Share This Post

Featured News / Featured Slider / ज्ञान वाणी

आत्मनिरीक्षण इस संसार का सबसे कठिन काम है: देवेंद्रसागरसूरि

आत्मनिरीक्षण इस संसार का सबसे कठिन काम है: देवेंद्रसागरसूरि

आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने बिन्नी नोर्थटाउन के सुमतिवल्लभ जैन संघ में प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य को किसी तरफ चैन या संतोष नहीं मिल रहा। बेचारा विक्षिप्त-सा होकर इधर-उधर भटक रहा है। उसका नैतिक स्तर गिरता जा रहा है। भ्रष्टाचार के कारण आज सभी दुःखी हैं, फिर भी नैतिक साहस किसी में नहीं आता।

सभी स्वार्थ साधनों में लिप्त हैं। स्वयं कुछ न देकर, दूसरों से ऐंठ लेने की नीति के कारण न तो कहीं सहयोग रह गया है और न सहानुभूति । मुसीबतों में सच्चे हृदय से सहानुभूति दिखाने वाले भी नहीं रहे। मानवता का इतना अधःपतन शायद ही किसी युग में हुआ हो। उसी अनुपात में लोगों का कष्ट और पीड़ाओं से परेशान होना भी स्वाभाविक ही है। अपने सुखों को बरबाद कर डालने की जिम्मेदारी मनुष्य पर ही है। उचित प्रयत्नों की बात भुलाकर मनुष्य असुरता की ओर बढ़ रहा है। इसी से वह दुःखी है।

छुटकारे का उपाय एक ही है कि वह इन पतनोन्मुख दुष्प्रवृत्तियों का परित्याग करे और सदाचारी जीवन जीने में सुख और संतोष अनुभव करें, हमें बाह्य व्यक्ति, पदार्थ और कारण बुरे दिखाई पड़ते हैं, पर यह नहीं सूझता कि अपना दृष्टिकोण ही तो कहीं दूषित नहीं है। आत्मनिरीक्षण इस संसार का सबसे कठिन काम है। अपने दोषों को ढूंढ़ सकना समुद्र के तल में से मोती ढूंढ़ लाने वाले गोताखोरों के कार्य से भी अधिक दुष्कर है। अपने दोषों को स्वीकार कर सकना किसी साहसी से ही बन पड़ता है और सुधारने के प्रयत्न तो कोई बिरला ही शूरवीर करता है।

यही कारण है कि हममें से अधिकांश व्यक्ति दोषदर्शी, छिंद्रान्वेषी दृष्टिकोण अपनाएं रहते हैं और हर किसी को दोषी, निंदनीय, घृणित एवं दुर्भावनायुक्त समझते रहते हैं। परिणाम स्वरूप सर्वत्र हमें दुष्टता और शत्रुता ही दीखती है। निराशा और व्यथा ही घेरे रहती है। उन्होंने आगे कहा कि हमें लक्ष्य-भ्रष्ट करने में विकृत महत्त्वाकांक्षाओं का बड़ा हाथ है। ये हमें जीवन के सहज और स्वाभाविक मार्ग से भटकाकर गलत मार्ग पर ले जाती हैं। इनके कारण हमें जो कारण चाहिए, उसकी तो हम उपेक्षा कर देते हैं और जो हमें नहीं करना चाहिए, वह करने लगते हैं।

अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के बारे में हमें विवेकपूर्ण बुद्धि से सोचना चाहिए कि वे कितनी यथार्थ और कितनी उपयोगी हैं। कहीं हम भुलावे में तो नहीं हैं। वे हमें जीवन के सही रास्ते पर ले जा रही हैं या हमें पथभ्रष्ट कर रही हैं। हमारी आकांक्षाओं के पीछे कोई प्रलोभन तो नहीं, कोई स्वार्थ बुद्धि तो काम नहीं कर रही? महत्त्वाकांक्षाएं यदि निकृष्ट स्तर की हों, तो उन्हें त्याग देना चाहिए। श्रेयस्कर तो केवल श्रेष्ठता की ओर ले जाने वाली महत्त्वाकांक्षाएं ही हो सकती हैं।

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

Skip to toolbar