Share This Post

Featured News / Featured Slider / ज्ञान वाणी

धर्म ध्यानी दूसरों के नहीं, बल्कि अपने दुर्गुणों को देखता है : साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

धर्म ध्यानी दूसरों के नहीं, बल्कि अपने दुर्गुणों को देखता है : साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

धर्मसभा में कहा- धर्म ध्यानी करता है अपने सुख-दुख का चिंतन और दुख के लिए दूसरों को नहीं अपने कर्मों को ठहराता है जिम्मेदार

Sagevaani.com @शिवपुरी। संसार में जीने वाला व्यक्ति आर्त और रौद्र ध्यान में जीता है, लेकिन धर्म और अपनी आत्मा में जीने वाला व्यक्ति धर्म ध्यानी और शुक्ल ध्यानी होता है। आत्मा की शुद्धतम अवस्था का नाम शुक्ल ध्यान है।

इस अवस्था तक पहुंचने के लिए धर्म ध्यान को अपने जीवन का अंग बनाना होगा। धर्म ध्यानी व्यक्ति दूसरों के नहीं, बल्कि अपने दुर्गुणों को देखता है और अपने दुखों के लिए दूसरों को नहीं, बल्कि अपने कर्मों को जिम्मेदार ठहराता है। उक्त शास्त्रोक्त वाणी प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने कमला भवन में आयोजित एक विशाल धर्मसभा में कही।

साध्वी रमणीक कुंवर जी ने कहा कि जो व्यक्ति आपकी आलोचना और बुराई करता है उसे सकारात्मक रूप से देखा जाना चाहिए। यदि उसके कथन में कुछ सच्चाई है तो उन दोषों को दूर करना चाहिए। साध्वी पूनमश्री जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि धर्म शुद्ध हृदय में निवास करता है। धर्म की उत्पत्ति श्रद्धा से हुई है।

धर्मसभा के प्रारंभ में साध्वी वंदनाश्री जी ने भजन जीवन में यदि कुछ पाना है तो कुछ खोना पड़ता है, फसल यदि पाना है तो बीज बोना पड़ता है… का गायन किया। इसके बाद साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने अशुभ ध्यान आर्त और रौद्र ध्यान की चर्चा करने के बाद शुभ ध्यान, धर्म ध्यान की विस्तार से व्याख्या की और इसके विभिन्न पहलुओं को उदाहरणों से स्पष्ट कर समझाया।

उन्होंने कहा कि आप धर्म ध्यानी हो या नहीं इसके लिए किसी से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है। आपके धर्म ध्यान का मूल्यांकन आप स्वयं कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म ध्यानी भगवान और गुरू की आज्ञा को मानता है, दूसरों के नहीं अपने खुद के दुर्गुणों को देखता है। अपने सुख-दुख का चिंतन करता है और दुखों के लिए दूसरों को नहीं स्वयं के कर्मों को जिम्मेदार ठहराता है।

इसके बाद वह चिंतन करता है कि कब तक इस संसार में भ्रमण करता रहूंगा। कब तक त्रियंच, नरक और संसार में अपने आपको खपाता रहूंगा। यह चार पाएं धर्म ध्यान के हैं। धर्म ध्यानी के लक्षणों का जिक्र करते हुए साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने बताया कि धर्म ध्यानी की रूचि भगवान की आज्ञा में होगी। सत्य को स्वीकार करने की उसमें रूचि होगी। सत्य के संबंध में वह जिज्ञासु होगा। जिन वाणी सुनने और पढऩे में उसकी रूचि होगी।

वहीं जिन वाणी के विषय में गहराई से चिंतन करने में उसकी रूचि होगी। धर्म ध्यानी के सहारों का उल्लेख करते हुए साध्वी जी ने बताया कि धर्म ध्यानी शास्त्र और सदसाहित्य पढऩे वाला होता है। शास्त्र पढ़ते समय उसके मन में जो जिज्ञासा आती है उसका समाधान वह सद्गुरू से करता है। जो पढ़ा है उसका दोहराव करता है ताकि वह उसके जीवन का अंग बन सके। इसके साथ ही वह धर्म कथा करे। शास्त्रों में और गुरूओं के श्रीमुख से जो सुना है उसे दूसरों को भी बताएं, यही धर्म कथा है।

धर्म ध्यानी की अनुप्रेक्षा का जिक्र करते हुए साध्वी जी ने कहा कि धर्म ध्यानी के मन में यह विचार दृढ़ता से होना चाहिए कि वह अकेला आया है और अकेला जाएगा। यहां तक कि यह शरीर भी उसके साथ नहीं जाएगा। जाएंगे तो सिर्फ उसके अच्छे बुरे कर्म, उसके पाप और पुण्य। उन्होंने एक गीत को दोहराते हुए कहा कि संसार में सुख के सब साथी हैं दुख में कोई नहीं। यह जीवन की सच्चाई है और इसे स्वीकारना चाहिए।

धर्म क्षेत्र में धन, पद और यश की नहीं होनी चाहिए पूजा

धर्म सभा में साध्वी पूनमश्री जी ने कहा कि धर्म क्षेत्र में धन, पद और यश की पूजा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया कि बहुत से साधु संत धनी और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को अधिक महत्व देते हैं। जबकि उनका आशीर्वाद सभी व्यक्तियों के लिए एक समान होना चाहिए।

आशीर्वाद में भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी यदि धर्म से विमुख हो रही है तो इसके जिम्मेदार उनके माता-पिता भी हैं जिन्होंने सही समय पर उन्हें संस्कार नहीं दिए।

साध्वी पूनमश्री जी ने कहा कि बचपन में दिए गए संस्कार जीवनभर याद रहते हैं। धर्म विहीन शिक्षा पद्वति को उन्होंने समाज के पतन के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान देने वाली नहीं होना चाहिए, बल्कि शिक्षा जीवन को रूपांतरित करने वाली होनी चाहिए।

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

Skip to toolbar