Sagevaani.com @किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने अष्टान्हिका प्रवचन के पहले दिन पर्व का मतलब समझाते हुए कहा कि सारे संघ का मिलन, सारी साधनाओं का केंद्र पर्व कहलाता है।
पर्युषण तप, त्याग, शील, जीवराशि के प्रति मैत्री भावना आदि गुणों का विकास करने का महापर्व है। यह एक पर्व का रूप है, त्यौहार नहीं। त्यौहार के अंदर सामग्री की प्रधानता होती है, पर्व के अंदर तप, त्याग, साधना आदि का समावेश होता है। पर्व विवेक का दीपक जलाता है। त्यौहार भोगवाद प्रधान है तो पर्व त्यागप्रधान होता है। पर्व में पवित्रता का शोध चलता है। जैन शासन में कई पर्व होते हैं। पर्युषण पर्व सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, सम्यक् चारित्र और सम्यक् तप का पर्व है। इस पर्व का आयोजन आदिनाथ भगवान के काल से होता चला आ रहा है। इसकी विशेष चमक महावीर स्वामी के काल से आई है। कितना भी खराब कलिकाल आएगा, पर्यूषण पर्व हमेशा चलता रहेगा, ये वचन परमात्मा ने कहे।
श्रावक-श्राविका के कर्तव्यों में ग्यारह वार्षिक, पांच संवत्सरिक और पूरे जीवन के सात कर्तव्य बताए गए हैं। जीवन कर्तव्य में जिनप्रतिमा भरना, नए जिनमंदिर का निर्माण, दानशाला का आयोजन, मोक्ष माला का परिधान करना, दीन- गरीबों का उद्धार करना, आगम का लेखन करना और करवाना एवं संयम ग्रहण करना बताया है। उन्होंने कहा वस्तुपाल तेजपाल ने 700 दानशालाएं खोली। श्रुत के बिना साधु- साध्वी का अस्तित्व नहीं है और साधु- साध्वी के बिना जिनशासन का अस्तित्व नहीं है। हमने भौतिकवाद में घुसकर अध्यात्मवाद को विस्मृत कर दिया है। महापुरुषों ने पर्युषण के पांच कर्तव्य बताए हैं अमारी यानी अहिंसा प्रवर्तन, साधर्मिक भक्ति, क्षमापना, अट्ठम तप और चैत्यपरिपाटी।
आचार्यश्री ने कहा अब समय आ गया है, जब जीवन में जागृत होकर जीएं। प्रमाद हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। आप सोचिए, हमने मानवभव पाने के लिए कितनी मेहनत की होगी। अहिंसा के तीन प्रकार व्यवहार, विचार व आदर्श अहिंसा बताए गए है। शक्ति न होने पर क्रिया कम हो तो भी चलेगा लेकिन क्षमापना बिना चलेगा नहीं। क्षमापना पर्युषण पर्व का प्राण है। उसी तरह रुप, सौंदर्य कम हो तो चलेगा लेकिन स्वास्थ्य के बिना चलेगा नहीं। पशु- पक्षी प्रकृति के ऊपर जीते हैं, विकृति के ऊपर नहीं। आज मानव विकृति वाली जिंदगी जी रहा है। ज्ञानी कहते हैं सौ कथन से ज्यादा एक आचरण सुंदर होता है। इसलिए आचार परमो धर्म कहते हैं, ज्ञान परमो धर्म नहीं। जिनशासन त्याग प्रधान शासन है, यहां त्याग का अति महत्व है, भोग का नहीं।
साधु की भाव माता जयणा है। जिसने जयणा छोड़ दिया, उसके जीवन में विराधना घुस जाती है। सर्वश्रेष्ठ भक्ति साधार्मिक भक्ति को बताया गया है। क्षमापना यानी हृदय में क्षमा रखना। जो व्यक्ति क्षमापना नहीं दे सकता है, वह सबसे बड़ा कायर है। हमें क्षमा लेनी या देनी ही नहीं, रखनी भी है। अपने बहुत से पाप क्षमा के गुण से नाश होते हैं। क्षमापना के समय पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए। क्षमा रखने के लिए दाक्षिण्यता व प्रेमभाव रखना महत्वपूर्ण है। क्षमा पांच तरह से देते हैं उपकार क्षमा, अपकार क्षमा, विपाक क्षमा, स्वभाव क्षमा और आज्ञा क्षमा। इनमें स्वभाव क्षमा सबसे श्रेष्ठ है। उन्होंने कहा क्षमा जैसा धर्म नहीं, तप जैसा योग नहीं, ब्रह्मचर्य जैसा व्रत नहीं और साधु जैसी विरति नहीं।