पू.आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने फरमाया की
तिस धममे नीचे सासाइये, सिझ्झी सिझम चाणेणं, सिझी संति तहावरे
(तर्फ: दिल के मरमान)
साधना का है समय सोना नहीं ,
मनुज जन्म हमको खोना नहीं,
भाग्य से जीन देव का शासन मिला …
भुलकर के भी कभी रोना नहीं, मनुज तन हमको मिला खोना नही..
साधना का हे समय—-
🔻किसी ने पुंछा गुरु देव श्रावक की क्या पहचान है? ①श्रावक पापभीरू होता है – जो पाप से डरता, भयभीत होता है वह श्रावक है,, हम अपना चिंतन करे हम पाप से डरते हे क्या?? हम पाप से नहीं *पापी से डरते है।* पाप *पाप* ही रहने वाला हे वह पाप कमी धर्म, नहीं बनेगा। *तिरस्कार* पाप का करना चाहिए *पापी का नहीं।* पापी से घृणा, अपेक्षा, अवहेलना करते है। पापी तो कभी भी *धर्मी* बन सकता है।
अर्जुनमाली प्रतिदिन 6 पुरुष 1 महीला की हत्या 6 महीने तक करता रहा। वह कितना पापी । भगवान ने अर्जुनमाली की उपेक्षा नहीं की,, वर जानते थे यह पापी सुधर सकता है। *वह घृणा, तिरस्कार* पाप का करना है।
पाप तो पाप रहने वाला है, वह पूण्य, धर्म नही बनेगा!!
अच्छा संपर्क मिल गया तो पापी सुधर सकता है,,, पापी संतो के संपर्क में आये और धर्मी बन ग *अर्जुनमाली, वाल्मीकि, अंगुलीमाल* पापी, क्रूर अपराधी लेकिन उनकी जीवन दशा बदल गई ।
जैन दर्शन तिरस्कार की सोच नहीं रखता। साधु कभी किसी के तिरस्कार की भावना में नहीं *परिष्कार* में जीते है। पापी भी निकृष्ठ उत्कृष्ठ बन जाता है।
*श्रावक कौन है?*
श्रावक तिरस्कार , घृणा नही करता , पापभीरु होता है लेकिन पापिभिरू नही होता,, पापी को गले लगा ले, अधर्मी को गले लगाते है आजकल श्रावक पापियों से डर रहे है, जीवन में पापी सामने आये तो प्रेम करे ,,प्रेम बुरे-से बुरे व्यक्ति को सुधार सकता है ।
सेठ सुदर्शन ने अर्जुन माली को तिरस्कार नहीं किया। उसने कहाँ में श्रमणोपासक हु, अरजुन माली ने कहा कि..में प्रभु महावीर के पास चल सकता हूँ ,, हा चल सकते हो
*भगवान महावीर* ने कहा कि… *जे पुण्यस्य कत्थई, जे पुच्छस्स कत्थई* जो उपदेश पुण्यवाण को दिया जाता है वही उपदेश पापीयों को भी दिया जाता है ।
*सम्भुज किं न भुज्ज* चण्डकोशिय की दृष्टि में आग थी जड़ चेतेन जल जाते। वह नाग कितना अधर्मी, पापी था। नरक के दलिये इकट्ठा कर रहा था। लोगो ने कहा इधर नाग है *भगवान महावीर* को इधर जाने से रोका वह नाग आग उकलता है! !! भगवान ने कहा सब कुछ अच्छा होगा! सोच का बड़ा प्रभाव है। इसी सोच का प्रभाव से चंडकोशिक नाग की और बढ़े ,, चंडकोशिक ने आसुरी भाव से भयावान महावीर की ओर देखा, कोई प्रभाव नही
हुआ। डंक मारूंगा इसको मौत के हवाले कर दूंगा,, भगवान के पेरो से *दूध की धारा निकलने लगी* नाग के मुंह पर लगा , थोडा सा अंश उधर वै तो सकुशल खड़े रहे। अब दृष्टि बदल गई, क्रूर दृष्टि से कोमलता आ गई , भगवान ने कातर (करुणा) दृष्टि से देखा ! तु बोध को प्राप्त कर .. छद्मस्थ अवस्था मे उपदेश दिया तु पिछला दो शब्द ने पीछले में उपदेश दिया – *बुज्झ बुझ किं न बुज्झई* तू पिछला जन्म देख तू कहाँ से आ गया । • दो शब्द ने चंडकौशिक के जीवन में क्रांति ला दी ,, मैंने पिछले जन्म में साधु के रूप में शिष्य पर क्रोध किया था। क्रोध संत को सांप बना देता है *क्षमा* सांप को स्वर्ग पहुचा देतीहै ….
*क्रोध* चण्डाल, क्रोध महांकाल, क्रोध त्यागो सभी.. क्रोध आग है, विष है ,नाग है महान, ज्ञान रोधक है इसे ज्ञानियों ने कहा…
देश छुड़वाता है, प्रीति छुड़वाता है..
पिता पुत्र भाई भी लड़ जाते है, पति पत्नी की आपस मे भीड़ जाते,
गालिया देते है, प्राण ले लेते है ,, क्रोध को त्यागो सभी सभी …
बाहर गिरगिट कभी सर बन जाते हो
क्रोध आया बातों में तो ले तन गये, ऐसी ठन जाती है बुद्धि हर जाती है…
क्रोध त्यागो सभी….
तेजी गर्मी में सिर तपे, जल जाते जब,, अपनाते है तब ठण्डा जल पीते हे
क्षमा जल पीजीये गुस्सा हर लिजिये क्रोध त्यागो सभी…
क्रोध क्या है? थोड़ा चिंतन करो ? *क्रोध* बहुत बड़ा *पाप है* ,समझ लिया तो विरति का भाव पैदा हो जाता है ।
भगवान ने चंडकौशिक नाग से घृणा नही की ।
*पहले न कगज न कलम न फ़ोन था प्रेम ,पवित्र ओर मोन था*
*लेश्या* क्या है?
लेश्या दो प्रकार की होती है *द्रव्य लेश्या, भाव लेश्या* जो जीव व कर्म का संबंध कराती है, आत्मा पर कर्म चिपकाने का काम करती है , लेश्या 6 होती है 3 अशुभ 3 शुभ है , *शुभ लेश्या* वाला स्वर्ग में जाता है , *अशुभ लेश्या* वाला नरक में जाता है ।
चंडकौशिक ने सिर बिल में किया और शरीर बाहर पड़ा है मुह बामी में 15 दिन का संथारा किया अंतिम समय मे शुभ अध्यवसाय, शुभ परिणामो से 8 वे देवलोक में उत्पन्न हुए।
यदि पाप का उदय नही है तो कोई कुछ नही कर सकता है , *मूल में पाप कर्म है ।*
कर्म अच्छे है तो कोई बुरा कर सकता है क्या?
*कर्म सत्ता* को स्वीकार करो, जो कुछ हो रहा है अपने *कर्म* से हो रहा हे।
*भ्रम का रोग* सबसे बड़ा रोग है ,भ्रम वाला *अशांत, अस्थिर* रहता है।
*उपडले वाले रोग* की मानसिकता है तो निकल दो , हम *सच्चे साधक* है तो कोई कुछ नही कर सकता ।
*प्रेम* से सुनी बात *दिल* मे उतरेगी , जबरजस्ती सुनाई गई बात दिल मे नही बैठेगी।