक्ष्य में जयपुरंदर मुनि ने रुप चौदस के पावन अवसर पर कहा कुछ पर्वों के साथ तिथि का भी नामकरण जुड़ा हुआ होता है।
जैसे धनतेरस, रुप चोदस आदि। रूप चौदस को नरक चतुर्दशी और काली चतुर्दशी भी कहा जाता है। दिवाली के पूर्व घर घर की सफाई करते करते जब चेहरा धूल से आच्छादित हो जाता है तो वापस तेरस तक की सफाई करके चौदस के दिन अपने रूप को संवारते हैं इसलिए रूप चतुर्दशी कहते हैं।
वास्तव में बाह्य रूप से ज्यादा महत्व आंतरिक रूप का होता है, जो व्यक्ति के गुणों से निखरता है। शक्कर दिखने में श्वेत और कस्तूरी दिखने में काली होती है पर कीमत से देखें तो कस्तूरी की कीमत अधिक होती है। रूपवान से ज्यादा कीमत गुणवान की होती है।
दिवाली के विशेष प्रसंग पर मुनि ने कहा कि संपूर्ण भारत वर्ष में दीपावली प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है। सूर्य, चंद्र, दीपक आदि से होने वाले द्रव्य प्रकाश से भी ज्यादा जरूरी अपनी आत्मा के ज्ञान के प्रकाश को जागृत करना है। जब ज्ञान रूपी प्रकाश व्याप्त हो जाता है तो अज्ञान रूपी अंधकार स्वतः ही दूर हो जाता है। भगवान महावीर ने अपने केवल ज्ञान रूपी सूर्य के प्रकाश से इस समस्त जगत को आलोकित किया है।
भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात उनके द्वारा प्रेरित उपदेशों को ग्रहण करते हुए उनका अनुसरण करना ही सच्ची श्रद्धांजलि है। भगवान महावीर ने निर्वाण से पूर्व 48 घंटे तक निरंतर धारा प्रवाह देशना दी जो आज भी उपलब्ध है। भगवान महावीर के वियोग से बोध प्राप्त कर उनके प्रमुख शिष्य गौतम स्वामी को भी केवल ज्ञान प्राप्त हुआ।
इसके पूर्व जयपुरंदर मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र के 16 से 23 अध्ययन तक का मूल पाठ का वांचन किया। जिससे बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने श्रद्धा पूर्वक एकाग्रता से श्रवण किया।दिवाली पर्व के अवसर पर 60 श्रावक – श्राविकाएं तेले तप की सामूहिक आराधना कर रहे हैं।
28 अक्टूबर, सोमवार को जयधुरंधर मुनि के तेले तप की मौन साधना एवं उत्तराध्ययन सूत्र के 36 वें अध्ययन के वांचन के साथ महामांगलिक का आयोजन प्रातः 8:30 बजे से होगा।