जोधपुर / बाबू की शुद्धि के बिना आत्मा का कल्याण संभव नहीं है। जोधपुर में अपने चतुर्मासिक प्रवचन के दौरान उपाध्याय प्रवर रविंद्र मुनि ने कहा कि साधना की उर्जा व्यक्ति के कर्मों के आवरण को हटाती है। साधना से ही व्यक्ति के भावों में शुद्धि आती है और तब जाकर आत्मा का कल्याण संभव होता है।
जो व्यक्ति दूसरों का तिरस्कार करता है वैसा व्यक्ति संसार रूपी जंगल में लंबे समय तक भटकता रहता है। तिरस्कार व्यक्ति अपनी भाषा शब्दों के माध्यम से भी करता है। तिरस्कार व्यवहार के माध्यम अथवा अहंकार और घमंड से भी होता है। भारत काल की एक घटना का जिक्र करते हुए उपाध्याय प्रवर ने बताया कि एक बार दुर्योधन पांडवों से मिलने उनके महल आया और महल की सुंदरता और चकाचौंध में दुर्योधन को धोखा हो गया और वह पानी की होद में जा गिरा। इस घटना को द्रोपति दूर से ही देख रही थी। दुर्योधन के पानी में गिरने के बाद द्रौपदी ने ठहाका लगाते हुए कहा कि अंधे का पुत्र अंधा। यहां द्रोपदी ने दुर्योधन का तिरस्कार किया जिसके परिणाम स्वरूप महाभारत की घटना हुई।
मान सम्मान की अति भूख साधक को भटका देती है। इसलिए साधक को इससे एक उचित दूरी बनाकर रखनी चाहिए। समभाव उसी को रह सकता है जो अपने को हर प्रकार के भय से मुक्त रखता है। समभाव की साधना वही व्यक्ति कर सकता है जो अनेक प्रकार के भय से दूर हो।
रविंद्र मुनि ने कहा कि बुद्धिमान को किसी से झगड़ा या क्लेश नहीं करना चाहिए। कला क्लेश मनुष्य को आत्महत्या की ओर प्रेरित करता है तो वही दूसरे की हत्या के लिए भी प्रेरित करता हैं, इसीलिए जरूरी है कि मनुष्य कलह क्लेश से दूर रहे। कलह के कारण मनुष्य मानसिक क्लेश और विकार से भर जाता है।

अज्ञानी आत्मा वह है जो पाप करके भी हर्ष महसूस करती है। आत्महित का अवसर मुश्किल से ही मिलता है। कोई इसे पहचान पाता है तो कोई नहीं। कुछ इसका लाभ ले पाते हैं तो कुछ इससे वंचित रह जाते हैं। धर्म प्रवचन का लाभ आत्म हिट होता है। प्रबुद्ध साधक ही मृत्यु की सीमा को पार कर अजर अमर होता है। किसी भी साधु साध्वी को दीक्षा ग्रहण के बाद स्वाध्याय पर विशेष ध्यान देना चाहिए। मृत्यु की सीमा का मतलब हर जन्म के बाद मृत्यु होती है और फिर जन्म होता है। वही मृत्यु की सीमा को पार करने का मतलब जन्म मरण से छुटकारा पा लेना होता है।
सच्चे साधक की दृष्टि में कामवासना रोग के समान होती है। जो सच्चा साधक है वह काम भोग को पीड़ा मानकर उससे दूर रहता है। उपाध्याय प्रवर बताते हैं कि साधक को सुख का अभिलाषी नहीं होना चाहिए। जो मिल रहा है उसे हर से स्वीकार करना चाहिए। मन में किसी प्रकार की लालसा या जागृति किसी चीज को पाने की नहीं होनी चाहिए। मनुष्य अकेला ही दुनिया में आता है और अकेला ही परलोक जाता है। सभी प्राणी अपने अपने कर्मों के कारण विभिन्न प्रकार की योनियों में जन्म लेते हैं। पर्वो में सबसे बड़ा पर्व पर्युषण पर्व है।