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ज्ञान वाणी

सत्संग का सुख वैकुंठ में नहीं मिल सकता: श्रुतमुनि

वडपलनी जैन स्थानक में विराजित श्रुतमुनि ने कहा जीवन में सत्संग से मोक्ष रूपी यात्रा की जा सकती है। उन्होंने सत्संग के छह सोपानों पर प्रकाश डाला-ज्ञान, श्रद्धा, त्याग, प्रेम, पुण्य व सम्मान। उन्होंने कबीरदास का दोहा पेश किया-डोला आवत देखकर दिया, दिया कबीरा रोय, जो सुख सत्संग में है वो सुख वैकंंठ में नांय।

अर्थात अपना अंतिम समय जान कबीर रोने लगे। यह सत्संग का सुख वैकुंठ में मुझे कभी नहीं मिलेगा। सत्संग से मानव को सहज ही पवित्र विचार, भावना, प्राणिमात्र पर दयाभाव, वृद्धों की उन्नति एवं गरीब व असहायों की सहायता का भाव उत्पन्न हो जाता है। वह उनको जगत में वंदनीय, पूजनीय व सम्माननीय बन जाता है।

यह सब सत्संग का ही प्रभाव है। मुनि ने गुरुदेव गणेशीलाल का भी विवेचन किया। साथ ही कहा संत-महात्माओं की आंखों में कभी आंसू नहीं आते। जिस दिन उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं वे वंदनीय बन जाते हैं।

सत्संग से जीव ज्ञान, ज्ञान से श्रद्धा, श्रद्धा से त्याग, त्याग से मैत्री व प्रेमभाव, मैत्री भाव से पुण्यार्जन कर संयम ग्रहण कर मोक्ष पा लेता है। संतों का शुक्रवार का प्रवचन कोडम्बाक्कम स्थित रांका हाउस में होगा।

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