किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीजी के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने अध्यात्म कल्पद्रुम ग्रंथ के बारहवें अध्याय देव शुद्धि अधिकार की विवेचना करते हुए कहा गुरु तत्त्व का बहुत महत्व है। धर्म की स्थापना तीर्थंकर परमात्मा ने की। उसकी रक्षा करने का कार्य गुरु करते हैं। सद्गुरु का मिलना सौभाग्य की ही नहीं, सद्भाग्य और अहोभाग्य की बात है। अब प्रश्न यह उठता है देव बड़े या गुरु?
परमात्मा को हम देव कहते हैं, गुरु महाराज को गुरुदेव कहते हैं। परमात्मा के लिए देव के आगे कुछ नहीं लगता है। गुरु के आगे देव लगता है। गुरु देव के जैसे होते हैं, इसलिए गुरुदेव कहते हैं। गुरु स्वयं देव बनने वाले हैं। गुरु के आचार में देव के आज्ञा की प्रतिष्ठा है। ज्ञानी कहते हैं परमात्मा हमें खोजने नहीं पड़ते, गुरु हमें खोजने पड़ते हैं।
परमात्मा पुरुष में सिंह के समान होते है क्यूंकि वे शेर के समान निडर व शौर्यवान होते हैं। अरिहंत देव परिषहों से डरते नहीं है, उनका सामना करते हैं। परमात्मा निडर हैं। वे सामने से छलांग लगा लेते हैं, इसलिए वे सिंह के समान है। वे सिंह की भांति अत्यंत अनिवार्यता के समय भोजन ग्रहण करते हैं। उन्होंने कहा वहीं, गुरु देवतत्त्व दिलाने वाले हैं। वे दूसरों का कल्याण करते हैं, दूसरों को हमेशा देने का काम करते हैं। वे अपने पास अनुकूलता रहने पर भी उसका बहिष्कार कर देते हैं।
आचार्य भगवंत ने कहा गुरुतत्त्व की पहचान उनके चारित्र पालन, परोपकार की भावना, संघ के प्रति आस्था, प्रस्तुति आदि से करना चाहिए, व्यवहार से नहीं। गुरु के पास चार पावर होते हैं प्योरिटी पावर, परफेक्शन पावर, प्रेडिक्शन पावर और पैशन। ये पावर होने पर ही सद्गुरु का चयन करना चाहिए। हमें गुरु की आवाज और अंतरात्मा की आवाज ही सुननी चाहिए। गुरु ऐसे होने चाहिए जो दूसरे गुरु की निंदा न करें। परमात्मा को राग- द्वेष के परिणाम कभी नहीं आएंगे। गुरु थोड़ा सख्त होकर बात कर सकते हैं। गुरु भगवंत जब भी मंदिर में आए, तब उनके सम्मान में खड़ा होना चाहिए। नहीं तो, वह अविनय का एक प्रकार है। गुरु का अनुशासन केवलज्ञान पर लाकर छोड़ता है। अनुशासन होता है कड़वा लेकिन परिणाम देता है मीठा। गुरु निमित्त देखकर शिक्षा देते हैं।
उन्होंने कहा केवल धर्म से केवलज्ञान नहीं होता है, धर्म का बहुमान अनिवार्य होता है। गुण आने के लिए प्रवृत्ति करना महत्वपूर्ण है। गुरु का बहुमान मोक्ष का मुख्य द्वार है। चारित्री आत्मा को चारित्र और गुरु दोनों के प्रति अहोभाव होना चाहिए। उन्होंने कहा जो जीवात्मा एक वर्ष से ज्यादा क्रोध, मान, माया, लोभ में लिप्त रहे तो उसे नरक में जाना पड़ता है। कोई व्यक्ति हमारे प्रति द्वेष रखता है तो हमारा मोक्ष नहीं अटकता है। प्रसन्नता का आधार समता भाव होता है। हमारे मन के अंदर ही समाधान रहता है। मन के अंदर मोह, राग, द्वेष नहीं रहे तो मन प्रसन्न रहता है। उन्होंने बताया चैत्य चार प्रकार के हैं निश्रा चैत्य, मंगल चैत्य शाश्वत चैत्य और अशाश्वत चैत्य।