राष्ट्र संत श्रमण संघीय उपप्रवर्तक परम पूज्य श्री पंकज मुनि जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित प्रवचन श्रृंखला में भारत गौरव डॉ. वरुण मुनि जी महाराज ने आधुनिक समय की सबसे बड़ी चुनौती—बच्चों और युवाओं को धर्म से जोड़ने—पर सारगर्भित मार्गदर्शन दिया।
उन्होंने कहा कि आज मोबाइल, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया के आकर्षण ने नई पीढ़ी को ज्ञान से अधिक मनोरंजन और भौतिकता की ओर मोड़ दिया है, जिससे वे धीरे-धीरे धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। विद्यालयों में शिक्षा तो मिलती है, पर जीवन निर्माण, चरित्र, अनुशासन और मानवीय मूल्य सिखाने की कमी स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि संस्कारों की शुरुआत गर्भ से होती है, इसलिए माता-पिता के आहार, विचार और आचरण की पवित्रता से ही पवित्र आत्माओं का अवतरण संभव होता है। नशा, अशोभनीय मनोरंजन और असंयमित जीवन गर्भस्थ शिशु की सोच और संस्कारों को भी प्रभावित करते हैं, जो आगे चलकर समाज में हिंसा, अपराध और अव्यवस्था का कारण बनते हैं।
महाराज श्री ने बच्चों के विकास के तीन महत्वपूर्ण चरण बताए—0 से 7 वर्ष तक प्रेम और भावनात्मक पोषण द्वारा हृदय निर्माण, 7 से 14 वर्ष तक दिनचर्या एवं अनुशासन द्वारा मन और बुद्धि का विकास, तथा 14 से 21 वर्ष तक कौशल, जिम्मेदारी और कर्म-निष्ठा द्वारा जीवन निर्माण। उन्होंने बच्चों को सही वातावरण, समय और दिशा देने की ज़रूरत पर जोर देते हुए कहा कि धर्म को जितना सरल, सहज और रुचिकर बनाया जाएगा, युवा उतने ही उत्साहपूर्वक जुड़ेंगे। जटिलता पैदा करने से वे दूर जाते हैं और गलत संगत, पार्टियों, नशे और बहिर्मुखी जीवनशैली में भटक जाते हैं, जिससे परिवार और समाज दोनों प्रभावित होते हैं।
उन्होंने उदाहरण देकर कहा कि जिस तरह माता-पिता बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार उन्हें धर्म स्थान, सत्संग और पाठशाला के लिए भी प्रेरित करना चाहिए, ताकि संस्कारों के बीज पुष्पित-पल्लवित होकर धर्मनिष्ठ, संतुलित और जिम्मेदार नागरिक बन सकें। अंत में मुनी रत्न श्री रुपेश मुनि जी महाराज ने मधुर भक्ति-गीत प्रस्तुत कर सभा को भाव-विभोर किया और श्री पंकज गुरुदेव ने सभी श्रद्धालुओं को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।




