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बुद्धि में विवेक का समावेश ही सद्बुद्धि है – साध्वी सुयशा

बुद्धि में विवेक का समावेश ही सद्बुद्धि है – साध्वी सुयशा

जय जितेंद्र, कोडमबाक्कम् वड़पलनी श्री जैन संघ के प्रांगण में आज तारीख 19 जुलाई मंगलवार, परम पूज्य सुधाकवर जी महाराज साहब के मुखारविंद से:-परमात्मा की अंतिम देशना के उत्तराध्ययन जैन सूत्र में 36 अध्याय है उसमें 29 वा अध्याय चल रहा है इसमें 73 प्रश्नों के समाधान दिए गए हैं! जहां पर आत्मा कई बंधनों से मुक्त हो जाती है वे आत्मायें संसार में रहते हुए भी भोगों के प्रति आकर्षित और आसक्त नहीं होती! कमल कीचड़ में रहता है लेकिन वह ऊपर उठकर रहता है!भरत राजा छ: खण्ड के अधिपति थे लेकिन वे कभी भी आसक्ति भाव से नहीं जिये!

जहाज अपने अंदर पानी को नहीं आने देता तो डूबता नहीं है! वैसे जो व्यक्ति निर्वेद भाव से रहता है वह संसार रूपी सागर में कभी डूबता नहीं है! दाई माता बच्चे का पालन पोषण बड़े स्नेह वात्सल्य से करती है लेकिन फिर भी उसे पता है कि यह बच्चा उसका नहीं है! वैसे ही सम्यक्त्वी आत्मा, जो अपने परिवार से बेहद प्यार करता है, उसे पता है कि यह परिवार मेरा नहीं है और मैं इस परिवार का नहीं!जिसके मन में निर्वेद भाव हो वह नर से नारायण जाएगा!

परम पूज्य सुयशा श्री जी महाराज साहब के मुखारविंद से:-हमारे जीवन में सरल भाव, स्वीकार भाव, संयम भाव, संतोष भाव और समर्पण भाव की बहुत जरूरत है! “संयम भाव” का मतलब होता है अपने आप पर नियंत्रण यानी self-control.आजकल जरूरत से ज्यादा रुपया पैसा ज्यादा होते ही हम आउट ऑफ कंट्रोल हो जाते हैं! धन-संपत्ति भले ही अपनी हो लेकिन उसका बेलगाम उपभोग नहीं करना चाहिए बल्कि सदुपयोग करना चाहिए! “संतोष भाव” का मतलब हमारे काम ऐसे होने चाहिए जिससे हमें संतोष हो! लेकिन कभी-कभी कुछ परिस्थितियां अनुकूल नहीं होती है! उसके लिए धीरज रखना पड़ता है क्योंकि हमारे उतावले पन से यह प्रबल प्रयासों से बात बिगड़ सकती है!

“समर्पण भाव:-हमारे जीवन में हमारे माता पिता का, गुरु भगवंतो का, नाते रिश्तेदारों का बहुत उपकार हमारे ऊपर रहता है! हमारे जीवन में प्रत्येक दिन दूधवाला, न्यूज पेपर, वॉचमैन कार ड्राइवर से काम रहता है! हमारे व्यापार में सभी तरह के सहयोगी रहते हैं! हमें सभी के प्रति समभाव से समर्पित होना चाहिए! बुद्धि वो करवाती है वह हमें अच्छा लगता है! लेकिन सद्बुद्धि वह करवाती है जो हमारे लिए अच्छा होता है! इच्छा को तुरंत पूर्ति करने को “बुद्धि” कहते हैं! इच्छाएं मन से ऊपजती है! और हमारा मन सात्विक है इसकी guarantee तो हम भी नहीं ले सकते।

बुद्धि में जब विवेक मिल जाए तो उसे सद्बुद्धि कहते हैं और यही सद्बुद्धि हमारी गति को सुगति बनाती है! आज की धर्म सभा में श्रीमान अशोक जी तालेड़ा ने 16 उपवास, श्रीमती सुशीला जी बाफना ने 8 उपवास, एवं श्रीमती प्रकाश बाई लालवानी ने 7 उपवास के प्रत्याख्यान किए। इसी के साथ कई धर्म प्रेमी बंधुओं ने विविध तपस्याओं के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।

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