उज्जैन। श्री महाकालेश्वर मंदिर से वैकुण्ठ चतुर्दशी को हरिहर मिलन सवारी निकाली गयी। मान्यताओं के अनुसार वैकुण्ठ चतुर्दशी पर हर (श्री महाकालेश्वर) श्री हरि (श्री गोपाल) को सृष्टि का भार सौंपा।
पुराणों के मुताबिक माना जाता है देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बलि के यहा विश्राम करने जाते हैं।
उस समय पृथ्वी लोक की सत्ता शिव के पास होती है और वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिन भगवान शिव यह सत्ता विष्णु को सौंपकर कैलाश पर्वत पर लौट जाते है। इसी दिन को वैकुण्ठ चतुर्दशी या हरिहर मिलन कहते हैं।
श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति के सहायक प्रशासक चंद्रशेखर जोशी ने बताया कि रात्रि 11 बजे भगवान श्री मनमहेश की दिव्य प्रतिमा को पूरे राजसी ठाट-बाट के साथ पालकी में विराजित कराकर भगवान श्रीगोपाल मंदिर में भेंट कराने का विधान उल्लास पूर्वक हुआ।
उन्होंने बताया कि यह सवारी श्रीमहाकालेश्वर मंदिर से महाकाल चौराहा, गुदरी चौराहा व पटनी बाजार होते हुए गोपाल मंदिर पहुंची। जहां पूजन के दौरान विद्वान पुजारियों द्वारा बाबा श्रीमहाकालेश्वर ने बिल्वपत्र की माला श्रीगोपालजी को एवं वैकुण्ठनाथ अर्थात श्रीहरि ने तुलसी की माला बाबा श्रीमहाकालेश्वर को भेंट करने का विधिवत विधान संपन्न करवाया।
पूजन के बाद सवारी पुन: इसी मार्ग से श्रीमहाकालेश्वर मंदिर वापस आयी। सवारी के साथ श्रीमहाकालेश्वर भगवान का ध्वज, मंदिर के पुजारी-पुरोहित पर्याप्त संख्या में पुलिस बल, विशेष सशस्त्र बल की टुकडियां व बड़ी संख्या में श्रद्धालु आदि सम्मिलित थे।