चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित साध्वी कंचनकंवर के सानिध्य में साध्वी डॉ. सुप्रभा ने कहा मानव उत्साह प्रिय है और समय-समय पर त्योहार-पर्व बनाता रहता है। प्रकृति की तरह मानव भी परिवर्तनशील है, उसे भी बार-बार उत्साह, उल्लास की जरूरत होती है और वह त्योहार-पर्व मनाता है।
त्योहार हमें प्रेरणा देते हैं और पर्व आत्मा को पवित्र करते हैं। पर्व पर त्याग, तप की आराधना, उपासना और साधना करते हैं। आत्मा के पास ले जाए वह उपासना, इष्ट के प्रति श्रद्धा और समर्पण करे वह आराधना और ईष्ट के जप, तप, नियमों का पालन करे वह साधना है। अपनी आत्मा के पास रहोगे तो एक दिन इष्ट के पास रहोगे।
हमारे चार कर्तव्य हंै- पोषध करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, आरंभ समारंभ से अलग रहना व जितनी हो सके तपस्या करना। हमारी आत्मा सम्यकत्व बनकर धर्माराधना से जुड़ी रहे ऐसा प्रयास करें। जैसे जीने के लिए जीवन वैसे ही आत्मा के विकास के लिए आवश्यक सूत्र प्रतिक्रमण बताया गया है। हमें द्रव्य से भाव प्रतिक्रमण की ओर बढऩा है। शत्रु, मित्र सभी के प्रति समभाव रखने की साधना है।
साध्वी डॉ.उदितप्रभा ने अंतगड़ सूत्र का वाचन किया। उन्होंने कहा इस आत्मा में अनादिकाल से कर्म लगे हैं, जो समय आने पर निर्जरित होते हैं। उस समय यदि शांति से नहीं भोगते हैं तो और ज्यादा कर्म बंधते हैं। कर्म आत्मा पर कर्ज है।
कर्जदार तीन तरह के हैं- पहला ऋण लेकर जब तक नहीं चुकाता चैन से नहीं रहता और समय से पहले चुका देता है। दूसरा ऋण की टेंशन रखता है और मांगने पर समय पर वापस धन्यवाद के साथ चुका देता है। तीसरा कर्जदार ऋण लेकर मौज-मस्ती करता है और मांगने पर देता नहीं और भला बुरा भी कहता है।
साध्वी डॉ.हेमप्रभा ने कहा पर्यूषण का चौथा दिन आत्मा के अभ्युदय का संदेश लाया है। धर्म साधना से आत्मा की ज्योति को जगाकर। इसे धवल, शुद्ध, निर्मल बना सकते हैं।
महापुरुषों ने इस ओर अग्रसर होने के तीन तत्व बताए हैं- पहला समय, दूसरा समझ और तीसरा शक्ति। तीनों में से यदि एक भी न हो तो धर्माराधना नहीं होगी। ं
शनिवार को भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक का वाचन और १ सितम्बर को राजस्थान केसरी प्रवर्तक पन्नालाल की जयंती मनाई जाएगी।