चेन्नई. शनिवार को श्री एएमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज ने नन्दीवर्धन के चरित्र में बताया कि परमात्मा एक ऐसी चेतना है जिन्हें हम कभी भी मिल सकते हैं। उनके देह में रहते हुए मिलना जितना आसान है, उसके बाद मिलना और ज्यादा आसान है। नंदीवर्धन को जब पता चलता है कि परमात्मा चंडकोशिक के पास गए हैं, शीलपाणी यक्ष के मंदिर में गए हैं जहां से सुबह तक कोई भी जिंदा नहीं आता है तो उन्हें बहुत चिंता होती है और सुबह जब सूचना मिलती है कि वे सुरक्षित हैं तो उनकी चिंता मिटती है लेकिन घोर आश्चर्य होता है कि पता नहीं वर्धमान क्या करता है, जो खतरों में स्वयं चला जाता है। वह शीलपाणी यक्ष और चंडकोशिक जैसे भयंकर जीवों को भी बदल देता है और स्वयं सुरक्षित लौट आता है। नंदीवर्धन सोचते हैं कि जब उन्हें बदल सकता है तो उसने मुझे क्यों नहीं बदलता है। मैं स्वयं बड़ा होने के कारण उसके चरण तो छू नहीं सकता लेकिन वह मुझे अपने पास क्यों नहीं बुलाता है।
जिन मां–बाप से बेटा रूठकर उनसे बोल–चाल बंद कर देता है, उसी से मां–बाप ज्यादा प्यार करते हैं, उसकी ज्यादा चिंता हरदम करते हैं। उसी प्रकार नंदीवर्धन वर्धमान के बड़े भाई होने के नाते उनके बिना बीते हुए ३० साल के समय को बड़े ही कष्ट और चिंताओं में बिताते हैं। उन्हें परमात्मा की पल–पल की खबर मिलती है और उनका जीवन दु:खों का सागर बना रहता है। वे वर्धमान के साथ हुई भयानक घटनाओं से तड़प उठते हैं और उनके सुरक्षित बचने जानकारी पाकर वे आश्वस्त होते हैं और यह सोचकर कि यदि ऐसा नहीं होता तो अनर्थ हो जाता। वे सोचते हैं कि मेरी सत्ता, संपत्ति, अधिकार और बड़प्पन छोटे भाई के लिए तो यह सब व्यर्थ ही है। सबकुछ होते हुए भी मैं वर्धमान को आपत्तियों से सुरक्षित नहीं कर पाया। बड़ों की मजबूरियां भी इसी तरह की होती है। उनके चाचा सुपाश्र्व उन्हें समझाते हैं, फिर भी वे हृदय से नहीं मान पाते।
वर्धमान अपने भक्तों को संभालने के लिए बहुत दूर–दूर तक का विहार करते हैं और निर्वाण कल्याणक के समय में भी देवशर्मा को बुलाने इंद्रभूति को भेजते हैं, तो मुझे बुलाने किसी को क्यों नहीं भेजा इस तरह वे दु:ख चिंतन करते हैं। उनके समवशरण में सारी दुनिया जाती है। लेकिन नंदीवर्धन नहीं जा पाते, सोचते हैं कि मैं दु:खों के पल में उसके काम नहीं आ सका तो सुख के समय भी उसके पास जाने का अधिकार मुझे नहीं है। हृदय में प्रेम होने के बाद भी पलभर की दुर्भावना से भाई से मिलने के रास्ते अवरुद्ध हो गए, मन में गांठ बांध ली। यही सबसे भयंकर बेडियां उनके जकड़े हुए है। उन्हें हर पल महसूस होता है कि जो गुनाह मैंने किया है उसी की सजा मुझे मिल रही है और हर पल बुलावे के इंतजार में वे दु:ख में जीते जाते है।
नंदीवर्धन सुदर्शना को बताते हैं कि वह मुझे दुत्कार कर चला गया, मैं उसके पास कैसे जाऊं। तो सुदर्शना कहती है कि तीर्थंकर का किसी से भी मोह नहीं होता, उन्हें कोई रिश्ता बंधन में नहीं बांध सकता।
जब नंदीवर्धन को वर्धमान के निर्वाण के बारे में पता चला तो उन्हें पछतावा होता है कि मैं अपने अहंकार से बंधा रह गया। उन्होंने मना किया लेकिन मैं तो उसकी सुरक्षा की व्यवस्था कर सकता था, वर्धमान के पास तो अनेकों जीव बिना बुलाए चले गए थे, मुझे भी जाना चाहिए था, मैंने बड़ा भाई होकर भी भाई का कर्तव्य नहीं निभाया। इस प्रकार पश्चाताप करते हुए वे विलाप करते हैं और उस समय सुदर्शना आकर उन्हें समझाती है कि जो–जो परमात्मा के पास आ नहीं सके उनके दिलों में समाने के लिए ही परमात्मा देह मुक्त हुए हैं। अब उन्हें कोई भी प्राणी अपने हृदय में महसूस कर सकता है। तब नंदीवर्धन अपने हृदय में परमात्मा को महसूस करते हैं और शांत होते हैं। जिसे कोई नहीं समझा सकता उसे बहिन समझा सकती है।
परमात्मा की चेतना और ऊर्जा शरीर से मुक्त होने पर सारे जगत में व्याप्त हो जाती है। परमात्मा का औदारिक शरीर जो तीर्थंकर नामकर्म से जन्मा है, २१ हजार साल का है, उनके तप की सारी शक्ति इस जगत में व्याप्त है, जिस पर काल का प्रभाव भी नहीं होता। हम सभी परमात्मा को अपने हृदय से महसूस करें। तीर्थंकर की कृपा अनन्त रास्तों से बरसती है, उन सभी को जानना मुश्किल है, वे आगम गामी हैं। जिन रास्तों से कोई नहीं चल सकता उन पर तीर्थंकर चलते हैं। जिस जीव को जो रास्ता मुनासीब हो, तीर्थंकर उसे वैसा ही समाधान देते हैं। सुधर्मास्वामी जो ३० वर्षों तक परमात्मा के साथ हर पल रहे। उन्होंने परमात्मा के अन्तर चेतना का स्वरूप जिससे बाहरी स्वरूप का निर्माण होता है की चर्चा विरुत्थई में की है।
12 नवम्बर को ललिताबाई गौतमचंद जांगड़ा को ”अर्हत श्री से पुरस्कृत किया जाएगा।