एमकेबी नगर में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा संसार में मायाजाल और कपट का साम्राज्य फैला हुआ है। माया से कोई भी अछूता नहीं है। चारों गतियों नरक, तिर्यंच, मानव और देव सभी में माया बसी हुई है। माया कुटिलता का वह विषैला कांटा है जो क्लेश उत्पन्न करता है। उन्होंने कहा मायावी और प्रमादी जीवात्मा का जन्म-मरण कभी खत्म नहीं होता। माया का दंभ करने वाला मरने के बाद नरक गति को प्राप्त होता है। मायावी जीव की कभी सद्गति नहीं होती व कपटी जीव को कभी शांति नहीं मिलती। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा शास्त्रों में जीवों के भावों की परिणति तीन प्रकार की बताई गई है पुण्यरूप, पापरूप और शुद्धोपयोगरूप। इनमें से पहली दो परिणतियां कर्मबंध रूप हैं जबकि तीसरी शुद्धोपयोगरूप परिणति भव सागर से पार करने वाली।
साध्वी प्रतिभाश्री व प्रेक्षाश्री के सान्निध्य एवं श्री वर्धमान श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, अरक्कोणम के तत्वावधान में शनिवार को मरुधर केसरी मिश्रीमल व शेरे राजस्थान रूपचंद की जन्म जयंती मनाई गई। इस अवसर पर सहजोड़े जाप अनुष्ठान किया गया। साध्वी प्रतिभाश्री ने गीतिका के माध्यम से दोनों संतों के जीवन प्रसंग पर अपने भाव व्यक्त किए जबकि साध्वी प्रेक्षाश्री ने संत द्वय के जीवन परिचय पेश किया। इस अवसर पर कई वक्ताओं ने दोनों संतों के प्रति अपने भाव व्यक्त किए।
गोपालपुरम में लॉयड्स रोड स्थित छाजेड़ भवन में कपिल मुनि की निश्रा में श्री जैन संघ, गोपालपुरम के तत्वावधान में शनिवार को श्रमण सूर्य मरुधर केशरी मिश्रीमल की 128 वीं जयंती जप-तप की आराधना के साथ समारोहपूर्वक मनाई गई। इस मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने एकासन, आयम्बिल, उपवास आदि तप की आराधना और 3-3 सामायिक साधना के द्वारा श्रद्धा प्रकट की। कपिल मुनि ने मरुधर केसरी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जनमानस के बीच मरुधर केशरी के नाम से लोकप्रिय मिश्रीमल उस दिव्य और भव्य महामना का नाम है जो जिनशासन के फलक पर सूरज की तरह चमकते रहे। वे जनमानस में व्याप्त अज्ञान के अन्धकार को छिन्न-भिन्न करने वाले प्रकाशपुंज महामानव और जिनशासन के सजग प्रहरी थे । उन्होंने संघ और समाज की बिखरी कडिय़ों को सदैव जोडऩे का अद्भुत कार्य किया। वे सही मायने में अहिंसा के आराधक और संघ समाज सुधारक थे। उन्होंने अपनी...
साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने मरुधर केशरी मिश्रीमल की जयंती के अवसर पर शनिवार को उनका गुणगान गाते हुए कहा कि जीवन को पावन बनाने के लिए महापुरुषों ने धर्म का सुंदर संदेश देकर जीवन को सजाया है। महापुरुषों की जयंती मनाते हुए मनुष्य को उनके जीवन से प्रेरणा भी लेनी चाहिए। इससे मनुष्य को जीवन जीने का तरीका सीखने को मिलता है। उन्होंंने कहा कि अपने जीवन में बदलाव करने के लिए ही महापुरुषों का जन्मदिवस मनाया जाता है। उनके द्वारा दी गई प्रेरणा को मनुष्य को अपने जीवन में उतार कर उनका अनुसरण करना चाहिए। इस प्रकार से मनुष्य भी अपना जीवन स्वच्छ कर सकता है। जीवन चारित्र से जीवन जीने की कला मिलती है, लेकिन यह तभी संभव है जब हम महापुरुषों के जीवन को जानेंगे। मुनि ने कहा कि गुरु भगवंतों से ज्ञान प्राप्त करने के बाद मुनि मिश्रीमल ने लोगों में उस ज्ञान को बांटा था। अपने जीवन को बेहतर कर...
साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा जग में आकर दान करने वालों का जन्मों तक यशगान होता है। दान करने से ही मनुष्य का कर्म महान बनता है। दान ही धन की शोभा बढ़ाता है। तीनों लोक में दानी का ही गुणगान होता है। ऐसा कर व्यक्ति अपने जीवन में आनंद का अनुभव कर सकता है। जब आत्मा संसार को छोडक़र चारित्र को स्वीकार करती है तो जीवन की रक्षा होती है। जिन शासन से सारा संसार जगमगाता है। इसमें कई महान आत्माएं हुई जो अपने साथ दूसरों के लिए भी उपकार और भलाई का कार्य किया। साधु वही होते है जो खुद के साथ दूसरों के धर्म कार्य में सहयोगी बनते हैं। ऐसे साधु ही जन जन के जीवन का कल्याण करते हैं। मनुष्य दान, शील, तप और भावना के मार्ग पर चल कर अपने साथ दूसरों के जीवन का भी उत्थान कर सकता है। उनके इस त्याग से उनका जीवन चमक जाएगा। उन्होंने कहा धर्म के प्रति जिनके हृदय में श्रद्धा और आस्था होती है व...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा सत्य पुस्तकों में नहीं आत्मा में है। ज्ञान को नहीं ज्ञाता को पाओ। शास्त्र पढक़र आचरण में नहीं उतारा तो भगवान महावीर को पूरा नहीं आधा उतारा है। अंधेरा दिख रहा है तो प्रकाश करो, दुख है तो सुख की तलाश करो। बेहोशी है इसलिए जाग जाओ। मूर्छा ही दुख है। यदि दुखी हैं तो पिछला हिसाब देखो। पिछले जन्म में दीन-दुखियों की सेवा नहीं की बल्कि उनको सताया होगा। यदि सुखी हो तो पिछले जन्म में सेवा, दान, पूजा आदि का परिणााम है। जब तक पाप पकता नहीं फल मिलता नहीं। जब पाप पक जाता है जेल में सड़ता है एवं हाथ-पांव गलते हैं। दर-दर भटकता है। जो संतों पर विश्वास नहीं करते, अपने माता-पिता पर विश्वास नहीं रखते एवं सम्मान नहीं करते उनकी दशा हमेशा बुरी ही होती है। दुखी होने पर उन कारणों को जड़ से उखाड़ फेंकें और प्राणी सेवा, पूजा-भक्ति एवं संत सेवा करन...
साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा नवकार में प्रवेश पाने वाला अष्टकर्मों को तोड़ देता है। नवकार का ध्यान करने पर माया से मुक्ति व सरलता से संयुक्ति होती है। नवकार में पांच बार ‘नमो’ आया है जो हमें अहंकार से मुक्त होने का संदेश देता है। अहंकार का भार ही हमें ऊपर उठने नहीं देता। हम अपने ही भार से दबे रहते हैं। आत्मा अहंकार के कारण ही परमात्मा से दूर हो जाती है। परमात्मा की ओर केवल वे ही गति कर पाते हैं, जो सर्वप्रकार से स्वयं भारमुक्त हो जाते हैं। परमात्मा के मंदिर में प्रवेश करने का अधिकारी वही है, जो स्वयं की अहंता के भार से मुक्त हो गया है। मनुष्य का शरीर तो उस मिट्टी के दीये की तरह है, जो मिट्टी से बना है और अंत में मिट्टी में ही विलीन हो जाता है और आत्मा उस दीपक की ज्योति की तरह है, जो सदैव ऊपर की ओर उठना व परम तत्व परमात्मा को पाना चाहती है...
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा तपस्या से समस्या का समाधान एवं जीवन निर्माण होता है। तप जीवन की सबसे बड़ी कला एवं वासना पर आध्यात्मिकता पर विजय है। स्वत: कष्ट उठाने की कला का नाम भी तप ही है। तप जीवन का प्रथम व अंतिम चरण है। तपे बिना सोना चमक नहीं सकता एवं कोई घट पक नहीं सकता, इसी प्रकार तप बिना कोई साधक सिद्ध नहीं हो सकता। तपस्या से आत्मा परमात्मा के स्वरूप को पा लेती है। तपस्या से अस्थिर स्थिर हो जाता है। सरल, दुर्लभ-सुलभ, दुसाध्य-साध्य बन जाता है। आत्मा से परमात्मा बनने के लिए इस शरीर को तपाना ही होगा। भगवान ने आहार, मैथुन, परिग्रह संज्ञा को तोडऩे ेके लिए क्रमश: तप भाव शील दान की आराधना करने की प्रेरणा दी। तप की महत्ता सभी धर्मों में है।
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा शरीर का आधार आहार है जिसके बिना शरीर का निर्वाह नहीं हो सकता। आहार हितकारी और परिमित होना चाहिए। भले ही खाने के लिए बहुत सी वस्तुएं हैं लेकिन पेट को डस्टबिन नहीं बनाएं। साध्वी ने कहा स्वाद के लिए खाना अज्ञानता एवं स्वास्थ्य के लिए खाना समझदारी व साधना के लिए खाना योग है। आहार तीन प्रकार का होता है-सात्विक आहार जो मानसिक भावना को पवित्र करता है। राजसिक आहार जो जीवन में विलासिता पैदा करता है तथा तामसिक आहार विकार उत्पन्न करता है। आहार और विचार दोनों जुड़वां भाई हैं। ये दोनों अलग नहीं रह सकते। जैसा आहार होगा वैसे ही विचार पैदा होंगे। दिन में एक खाना आहार, दो बार खाना भोजन और बार-बार खाना, खाना भी नहीं। एक बार खाने वाला योगी, दो बार खाने वाला भोगी एवं बार-बार खाने वाला रोगी होता है। साध्वी अपूर्वाश्री ने कहा क्रोध जीव को नरकगामी बना देता है।...
एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा इस स्वार्थमय संसार में इन्सान पर सभी आपत्तियों एवं घोर कष्ट के बादल मंडराते हैं और उसके लिए सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। ऐसे समय में अपने सगे-संबंधी भी शत्रु बन जाते हैं। उसके प्रति सहयोग की भावना नष्ट हो जाती है। संसार में सुख साथी तो लाखों हैं लेकिन दुख का साथी कोई नहीं। दुख में यदि कोई साथी है तो वह है धर्म। जो हमेशा जीव व इन्सान के साथ रहता है। चलते हुए को गिराने वाले तो बहुत हैं लेकिन गिरे हुए को हाथ पकडक़र उठाने वाले बिरले ही होते हैं और वही पुरुष इतिहास बनते हैं। धन के अहंकार में इन्सान अंधा हो जाता है वह किसी के दुख, पीड़ा व वेदना को समझने की क्षमता खो देता है। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा जो शिष्य स्वच्छंदता त्याग कर अपने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करता है और संयम का आराधक बनकर एवं गुरु को अपना मार्गदर्शक समझकर उनकी आज्ञा का पाल...
चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा पाप का फाटक बंद करें। डरना है तो किसी अन्य से नहीं पाप से डरें। लिफ्ट का दरवाजा बंद नहीं करें ताकि ऊपर न जा सकें। पाप का फाटक बंद नहीं होगा तो जीवन की ट्रेन सुख की पटरी पर कैसे दौड़ेगी, अत: प्रतिदिन अपना निरीक्षण करें। पाप को पापरूप में पहचानें एवं आत्मसाक्षी से उसे स्वीकारें। हृदय से पश्चाताप करने से ही पाप का फाटक बंद हो पाएगा। मन की गांठें खोलो और पापों को धो डालो। भूल को छिपाने वाला इन्सान भव बिगाड़ लेता है जबकि भूल स्वीकार करने वाला स्वयं को सुधार लेता है। पाप चाहे काम रूप में हो या कल्पना रूप में, उसे स्वीकारना जरूरी है। यह न सोचें मैं पाप एकांत में एवं गुप्त में कर रहा हूं, कर्म की अदालत इतनी सूक्ष्म है कि मन से बुरा सोचा या सपने में भी किसी को गिराने, मारने, लडऩे की सोचो, कर्म की अदालत उसे नरक व तिर्यंच के स्टेशन पर पहुंच...
चेन्नई. एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा भारतीय संस्कृति दान, तप, वैराग्य एवं अहिंसा की संपदा से संपन्न रही है। विषम परिस्थितियों में भी इनकी विशिष्टता में कोई परिवर्तन नहीं आया। यह गौरवशाली संस्कृति विश्व को मार्गदर्शन देती रही है। इतना जरूर है कि मूल स्वरूप में बदलाव नहीं आया लेकिन इस महान संस्कृति के आध्यात्मिक पहलू को भुलाकर मानव ने भौतिक साधनों की लिप्सा को ही अपना ध्येय मान लिया है। जड़ता की महत्ता को स्वीकार कर लिया है। विज्ञान और पाश्चात्यकरण ने सभी अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है लेकिन इन्हीं परिस्थितयों के बीच रहते हुए भी अनेक आत्माओं ने इन संसार की विषमताओं को त्यागकर संयम पथ को अपना ध्येय बनाकर सर्वोच्च स्थान पाप्त कर लिया है। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा जब कभी कर्म निर्जरा होते-होते मानव गति प्रतिबंधित कर्मों का क्षय या क्षयोपशम होकर आत्मा कुछ विशुद्धि ...