जैन संत डाक्टर राजेन्द्र मुनि जी ने गुरु पुष्कर जन्मोत्सव व भक्तामर साधना के प्रसंग पर बोलते हुए कहा कि गुरु के भीतर एक महान परम्परा छिपी हुई है जिसका अंत परमपिता परमात्मा तीर्थंकर आदिनाथ तक व्याप्त है! इस काल के धर्मका शुभारम्भ कर्ता ऋषभ देव प्रभु कहलाते है उनके द्वारा जो धर्म का मूल स्वरूप समझाया गया वहीं बीज रूप मे विकसित होता होता महावीर भगवान तक वट बृक्ष के रूप मे जन जन मे व्याप्त हो गया।
वर्तमान मे इसी महावीर परम्परा की साधना उपासना करते हुए आचार्यजन गुरुजन तक यह उपदेश चला आ रहा है! जीवदया से लेकर शाकाहार अहिंसा सत्य क्षमा विनय विवेक कर्मवाद लेश्यावाद तत्ववाद यह सारा उपदेश न केवल किसी सम्प्रदाय या धर्म विशेष के लिए स्थापित किया गया अपितु जन जन के आत्म कल्याण हेतू दिया गया है! मुनि जी ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि महापुरषो के सर्वजन हिताय सर्व जन सुखाय दिए गए अमृत तुल्य उपदेश वर्तमान मे हिन्दू बौद्ध ईसाई मुसलमान सिख पारसी नाना भांति धर्मों में बाँट दिए गए। इसका परिणाम संम्प्र्दावाद के दंगे फसाद के रूप मे प्राप्त हो रहे है जो धर्म शिक्षा दीक्षा जीव मात्र के कल्याण हेतू स्थापित किए गए वे ही आज तेरे मेरे रूप मे मन मुटाव पैदा कर रही है!
मुनि जी ने जीवन के दो रूप बतलाते हुए कहा एक जीवन देह रूप मे हमारे सामने मौजूद रहता तो है पर चिर स्थाई रूप धारण नहीं कर पाता दूसरा रूप जीवन का गुण रूप देह है जो पंच भूति देह के विलीन होने पर भी सदा शाशवत क़ायम रहती है! सभा मे साहित्यकार श्री सुरेन्द्र मुनि जी द्वारा भक्तामर जी का स्वाध्याय सम्पन्न कराया गया गुरु पुष्कर जन्मोत्सव पर सामूहिक एकाशन साधना की आराधना की गई!महामंत्री उमेश जैन ने सूचना व संचालन का कार्य विधिवत सम्पन किया! दिनांक एक अक्टूबर को सामूहिक जाप दिवस को भव्य आयोजन जैन स्थानक मे सम्पन्न होगा।