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केश लूंचन से तन, मन और चेतना होती पवित्र : गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी 

केश लूंचन से तन, मन और चेतना होती पवित्र : गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी 

 

★ कर्मों के लोच से प्रकट होगा मूल स्वरूप

 

चेन्नई 09.08.2023 ; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने साधु जीवन में केश लूंचन के बारे में बताते हुए कहा कि हमारे भीतर में जो नाड़ियां है, रक्त प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है, घर की नालीयों में पानी के तेज बहाव से कचरा साफ हो जाता है, उसी तरह लोच की विधि में सारे बाल जब एक साथ उखड़ते है तो सारी नाड़ियां एकदम सक्रिय हो जाती है, रक्त प्रवाह तीव्र हो जाता है, सारा कचरा साफ हो जाता है। यह साधु की साधना है। यह तन की भी स्वस्थता देता है, मन की भी स्वस्थता देता है, चेतना की स्वस्थता भी देता है।

 

गुरु प्रवर ने कहा कि केश लूंचन से शरीर की सारी नाड़ियां, नशों के एक्टिव होने से तन स्वस्थ हो जाता है, ऊर्जा मिलती है। मन की स्वस्थता चिन्तन के आधार पर मिलती है। साधु जीवन की यही परीक्षा है। प्रतिकूलता में परीक्षा होती है- शरीर में हमेशा कष्ट भोगा हैं। शरीर को कष्ट मिलने पर चिन्तन चलता है, यह कष्ट शरीर का है, लेकिन आत्मा में शुद्धता है। केश लोच एक वैज्ञानिक विधि है, इस केच लोच से मुझे अपने आप को जानना है। परमात्मा फरमाते है, जो दिख रहा है वह तेरा असली स्वरूप नहीं है, जब केश लूंचन होगा, कर्मों का क्षय होगा, तब जो प्राप्त होगा, वह तेरा असली स्वरूप है। उसी स्वरूप को प्राप्त करने के लिए हम साधना करते हैं। तपस्या करते है, अठाई, सिढ़ी तप करते हैं। परसों से पर्वाधिराज पर्यूषण प्रारम्भ हो रहे हैं, हमें साधना के लिए तैयार होना है।

 

◆ कोई भी चेहरा, शरीर नहीं होता सुन्दर

गच्छाधिपति ने कहा कि कोई भी चेहरा, शरीर सुन्दर नहीं होता, उसका परिणाम है- असुन्दरता। क्योंकि हर शरीर मल, मूत्र से भरा है। जो चेहरा आज अच्छा लगता है, वही कल मुरझा जायेगा। शरीर का परिणमन विकृति है। कोई भी व्यक्ति अपना चेहरा बिना किसी की सहायता से नहीं देख पाता। हम हाथ को तो देख पाते हैं, पांव को देख पाते हैं। पर चेहरे को देखने के लिए दर्पण की सहायता ली जाती है। हम अपनी धारणाओं, विचारों, आग्रह को पूर्ण मानते हैं। लेकिन हम स्वयं आधे अधूरे हैं। और तो और हम खुद को भी अपने आप नहीं देख पाते, हम अपना चेहरा, सिर का पिछला भाग, पीठ को नहीं देख पाते।

 

◆ हर प्रश्न का उत्तर परमात्मा के पास

गुरु भगवंत ने कहा कि जब भी कोई समस्या या प्रश्न अनुत्तरित रह जाये। तब परमात्मा को भावों से अपने आप के सामने महसुस करना, आपके हर प्रश्नों का उत्तर मिल जायेगा। मैं सुखी-दु:खी, अमीर-गरीब, छोटा-मोटा हूँ, हर प्रश्नों का उत्तर परमात्म वाणी में मिलता है। केश लूंचन से हमारा मूल चेहरा प्रकट होता है। लोच दो चीजों का करना है- द्रव्य से लोच बालो का करना है और भावों से लोच अपने कर्मों का करना है। तभी हमारा असली चेहरा प्रकट होगा।

 

◆ जो मन से सहन किया जाता है, वह कष्ट नहीं, आनन्द देता

गुरुवर ने कहा कि तन में असाता होते हुए भी जो मन से साता में रहता है, वह वास्तव में साता है। जो दु:ख में भी सुखी रहता है, वह है साधु। जो सुख में भी दुखी रहता है, वह है संसारी। दु:ख का मूल कारण है तृष्णा। साधु जीवन में कदम कदम पर परीक्षाएं है, कभी अनुकूल आहार नहीं मिलता, स्थान नहीं मिलता। साधु कभी अनुकूलता की खोज भी नहीं करता, वह तो कहता है कि जो मिला वह अनुकूल है। अनुकूल ही मानता है, स्वीकार करता है। जो काम मन से करते है उसमें कष्ट महसूस नहीं होता, वहीं बिना मन से किये गए किसी भी छोटे से कार्य में भी कष्ट महसूस करता है। कष्ट सहना धर्म नहीं, अपितु समता, सहनशीलता के साथ सहन करना धर्म है।

समाचार सम्प्रेषक : स्वरूप चन्द दाँती

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