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भगवान की तरह प्रकृति भी किसी के साथ भेदभाव नहीं करते: ऋषि मुनि जी

भगवान की तरह प्रकृति भी किसी के साथ भेदभाव नहीं करते: ऋषि मुनि जी

सभी धर्मों का त्याग कर सनातन धर्म को अपनाओ, तुम मेरी शरण में आओ मैं तुम्हें पापों से मुक्त कर दूंगा। यह कहना है भगवान श्री कृष्ण का। जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान श्री कृष्ण के कथनों की चर्चा करते हुए ऋषि मुनि जी ने कहा कि सत्य जाने की भगवान श्री कृष्ण का भरोसा करो और किसी का नहीं। उन्होंने इस मौके पर एक कहानी का जिक्र करते हुए कहा कि एक ब्राह्मण रोज भिक्षा मांग कर अपना गुजारा करता था। एक दिन ब्राह्मण की मुलाकात अर्जुन से हुई। अर्जुन ने ब्राह्मण को 1000 स्वर्ण मुद्राएं यह सोच कर दी कि ब्राह्मण अब के बाद भिक्षा मांगने नहीं जाएगा। लेकिन रास्ते में ही ब्राह्मण को एक लुटेरा मिला और लुटेरे ने ब्राह्मण से सारी सोने की हजार मुद्राएं लूट ली।

अब ब्राह्मण फिर से भी भिक्षा मांगने लगा। दो दिनों के बाद अर्जुन की नजर फिर से उस ब्राह्मण देवता पर पड़ी। अर्जुन ने ब्राह्मण को बुलाकर के उस से भिक्षा मांगने का कारण पूछा तो उसने सारी घटना वृतांत में बता दी। इस बार अर्जुन ने ब्राह्मण को हीरे की अंगूठी देखकर वापस भेजा। ब्राह्मण हीरे की अंगूठी लेकर घर गया और उसने उसे पुराने घड़े में जाकर रख दिया जहां कोई नहीं आता जाता था। अंगूठी घड़े में रखकर ब्राह्मण बाहर चला गया। इधर ब्राह्मण देवता की पत्नी घड़ा लेकर पानी भरने नदी किनारे गई। वापसी में उसका घड़ा फूट गया। वह घर जाकर फिर से पुराने घड़े को लेकर आई और उसमें पानी भर कर घर वापस चली आयी।

अब जब ब्राह्मण देवता वापस घर लौटता है तो पुराने घड़े में पानी देखकर छाती पीटने लगता है। पत्नी जब ब्राह्मण से इसका कारण पूछती है तो उसने सारी कहानी बता दी। दोनों पति-पत्नी इस घटना को लेकर विलाप करने लगे। ब्राह्मण फिर से भिक्षा मांगने लगा। अब अर्जुन की नजर फिर से ब्राह्मण पर पड़ी, उसने ब्राह्मण से भिक्षा मांगने का कारण पूछा तो ब्राह्मण ने सारी घटना बताई। अर्जुन ने इस बार ब्राह्मण देवता को कृष्ण की तरफ इशारा करते हुए कहा कि आप उनसे ही मांगो।

ब्राह्मण देवता भगवान कृष्ण के पास गए, भगवान कृष्ण ने ब्राह्मण देवता को एक आना देते हुए विदा किया। ब्राह्मण क्या सोच रहा था कि वह इस एक आने का करेगा क्या? उसने सोचा कि इस गाने को किसी को दान कर देता हूं। तभी उसे सामने एक मछुआरा दिखा जो पानी में जिवित मछलियां रख कर उसे बेच रहा था। ब्राह्मण देवता ने एक आने में उससे एक जीवित मछली खरीदी और उसे नदी किनारे ले जाकर छोड़ने गया।

ब्राह्मण जैसे ही मछली को नदी में छोड़ता है मछली अपने मुंह से कुछ गलती है जो कि तट पर पत्थर से टकरा कर गिरता है। ब्राह्मण की नजर उस चीज पर पड़ी तो आश्चर्यचकित रह गया। यह वही हीरे की अंगूठी थी जो उसे अर्जुन ने दिया था। इसके बाद वहां से वही लुटेरा गुजर रहा था जिसने ब्राह्मण से स्वर्ण मुद्राएं लूटी थी। उसने ब्राह्मण को स्वर्ण मुद्राएं वापस करते हुए कहा कि इस घटना के बारे में किसी को ना बताएं। इस कहानी का सार यही है कि जो चीज भगवान देता है हम उसका कोई मोल नहीं समझते लेकिन वह अत्यंत ही बहुमूल्य होता है।

आगे उपाध्याय प्रवर रविंद्र मुनि जी कहते हैं कि हमें बोलने से पहले अपने वचनों को तूल कर बोलना चाहिए। इसलिए जो कुछ भी बोले वह सोच समझ कर बोलें। अपने शब्दों का प्रयोग ऐसे करना चाहिए जिससे किसी को चोट या दुख ना पहुंचे। समग्र विश्व को जो समभाव से देखता है वह न किसी का प्रिय करता है ना किसी का अप्रिय करता है। समदर्शी अपने पराए के भेद से दूर रहता है।

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