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योगसाधना के माध्यम से पतित आत्माएं भी पावन बन जाती है: उपाध्याय युगप्रभविजय

योगसाधना के माध्यम से पतित आत्माएं भी पावन बन जाती है: उपाध्याय युगप्रभविजय

किलपॉक स्थित एससी शाह भवन में विराजित उपाध्याय युगप्रभविजय ने प्रवचन में कहा कि योगसाधना के माध्यम से पतित आत्माएं भी पावन बन जाती है। हमारे जन्म के साथ हमें धर्म मिला हुआ है। हम तो पतित में पतित नहीं है क्योंकि हमें मानवभव मिला है। यदि हमारे जीवन में योग सिद्ध हुआ तो हमारा आत्मकल्याण निश्चित है। जो अपनी इंद्रियों को वश में करे, वह शूरवीर होता है। जो धर्म का आचरण करे, वह पंडित यानी ज्ञानी होता है। जो ज्ञान हमें बचाने में नहीं, डुबाने का कार्य करता है वह ज्ञान व्यर्थ है। यदि हम ध्यानयोग करते हैं तो हमारा अपना कल्याण हो जाएगा, चाहे हम आर्य देश में है या अनार्य देश में।

उपाध्याय प्रवर ने कहा कि जिस प्रकार दीपक की भूमिका अंधकार में होती है, उसी तरह मरुदेवी माता ने धर्म की स्थापना न होते हुए भी योगसाधना से मोक्ष प्राप्त किया। जो व्यक्ति वृद्ध हैं, उनको भी मरुदेवी माता के समान मोक्ष का सोचना चाहिए। अंतिम समय में भी धर्मयोग के कारण मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। मोक्ष का मार्ग ऐसा ग्रहण करना चाहिए जो तारक यानी राजमार्ग हो, मारक यानी डाइवर्जन नहीं। अनुकूल शक्ति व समय मिला है तो राजमार्ग से वंचित रहने से बहुत बड़ा दोष लगता है। अनुकूल कर्म, परिस्थिति, सानिध्य, स्थान, कुल मिला है तो डायवर्जन की जरूरत नहीं है।

उन्होंने कहा, चारित्र की भाव स्पर्शना से आत्मकल्याण हो सकता है। यदि अनुकूल स्थिति नहीं है तो भगवान की आज्ञा के अनुरूप चारित्र ग्रहण करना चाहिए। चारित्र लेने के बाद पालन करना महत्वपूर्ण है। दूसरों के दुष्कर्म को समता के साथ सहन करना चाहिए। हमारी यह भावना रहनी चाहिए की दूसरों की भावनाओं को ऊपर ले कर आएं, गिराए नहीं। उन्होंने कहा, आराधना शुद्ध तभी बनती है, जब आपका उपद्यान तप पूर्ण किया हुआ हो, क्योंकि उपद्यान तप द्वारा आप सूत्र बोलने के अधिकारी बन जाते हैं। आपको सोचना है, आपको खुद के सूत्रों से आराधना करनी है या कर्ज के सूत्रों से। आराधना के सूत्र को बोलने का लाइसेंस तब ही मिलता है जब शास्त्र की विधि के अनुसार कम से कम एक उपद्यान की माला आपने पहनी हो, लेकिन पूर्व कृपालु आचार्यों ने करुणा दिखाकर बिना उपद्यान किए बोलने की आज्ञा दी है। जब तक आप उपद्यान तप नहीं करते, सूत्र बोलने का कर्ज हमारे ऊपर रहता है। परमात्मा ने बताया कि जीवन में कम से कम एक उपद्यान तप की माला अवश्य पहननी चाहिए, तब हम सूत्र बोलने के कर्जे से मुक्त बनते हैं। प्रवचन के दौरान कलापूर्ण आराधक मंडल के सदस्यों ने उपस्थित होकर आचार्य उदयप्रभुसुरीश्वर के सानिध्य में दिसंबर में केशरवाड़ी में होने वाले उपद्यान तप से सबको जुड़ने की विनंती की।

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