सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने धर्म प्रवचन देते हुए कहा कि एक हाथ से दिया गया दान हजारों हाथों से लौटकर आता है। जो हम देते हैं वो ही हम पाते हैं। दान के विषय में हम सभी जानते हैं। दान अर्थात् देने का भाव, अर्पण करने की निष्काम भावना। किंतु दान की महिमा तभी होती है, जब वह नि:स्वार्थ भाव से किया जाता है अगर कुछ पाने की लालसा में दान किया जाए तो वह व्यापार बन जाता है।
यहां समझने वाली बात यह है कि देना उतना जरूरी नहीं होता जितना कि देने का भाव। अगर हम किसी को कोई वस्तु दे रहे हैं लेकिन देने का भाव अर्थात् इच्छा नहीं है तो वह दान झूठा हुआ, उसका कोई अर्थ नहीं। इसी प्रकार जब हम देते हैं और उसके पीछे यह भावना होती है, जैसे पुण्य मिलेगा या फिर परमात्मा इसके प्रत्युत्तर में कुछ देगा तो हमारी नजर लेने पर है, देने पर नहीं। दान का अर्थ होता है देने में आनंद, एक उदारता का भाव, प्राणी मात्र के प्रति एक प्रेम एवं दया का भाव, किंतु जब इस भाव के पीछे कुछ पाने का स्वार्थ छिपा हो तो वह दान नहीं रह जाता, हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, यह तो संसार एवं विज्ञान का धारण नियम है।
इसलिए उन्मुक्त हृदय से श्रद्धापूर्वक एवं सामर्थ्य अनुसार दान एक बेहतर समाज के निर्माण के साथ-साथ स्वयं हमारे भी व्यक्तित्व निर्माण में सहायक सिद्ध होता है और सृष्टि के नियमानुसार उसका फल तो कालांतर में निश्चित ही हमें प्राप्त होगा। आज के परिप्रेक्ष्य में दान देने का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है कि आधुनिकता एवं भौतिकता की अंधी दौड़ में हम लोग देना तो जैसे भूल ही गए हैं। हर संबंध व हर रिश्ते को पहले प्रेम, समर्पण, त्याग व सहनशीलता से दिल से सींचा जाता था, लेकिन आज हमारे पास समय नहीं है, क्योंकि हम सब दौड़ रहे हैं और दिल भी नहीं है, क्योंकि सोचने का समय जो नहीं है! लेकिन हमारे पास पैसा और बुद्धि बहुत है, इसलिए अब हम लोग हर चीज में इन्वेस्ट अर्थात निवेश करते हैं, चाहे वे रिश्ते अथवा संबंध ही क्यों न हों! तो हम लोग नि:स्वार्थ भाव से देना भूल गए हैं। देंगे भी तो पहले सोच लेंगे कि मिल क्या रहा है, और इसीलिए परिवार टूट रहे हैं, समाज टूट रहा है।