श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ राजाजीनगर बैंगलोर के तत्वावधान में उप प्रवर्तक पंकजमुनि के सानिध्य में डॉ वरुणमुनि ने कहा कि आत्मज्ञान तभी हो सकता है जब सभी वासनाओं का त्याग हो। वासनाओं के त्याग के बिना आत्मज्ञान नहीं हो सकता। शास्त्रों में वासना के त्याग को मुक्ति संज्ञा दी गई है।
किसी भी वस्तु को तीव्र भाव से ग्रहण करने को वासना कहते है। जब ज्ञान में अभिमान आ जाता है वह वासना बन जाता है। तीन प्रकार की वासनाओं का जिक्र बताया गया है लोक वासना, देह वासना और शास्त्र वासना। जगत् के अनात्म वस्तुओं में ममता मोह का बना रहना ही परस्पर लोक-देह-और शास्त्र की वासना है। लोक वासना यानि मेरा नाम हो मेरी पहचान हो।
नाम के लिए दिया गया दान भी व्यर्थ है। इसीलिए गुप्त दान का महत्व बताया गया है। वासना का सेवन जितना अधिक करोगे उतनी ही यह बढ़ती जाएगी। वासना का सेवन कर व्यक्ति अपना जीवन नष्ट कर रहा है। साधना के मार्ग में मोह और वासना बाधक होते है। संयम ही मनुष्य जीवन का मुख्य आधार है। व्यक्ति को अपने जीवन के विकारों को अपने से अलग कर देना ही संयम है। परमात्मा ने साधना के मार्ग पर वासना को जीतने के तीन महत्वपूर्ण सूत्र बताए है। पहला आहार का संयम ,जिसमें अनेक प्रकार के तप बताये गये है। दूसरा इंद्रियों का संयम – पाँचो इंद्रियों को जीतना ही संयम है।
तीसरा निद्रा का संयम यानि निद्रा का कम करने का प्रयास करना। आहार संयम से इंद्रिया नियंत्रित होंगी और इंद्रिया नियंत्रण में रहेंगी तो निद्रा कम होगी। नींद का संयम करोगे तो इंद्रियों और आहार का संयम होगा। जब यह जीव वासना से ऊपर उठता है तो साधना आराधना और उपासना में लग जाता है। वासना से ऊपर उठने वाला ही वीतरागता को प्राप्त करता है।
युवा भाविक कोठारी का इस चातुर्मास का प्रथम मासख़मण संपन्न हुआ। संघ की ओर से तपस्वी भाविक कोठारी का अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर रोपड पंजाब से प्रमोद जैन , मिहिर जैन ,लुधियाना से सतीश जैन एवं दिगंबर समाज के सेवाभावी डॉ जितेंद्र तोलिया भी उपस्थित रहे।
सभी अतिथियों का अभिनंदन संघ के पदाधिकारियों ने किया। पूर्व में रूपेशमुनि ने गुरु स्तवन की प्रस्तुति दी और अंत में पंकजमुनि ने मंगलपाठ प्रदान किया। नवकार महामंत्र जाप एवं आयंबिल की लड़ी गतिमान है। अध्यक्ष प्रकाशचंद चाणोदिया ने आभार व्यक्त किया और संचालन संघ मंत्री नेमीचंद दलाल ने किया।


