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जैन आचार दर्शन मनुष्य जीवन के व्यावहारिक पक्ष की उपेक्षा करके नहीं चलता: महासाध्वी पूज्या डॉ. श्री रुचिकाश्री

जैन आचार दर्शन मनुष्य जीवन के व्यावहारिक पक्ष की उपेक्षा करके नहीं चलता: महासाध्वी पूज्या डॉ. श्री रुचिकाश्री

श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी बावीस संप्रदाय जैन संघ ट्रस्ट, गणेश बाग श्री संघ के तत्वावधान में एवं शासन गौरव महासाध्वी पूज्या डॉ. श्री रुचिकाश्री जी महाराज आदि साध्वी वृन्द द्वारा दिनांक 5 अगस्त 2021 को प्रातः प्रवचन श्री गुरु गणेश जैन स्थानक, गणेश बाग में आयोजित किया गया।

साध्वी पूज्या श्री रुचिकाश्री जी महाराज ने अपने दैनिक प्रवचन श्रृंखला श्रावक के 21 गुण के अंतर्गत तीसरे गुण सौम्यता पर प्रवचन देते हुए फ़रमाया कि जैन आचार दर्शन मनुष्य जीवन के व्यावहारिक पक्ष की उपेक्षा करके नहीं चलता। जैनाचार्यों ने जीवन के व्यावहारिक पक्ष को गहराई से परखा है और उसे इतना सुसंस्कृत बनाने का प्रयास किया है कि जिसके द्वारा व्यक्ति इस जगत में भी सफल जीवन जी सकता है । यही नहीं, इन सद्गुणों में से अधिकांश का सम्बन्ध हमारे सामाजिक जीवन से है । व्यक्तिक जीवन में इनका विकास सामाजिक जीवन के मधुर संबंधों का सृजन करता है ।

ये व्यक्तिक जीवन के लिए जीतने उपयोगी है, उससे अधिक सामाजिक जीवन के लिए आवश्यक है। ये आध्यात्मिक साधना के प्रवेश द्वार है । श्रावक इनका योग्य रीति से आचरण करने के बाद ही अणुव्रतो और महाव्रतो की साधना कि दिशा में आगे बढ़ सकता है ।

साध्वी जी ने तीसरे गुण सौम्यता पर विश्लेषण करते हुए फ़रमाया कि सौम्य का अर्थ शांत प्रकृति है। श्रावक को दुख में घबराना नहीं एवं सुख में फूलना नहीं, प्रत्येक स्थिति में शांत रहना है, समता भाव में रहना है। आपने बताया कि सत्यता, मधुर वचन, सत्कर्म, उदारता एवं क्षमा जिसके जीवन में आ गयी उसमे सौम्यता आ गयी।

उन्होंने कहा पांच इंद्रियों के अनुकूल विषयों के प्रति मन में जो राग भाव पैदा होता है और इंद्रियों के प्रतिकूल विषयों के प्रति मन में जो द्वेष भाव पैदा होता है उसी के कारण आत्मा की समता नष्ट हो जाती है और आत्मा अशुभ कर्म का बंध करती है।

कर्म के उदय के कारण जीवन में सुख-दुःख तो आने ही वाले हैं। हर दिन हर समय एक समान स्थिति रहने वाली नहीं है लेकिन इन प्रसंगों में भी मन जब समता भाव से जुड़ा रहता है तब कर्मों की अपूर्व निर्जरा होती है। अत: आत्मा व मन को शुद्ध करना हो तो मन में समता भाव लाने का अभ्यास करना चाहिए।

आपने प्रेरणा दी कि हमने सच्चे देव धर्म गुरु को अपना जीवन समर्पित तो कर दिया है, सिर्फ हमें इतना काम करना है की हम समता भाव रखना सीख लें, अनुकूल और प्रतिकूल संयोगों में सुखी-दुखी न हों।

साध्वी श्री जिनाज्ञाश्री जी महाराज ने सुखविपाक सूत्र का वाचन किया और धर्म की महत्ता पर अपना उदबोधन दिया। संघ सदस्य सुनील सांखला जैन ने बताया कि रविवार दिनांक 8 अगस्त को श्रमण संघीय द्वितीय पट्टधर राष्ट्र संत आचार्य सम्राट पूय श्री आनंद ऋषिजी महाराज की 121 वीं जन्म जयंती, राजस्थान सिंहनी महासाध्वी पूज्या श्री चारित्रप्रभा जी म. सा. का 73 वां जन्मोत्सव एवं महासाध्वी पूज्या डॉ.श्री रुचिकाश्री जी म.सा. का 62 वां जन्मोत्सव श्री गुरु गणेश जैन स्थानक, गणेश बाग में तप त्याग से मनाया जायेगा।

आज के धर्म सभा में शहर के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। गणेश बाग श्री संघ के लालचंद मांडोत, सम्पतराज कोठारी, सम्पतराज मांडोत, सुरेशचंद चोरडिया, सुनील सांखला जैन, प्रकाशचंद मांडोत, राजू सकलेचा आदि पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित थे। महासाध्वी पूज्या डॉ.श्री रुचिकाश्री जी म.सा. ने मंगल पाठ प्रदान किया।

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