किलपाॅक में विराजित आचार्य तीर्थ भद्रसूरिश्वर ने उत्तराध्ययन सूत्र के तीसरे अध्याय की विवेचना करते हुए कहा चार चीजें बहुत दुर्लभ है मनुष्य जन्म, धर्म श्रवण की रुचि, धर्म के प्रति श्रद्धा और धर्म का आचरण।
तीर्थंकर परमात्मा यही कहते हैं मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है। इसकी विशिष्टता है कि इसमें हम स्वाधीन है। जो अन्य गति में नहीं कर सकते हैं, वह यहां कर सकते हैं। यहां व्रत, पचक्खाण कर सकते हैं। यही है मनुष्य जन्म जहां शुभ भाव व शुभ ध्यान पैदा होते हैं।
दूसरी कोई गति में यह संभव नहीं है। नरक गति में जीव इतने पीड़ित होते हैं कि शुभ भाव या ध्यान अदृश्य हो जाते हैं। तीर्यंच गति में भी विवेक के अभाव के कारण शुभ भाव, ध्यान आना मुश्किल है। देवगति में भोग, सुख इतने सारे हैं कि देव उनमें लीन हो जाते हैं। केवल मनुष्य जन्म में ही शुभ भाव व ध्यान से कर्मों का क्षय व आध्यात्मिक विकास मिल सकता है।
उन्होंने कहा आप अन्दर से शोध करो, मेरा चौरासी का फेर कब टूटेगा और आध्यात्मिक जीवन प्रारंभ हो पाएगा। इसी का नाम भव निर्वेद यानी भव से मुक्ति है।
उन्होंने कहा परमात्मा से मांगना है तो भव का निर्वेद मांगो और कुछ नहीं चाहिए ताकि इस चौरासी लाख के फेर से मुक्त हो सको। जब तक संसार में भ्रमण कर रहे हैं तो दुख तो आने वाले ही हैं। इन्हें रोकने की ताकत किसी में नहीं है। दुख से छुटकारा पाने की कोशिश मत करो, इस भव से छुटकारा पाने का प्रयास करो।
दूसरी दुर्लभ चीज है श्रवण। महावीर भगवान ने बताया कि धर्म श्रवण दुर्लभ नहीं है धर्म श्रवण की रुचि दुर्लभ है। पंचेंन्द्रिय अवतार के रुप में आपके पास धर्म की सामग्री है जो श्रवण करने में सहायक होगा। दूसरी चीज आप संघी यानी आपको मन की प्राप्ति हुई है। तीसरी चीज आपको श्रवण कराने वाले सद्गुरु मिले हैं।
उन्होंने कहा धर्म का श्रवण उसीसे करना चाहिए जिसके जीवन में धर्म का आचरण है अन्यथा असर नहीं होगा। चौथी चीज आपको श्रवण करने का स्थान भी प्राप्त है पर श्रवण में रुचि नहीं है तो कोई मतलब नहीं है। धर्म की रुचि हर पल होनी चाहिए। आज हम देख रहे हैं कि श्रवण की रुचि कम होती जा रही है। एक बात समझ लेना हमारे मन में शुभ विचार व ध्यान तभी पैदा होगा जब धर्म का श्रवण होगा।
उन्होंने कहा प्रवचन का स्तर कैसा है यह महत्वपूर्ण नहीं है, धर्म, शास्त्रों व महापुरुषों की वाणी के दो शब्द कानों में पड़े यह महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार हवा, पानी व भोजन के बिना शरीर का अस्तित्व नहीं है उसी प्रकार आत्मा व समाधि सुख के अस्तित्व के लिए धर्म आवश्यक है।
धर्म हमारा जीवन है यह बात दिमाग में डाल दीजिए। धर्म के प्रति श्रद्धा होगी तब ही श्रवण की रुचि पैदा होगी। धर्म का स्वरूप जानने की जिज्ञासा होनी चाहिए। जब सीता पर कलंक आया तो उन्हें जंगल में भेज दिया गया। लेकिन उन्होंने अपने पाप कर्म का उदय मानकर स्वीकार कर लिया।
उन्होंने रामचंद्रजी को संदेश भिजवाया कि लोगों की बात सुनकर मेरा त्याग कर दिया उससे कोई नुकसान नहीं होगा लेकिन कल लोग धर्म की निंदा या अवहेलना करेंगे तो लोगों की बात सुनकर धर्म का त्याग मत करना। सीता के मन में धर्म की श्रद्धा कितनी थी। घोर आपत्ति आने पर भी उन्होंने किसी को दोष नहीं दिया।