पुज्य जयतिलक जी म सा ने जैन भवन, रायपुरम में कषाय के निवृत्ति का उपदेश दिया। यह चार कषाय अनादिकाल से संसार परिभ्रमण करा रहा है! मुक्ति में बाधक चार कषाय है। सामायिक सम्यक करनी है तो कषाय को वश में रखो! अन्यथा अनंत परिभ्रमण बढ़ जाता है! दुगर्ति की संभावना है! कषाय को वश में करने से मन और इंन्द्रिया भी वश में हो जाती है! कषाय का विसर्जन ही समभाव ही सामायिक है।
प्रसंग जन्माष्टमी का है! कंस, कृष्ण, जरासंध, वासुदेव एवं समुद्र विजय का प्रसंग है! कंस का विवाह जीवयशा से एवं मथुरा का राज्य भी प्राप्त कर लिया एवं उग्रसेन जी को बंदी बना देता है। कंस का पिता के प्रति कषाय जागृत हो जाता है। कषाय अपनो का लिहाज नहीं रखता। अत: कषाय का वमन करो। कषाय व्यक्ति को क्रूर बनाता है! कषाय के वश कंस ने पिता को क्रूर वेदना दारुण वेदना देने का निश्चय कर लिया। कारण था” कांस्य की पेटी में मुझे क्यो बहाया ।
धारिणी माता को दोहाद उत्पन्न हुआ कि अपने पति उग्रसेन को दुःख देने का। पीडा दूं, घात करुँ, ऐसी भावना बार बार आती हैं। दोहद पूर्ण न होने से शरिर कुम्लहाने लगा ! राजा के पूछने पर रानी ने दोहद बताया किंतु क्रोध वश शिशु को मारने का प्रयत्न किया। वह मरा नहीं ! शिशु का जन्म होने पर यमुना नदी में कांस्य पेटी में बहा दिया। ऐसा दोहद क्यो उत्पन्न हुआ उसका भी कारण था मथुरा में पंचग्नि तपने वाला तापस था। मासखमण के पारणे मासखामण करता उसकी कीर्ति भी फैली तो उग्रसेन भी दर्शन करने गए और पारणा के लिए निमंत्रित किया।
जैन धर्म में साधुओं को निमंत्रण देना निषेध है! उग्रसेन की ज्यादा विनंती से तापस ने स्वीकृति दे दी। पारने के दिन उग्रसेन संयोगवश बाहर चले गया तथा तापस खाली हाथ लोट गये और तुरंत मासखामण धारण कर लिया! उग्रसेन फिर से जाकर क्षमायाचना कर पारणे की विनती की। दूसरी बार भी तापस खाली हाथ लौट गये। इसी तरह बार बार वह पारणे की विनती करता एवं क्षमायाचना करता!
फलस्वरूप तापस को क्रोध आया और निधान कर लिया कि मैं इसको दुःख देने वाला मारने वाला बनूं। यह जानता है कि दूसरे घर पारणा के लिए नहीं जाता हूँ फिर भी इसने मुझे भूखा मारने का निश्चय किया! अत: वहाँ ही शरिर लीला खत्म करके वह धारिनी के गर्भ रूप में आया ! इसलिए बुरा दोहद उत्पन्न हुआ। कंश जब उग्रसेन को बंदी बना लिया तो अतिमुक्त कुमार ने दीक्षा ले ली! और उग्र तपस्या करने लगा। संचालन मंत्री नरेन्द्र मरलेचा ने किया।