चेन्नई

निर्मल भाव से होता है आत्म-कल्याण : मुनि संयमरत्न विजय

चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कस्तूरी-प्रकरण के भाव-प्रक्रम का वर्णन करते हुए कहा बिना भाव के किया गया कोई भी अनुष्ठान शुभ फल नहीं देता। हमारे भाव नि:शल्य-निर्दोष होने चाहिए। निर्दोष या निर्मल भावों से ही आत्म-कल्याण होता है। सद्भावना से सद्गति व दुर्भावना से दुर्गति होती है। बिना भाव से दिया गया दान व्यक्ति के लिए दुखदाई होता है, बिना भाव के किया गया शील का पालन कष्टदायी होता है। बिना भाव से किया गया तप मात्र शरीर को सुखाने जैसा ही होता है अत: जो भी क्रिया हम करें भाव के साथ करें। जिसके भीतर सद्भावना नहीं होती वह सोचता है कि दान देने से धन की हानि होगी, शीलपालन से भोग की सामग्री नष्ट हो जाएगी, तप करने से क्लेश होगा, पढऩे से कंठ सूखने लगेंगे, नमस्कार करने से मानहानि होगी, व्रत धारण करने से दु:ख होगा, लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति सद्भावना के साथ सभी सत्...

आंतरिक सुख के लिए होती है जीववाणी: गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा जीववाणी मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि आंतरिक सुख देने के लिए होती है। कोई भी कार्य वाहवाही कमाने के लिए नहीं बल्कि आत्मा की निर्जरा के लिए की जानी चाहिए। भाग्यशाली लोग मन से परमात्मा की वाणी को जीवन में उतारने की कोशिश करते हंै। जीवन की छोटी-छोटी सफलता ही लोगों को आगे बढ़ाती है। इसलिए मनुष्य को उसके हर छोटे कार्य को भाव के साथ ही करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म और आराधना के कार्य को दिल से ही करना चाहिए। बिना मन के किए गए कार्य का कोई मतलब नहीं होता है। दिल से किया हुआ कार्य ही मनुष्य को मंजील तक पहुंचाता है। वर्तमान में लोग धर्म के कार्य तो करते हैं पर उनमे भाव नहीं होता। भाव से धर्म करने वाला मनुष्य अपने जीवन को पावन बना लेता है। अगर मनुष्य प्रवचन भी दिल से सुन कर बताए मार्गों पर चले तो उसके जीवन की दिशा ही बदल जाएगी। सागरमुन...

कैरियर ने मानव का कैरेक्टर छीन लिया: v

चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा हमें मानव शरीर तो मिला है लेकिन मानव दृष्टि, भौतिक ज्ञान व समझ नहीं मिली इसलिए भटक गए। मान-सम्मान एवं भौतिक सामग्री में रम गए। हमारे पास बड़ी शक्ति है लेकिन उसका उपयोग नहीं जानते। धर्म की चार दीवारों में बांध दिया है। अपने-अपने संप्रदायों की जंजीरों में जकड़ दिया है। हमारी दृष्टि सिकुड़ गई है। अरिहंत एवं आत्मा का संशेषन नहीं होता। हम बाहर भटक रहे हैं। कैरियर ने कैरेक्टर छीन लिया है। चारित्र चला गया और चित्र एवं तस्वीर रह गई। सच्चा भक्त परमात्मा को देखने के बाद कहता है आपको देख लेने के बाद मन अन्यत्र आकर्षित नहीं होता। जब तक आपका परिचय नहीं हुआ था तब तक पागलों की भांति इधर-उधर भटक रहा था। जीव का निर्णय नहीं किया था। जबसे आपको देखा है, आपका परिचय हुआ है आप तक पहुंचा हूं यही मेरी साधना है और सागर का मधुर जल पीने क...

मुश्किल से होता है संत समागम : संत कृपाराम

चेन्नई. साहुकारपेट में विराजित संत कृपाराम ने कहा संतों का समागम बहुत मुश्किल से मिलता है। संतों का आशीर्वाद हमेशा शांति प्रदान करता है। संत दर्शन हमेशा भाग्य से ही प्राप्त होते हैं। गुरुदेव ने संत राजाराम के साथ माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में विराजित आचार्य महाश्रमण के दर्शन कर आशीर्वाद लेकर उनसे मुलाकात की। संत राजाराम ने कहा चेन्नई के श्रद्धालु भाग्यशाली हैं जिनको आचार्य महाश्रमण का सानिध्य एवं प्रवचन प्राप्त हो रहा है। ऐसा मौका बार बार नहीं मिलता। आचार्य जो सत्संग रूपी हीरे दे रहे हैं वे हमेशा हमारी जिंदगी में चमक रखेंगे, उनको संभाल के रखें एवं जीवन में उतारने का प्रयास करें। संत राजाराम और संत कृपाराम का तेरापंथ जैन समाज द्वारा अभिनंदन किया गया। इस मौके पर तेरापंथ सभाध्यक्ष धर्मीचंद लूंकड़, प्यारेलाल पीतलिया, गुरुकृपा सेवा समिति के मोहनलाल खत्री, अशोक रावल, विजय ...

सत्य की राह परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग: साध्वी कुमुदलता

चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने भगवान महावीर के सत्याणुव्रत का उल्लेख करते हुए कहा कि इंन्सान को सत्य की राह पर चलते रहना चाहिए। किसी भी स्थिति में झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए। सत्य बोलने वाले की हमेशा जीत होती है। सत्य की राह पर चलकर ही व्यक्ति अपने आप को परमात्मा से जोड़ सकता है। सत्य ही इन्सान को विश्वास दिलाता है कि धर्म सत्य पर टिका है। उन्होंने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा अनुराग, स्नेह आदि संबंधों के अधीन नहीं होना चाहिए। व्यक्ति को स्नेह, अनुराग और प्रेम भाव रखना चाहिए लेकिन उसके मोह जाल में नहीं फंसना चाहिए। यदि व्यक्ति इस मोह जाल में फंस जाता है तो उसे पूरी दुनिया छोटी लगने लगती है जिससे उसे जन्म-जन्मांतर तक दुखों का ही सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कुछ परम्पराएं ऐसी हैं जो अतीत से चलती आ रही हैं, वर्...

सत्य की राह परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग: साध्वी कुमुदलता

चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने भगवान महावीर के सत्याणुव्रत का उल्लेख करते हुए कहा कि इंन्सान को सत्य की राह पर चलते रहना चाहिए। किसी भी स्थिति में झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए। सत्य बोलने वाले की हमेशा जीत होती है। सत्य की राह पर चलकर ही व्यक्ति अपने आप को परमात्मा से जोड़ सकता है। सत्य ही इन्सान को विश्वास दिलाता है कि धर्म सत्य पर टिका है। उन्होंने एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा अनुराग, स्नेह आदि संबंधों के अधीन नहीं होना चाहिए।  व्यक्ति को स्नेह, अनुराग और प्रेम भाव रखना चाहिए लेकिन उसके मोह जाल में नहीं फंसना चाहिए। यदि व्यक्ति इस मोह जाल में फंस जाता है तो उसे पूरी दुनिया छोटी लगने लगती है जिससे उसे जन्म-जन्मांतर तक दुखों का ही सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कुछ परम्पराएं ऐसी हैं जो अतीत से चलती आ रही हैं, वर...

कर्म आत्मा को कितने भी ढके, चेतना के स्वभाव को नहीं ढक पाता: आचार्य पुष्पदंत सागर

चेन्नई. कोण्डीतोप स्थित सुन्देशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि ग्रहण चन्द्रमा को ढंक लेता है। झूठ सत्य को ढंक लेता है। बादल सूर्य को ढंकने की कोशिश करता है। किन्तु फिर भी प्रकाश धरा पर पूरा आता है। कर्म आत्मा को कितने भी ढंके फिर भी चेतना के स्वभाव को नहीं ढंक पाता। बड़े माया के साथ झूठ बोलते हैं। बालक मासूम झूठ कपट रहित झूठ बोलते हैं। मैया मैं नहीं माखन खायो। इसमें छल कपट नहीं है। हर नर नारायण बन सकता है। हर बूंद सागर बन सकती है। हर बीज वृक्ष बन सकता है। हर आत्मा परमात्मा बन सकती है। तीर्थंकर ने उद्घोष किया है कि तुम परमात्मा बन सकते हो। परमात्मा बनने से तुम्हें किसने रोका है। तुम स्वयं अपने उत्तरदायी हो। यदि तुम सत की साधना में जुट जाओगे तो असत धीरे-धीरे टूटता जाएगा। बादल सूर्य और चंद्रमा को ढंक लेता है और सूर्य व चंद्रमा के दर्शन नहीं होते। दिखाई नहीं देते, लेकिन स...

महामंत्रों के प्रभाव से शीघ्र ही कष्टों का हरण हो जाता है : प्रवीणऋषि

उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा चेन्नई. पुरुषावाक्कम स्थित श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि के सान्निध्य में आचार्य आनन्दऋषि जन्मोत्सव के अंतर्गत प्रात: 8.30 बजे से 10 बजे तक 36 णमोत्थुणं जाप और आनन्द चालीसा का पाठ कराया गया। इस अवसर पर प्रवीणऋषि ने कहा कि नमस्कार महामंत्र और णमोत्थुणं जाप का प्रयोग जैनाचार्यों द्वारा जीवन में आने वाली समस्याओं, आपदाओं को दूर करने और जीवन को मंगलमय बनाने के लिए किया गया है। इन महामंत्रों के प्रभाव से शीघ्र ही कष्टों का हरण हो जाता है और जीव की आत्मा शुद्ध हो जाती है। नवकार और णमोत्थुणं महामंत्र में अनन्त तीर्थंकरों का पुण्य ग्रहण करने की शक्ति है। जीवन समस्याओं का दूसरा नाम है और सामान्य व्यक्ति समस्याओं को हल करते हुए और समस्याओं से घिरता जाता है। उपाध्याय प्रवर ने ‘आनन्द चरित्र’ में बताया कि आचार्य आनन्दऋ...

दूसरों के प्रति सेवा भाव रखें: गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने सोमवार को कहा सेवा करना एक विशिष्ट और आंतरिक तप होता है। अपने परिवार, पड़ोसी और समाज के साथ अध्यात्म क्षेत्र में गुरुभगवंतों की सेवा करना जीवन को आनंद से भर देता है। मनुष्य में सेवा करने का भाव के साथ लक्ष्य भी होना चाहिए। उत्तम भाव रखने वाले लोग अपने दोस्त यार को भी धर्म के कार्यो से जोडऩे का प्रयास करते हैं। ऐसा करने पर अपने आप ही जीवन में खुशी के माहौल बनने लगते है। वर्तमान में लोग थोड़े से पैसे की वजह से गलत कार्य करने में लगे हुए हैं जबकि उन्हें ऐसा कभी नहीं करना चाहिए। धर्म के मार्ग पर चलने वाला मनुष्य ऐसा कभी नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि मनुष्य की आत्मा में पुण्य के प्रकाश का उदय होने पर भयंकर अंधकार में भी पुण्य का मार्ग मिल जाता है। जीवन से अपने प्रत्येक बुराई को समाप्त करने का प्रयास करते रहना चाहिए। समाज के उत्थान के ल...

तप से होता है कर्मों का नाश: मुनि संयमरत्न विजय

चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कस्तूरी प्रकरण के तप-प्रक्रम का वर्णन करते हुए कहा कि जिस प्रकार बिना अग्नि के भोजन नहीं पकता, कोमल मिट्टी के बिना घड़ा नहीं बनता, तंतुओं के बिना कपड़ा नहीं बनता उसी प्रकार बिना तप के कर्मों का नाश नहीं होता। कुशलता रूपी कमल को विकसित करने के लिए सूर्य के समान, शील रूपी वृक्ष को बढ़ाने के लिए पानी के समान, विषय रूपी पक्षी को पकडऩे के लिए जाल समान, क्लेश रूपी बेल को जलाने के लिए अग्नि समान, स्वर्ग मार्ग की ओर जाने के लिए वाहन समान ऐसे मोक्ष दिलाने वाले तप को आकांक्षा, अपेक्षा रहित होकर करना चाहिए। इंद्रिय रूपी हाथी को सही मार्ग की ओर चलाने के लिए तप अंकुश के समान है, ऐसे मोक्ष प्रदायक तप को भोजन के प्रति निरासक्त होकर करना चाहिए। जैसे समुद्र के प्रति नदी, विनयवान के प्रति विद्या, सूर्य के प्रति किरण, वृक्ष के प्रति बेल...

बहुरूपिया होता है मायावी जीव: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा माया कैंची जबकि सूई जोडऩे का काम करती है। धन वाले को चोरों की भय होता है और कपटी को अपनी पोल खुलने का डर सताता है। छल, कपट, प्रपंच आदि माया के ही पर्यायवाची हैं। मायावी जीव बहुरूपिया होता है। ऊपर से सरल बनता है और अंदर से कपट करता है। ऊपर से तो मीठी छुरी जैसा और अंदर से झूठा होता है। उसकी कथनी और करनी में अंतर होता है। माया शल्य एवं केशर की गांठ की तरह होता है जो सारी साधना को नष्ट कर देती है। साध्वी ने कहा गिरगिट का रंग, कपटी का मन और नेता का दंड कभी भी पलट सकता है, अत: हमें माया कषाय से दूर रहना है। सहमंत्री खेमचंद बोहरा ने बताया कि नौ अगस्त को आचार्य जयमल का सामूहिक जप-तप अनुष्ठान किया जाएगा।

कपटरहित आत्मा ही कर्मक्षय करने में सक्षम: साध्वी धर्मप्रभा

चेन्नई. एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा ऋजु आत्मा ही एक दिन सव्रश्रेष्ठ स्थान पाती है। एक इनसान वह है जिसने घरबार त्याग कर संन्यास ले लिया, वस्त्र त्याग कर दिगम्बर बन गया, तप ऐसा कि हर माह मासखमण का पारणा करता है। ऐस त्यागी के मन में यदि माया आ जाए तो उसे अनंत बार मां के गर्भ में आकर दुख भोगना पड़ेगा। इनसान थोड़े से लाभ के लिए धोखाधड़ी कर लेता है और अपने ईमान व विश्वास को बेच देता है। जिसके कर्म अच्छे होते हैं किस्मत उसकी दासी बन जाती है। जिसकी नीयत अच्छी होती है उसके लिए तो घर में ही मथुरा-काशी एवं घर ही तीर्थस्थल बन जाता है। वक्रात्मा कभी भी संसार से तिरने वाली नहीं है। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा मानव जन्म धर्मश्रवण, धार्मिक श्रद्धा एवं संयम में पराक्रम ये चार प्रधान अंग पाकर मुक्ति की ओर प्रवृत्त हुए सरल स्वभाव वाले व्यक्ति की शुद्धि होती है और शुद्धि प्राप्त आत्...

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