जैन संत डाक्टर राजेन्द्र मुनि जी ने पर्युषण के चतुर्थ दिवस पर चारित्र संयम पर बोलते हुए उन महान त्यागी तपस्वी आत्माओं को वंदन करते हुए चारित्र के तीन प्रकार बतलाए! मन वचन काया का संयम जीवन में अत्यावशक है! मन के संयम के अभाव में तरह तरह के रोग शोक जीवन में पनपते रहते है! जब व्यक्ति मन का गुलाम बन जाता है मन में हजारों इच्छाएं प्रतिदिन उभरती पणपति रहती है! उन तमाम इच्छाओ को इस जन्म में तो क्या कई जन्मो में भी पूर्ण नहीं की जा सकती! मन के मते चलने वालों का पतन ही हुआ है! मन संयम से जीवन का उथान कल्याण होता है! इसी के साथ वाणी का संयम भी आवश्यक है वाणी के चलते तो महाभारत हो गया! हम घर परिवार संघ समाज में शान्ति चाहते है तो हमेशा बोलने के पूर्व एक एक शब्द हृदय रूपी तराजू में तोल तोल के बोलना सीख लें! इसी से जुडा हुआ है अपनी काया का संयम अर्थात पांच इन्द्रियों को वश में रखना भी जरुरी है!
