कांकरिया गेस्ट हाउस, किलपाक में श्री जैन रत्न हितैषी श्रावक संघ,तमिलनाडु के तत्वावधान में भगवान महावीर जैन विद्यापीठ के प्राचार्य श्री प्रकाशचंदजी जैन, जयपुर द्वारा व्याख्यान माला में संयम की महत्ता बताते हुए कहा कि आत्मशुद्धि का सर्वश्रेष्ठ उपाय संयम हैं | प्रभु के उपदेश दो रुप में हैं विध्यात्मक व निषेधात्मक | धर्म में जीव का मन लगना, प्रवर्ति करना अर्थात अपने जीव को धर्म से जोड़ों और निषेधात्मक में पापों से निवृति अर्थात पाप से नाता तोड़ो |
पृकृति भी अगर कुछ पल के लिएसंयम तोड़ दे, मर्यादा छोड़ दे तो विनाशकारी परिणाम हो जाते हैंl जैसे कच्छ-भुज में कुछ सेकंड मात्र के लिए आये भूकंप का परिणाम, सागर अगर अपनी सीमा लांघ दे तो चेन्नई में आई सुनामी की लहर से हुआ नुकसान और हवा अगर तूफान का रुप ले लेती हैं तो प्रलय हो जाती हैं | उत्तराध्ययन सूत्र के बत्तीसवें अध्ययन में पांच इन्द्रियों के दुरुपयोग के परिणाम स्वरुप क्या होता हैं | श्रोतेन्द्रिय के दुरुपयोग से वीणा के श्रवण में मग्न हिरण का शिकारी शिकार कर लेते हैं चक्षुन्द्रिय कि दुरुपयोग में दीपक की लो में पतेंगे की जीवन लीला समाप्त हो जाती उसी प्रकार घ्रानिद्रिय के कारण भृमरे का फूल की खुशबू में फूल में ही फस कर मरण को प्राप्त हो जाता हैं | रसनेन्द्रिय के अंतर्गत जीभ खाकर भी और बोल कर भी बिगाड़ती हैं |
साधु के लिए भाषा समिति,सत्य भाषा व वचन गुप्ति का पूरा विवेक आवश्यक बताया गया हैं | स्पर्शनेद्रिय के दुरुपयोग अंतर्गत हाथी का हथिनी के नकली रुप बनाकर हाथी द्वारा शिकारी के चंगुल में फस कर जीवन लीला समाप्त कर दिया जाना बताया हैं | इन्द्रियों के दुरुपयोग के कारण भरत क्षेत्र की दो स्वर्ण नगरियों लंका व द्वारिका के विनाश की बात बताई गई हैं | मन,वचन व काया रुप तीनो योगों के दुरुपयोग से क्या दुष्परिणाम होते हैं,विस्तृत रूप में व्याख्या की | उतराध्यन सूत्र के तेईसवें अध्ययन के अंतर्गत केशी व गौतमस्वामी संवाद में केशी की पृच्छा मन रुपी घोड़े को कैसे वश में करते हैं प्रत्युत्तर में गौतमस्वामी द्वारा इन्द्रियों को श्रुत रुपी ज्ञान की लगाम से वश में किया जाता हैं | भाषा के आठ लक्षणों में संक्षिप्त बोले,मधुरम बोले,निपुणता पूर्वक बोले,कार्य प्रतीतम बोले, तुच्छ वचन ना बोले,गर्वरहित वचन बोले,पूर्व संकलित बोले,धर्म सयुंक्तम बोले | संयम जीवन मे ब्रेक रुप हैं अतः सुरक्षा हैं और असंयममय जीवन मे खतरा हैं | संयम सभी समस्याओं का समाधान हैं | युवा रत्न स्वाध्यायी बन्धुवर श्री विनोदजी जैन ने अंतगड सूत्र का मूल व अर्थ सहित वांचन किया | श्रद्धालुओं ने तीर्थंकर चालीसा व संयम चालीसा की सामूहिक स्तुति की | संचालन शाखा प्रमुख युवा संदीपजी ओस्तवाल ने किया |
श्रावक संघ तमिलनाडु के कार्याध्यक्ष आर नरेन्द्र कांकरिया ने जानकारी दी कि प्राचार्य श्री प्रकाशचंदजी जैन ने शालीभद्र की लावणी सुनाकर सभी धर्मसभा के श्रद्धालुओं को मन्त्रमुग्ध कर दिया | दोपहर में श्राविका मण्डल द्वारा धार्मिक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया | श्री भोपालगढ़ जैन विद्यालय के अध्यक्ष श्री प्रसनचन्दजी ओस्तवाल ने कवि सूर्यभानुजी की देव-गुरु-धर्म व वैराग्य से ओत-प्रोत अनेक रचनाओं को मंत्र मुग्ध कर देने वाली राग में सुनाया | दोपहर के सत्र में प्राचार्यजी ने संघ सेवा क्या, क्यो और कैसे करे का विस्तार पूर्वक विवेचन किया |
प्रेषक :- श्री जैन रत्न हितैषी श्रावक संघ,तमिलनाडु स्वाध्याय भवन, 24/25 – बेसिन वाटर वर्क्स स्ट्रीट, साहूकारपेट,चेन्नई 600 001