कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि मित्रता जरूरी नहीं पाप से बचना जरूरी है। पशु सेवा अवश्य करनी चाहिए। द्वार पर आए गरीब को दान अवश्य दें। दान न दे सको तो मीठे शब्द अवश्य कहें अपशब्द नहीं। छोटे छोटे पुण्य के कार्य करके जीवन सफल बना सकते हो। ये सत्य है कि एक फूल से इत्र नहीं निकाला जा सकता। असंख्य फूल से निकाला जा सकता। इसी तरह छोटे छोटे सत्य कार्य करते रहो एक दिन वह महान अवसर बन आ जाएगा। जो छोटे छोटे पाप कार्य से बचते हैं एक दिन महान कार्य संपन्न करते हैं। छोटा धर्म कार्य भी बड़ा ही होता है और महान सत्कार्यो का उपवन बन महकता है। गांधी इसके उदाहरण हैं। यह स्वतंत्रता उन जैसे महान आत्माओं द्वारा दिया गया पुरस्कार है। आग की एक छोटी सी चिंगारी को छोटा मत समझना उससे पूरा वन जल सकता है। ऋण को छोटा मत समझना कभी भी दिवाला निकालवा सकता है। घाव को छोटा मत समझना ...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा प्रेम सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ तत्व है। प्रेम की ताकत के सामने आदमी झुकता है। रावण ने वासना के तूफान में सीता का अपहरण किया था। रावण को राम ने नहीं उसके काम ने मारा था। हिरणी अपने बच्चे के प्रेम के कारण सिंह का सामना करती है और सफल भी होती है। यह बात अलग है कि प्रेम के नाम पर ही धोखा हो रहा है। लोग वासना को प्रेम का नाम दे रहे हैं। हम दुर्गति में भटकने के लिए पैदा नहीं हुए। यदि परमात्मा बनना है तो ऊर्जा को ऊध्र्वगामी बनाओ। ऊर्जा पुरुषो का ध्यान करो। जैसे मोबाइल की बैटरी चार्ज करते हो, परमातमा की ऊर्जा से स्वयं को चार्ज करो। इससे हमारी आत्मा को इस अंधकार में फिर न भटकना न पड़े। आत्मा सीता कर्मो के कारागर में कैद है। राम की तरह संयम के तीर से कामना -वासना के रावण का अंत करो। धर्म के अभाव में जीवन नरक है। प्रेम सर्वांग का र...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा पाप अज्ञान में पैदा होता है। पत्ते मत तोड़ो, नींव तोड़ो, जड़ को काटो। पापी से नहीं पाप से नफरत करो। पापी को नहीं पाप को मिटाना है। तीर्थकंर का ज्ञान शास्त्रीय पुस्तक नहीं था। उनकी साधना से प्रकट हुआ था। जब महावीर को कैवल्य ज्ञान हुआ देवताओं ने समवशरण की रचना की। सभी प्राणियों को शरण दी। तरुणसागर ने भी सभी को शरण दी। सबको सुनाया, जगाया, मार्ग दिखाया। हजारों जुगनू मिलकर प्रकाश नहीं कर सकते। अज्ञान तो परमात्मा के पास जाने ही नहीं देता है। अज्ञान का पहला मित्र है स्वार्थ, दूसरा है हिंसा और तीसरा है अधिकार ये सब महावीर में नहीं थी। तुम्हारे पास टीवी ,अखबार और पुस्तकों से एकत्रित ज्ञान है जो तुम्हें संभलने नहीं देता। स्कूली ज्ञान ने सिर्फ प्रतिसपर्धा सिखाई है। जिस ज्ञान में राग द्वेष है मोह माया है वह हानिकारक है और जो ज्ञान...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि जिस पत्थर से पुल का निर्माण होता है उसी से दीवार भी बनती है। जो फूल भगवान को चढ़ते है उन्हें अर्र्र्र्र्थी पर भी चढ़ाया जाता है। यही नर्तन निर्वाण का कारण है और यही नर्तन नरक का भी कारण है। जिस अक्षर से राम बना है उसी से रावण बना है। तुम चाहे तो मुख से निकलने वाले शब्दों से जोडऩे का कार्य भी कर सकते है और तोडऩे का भी। भगवान को फूल अर्पण करना एक संकेत है, तुम एक फूल हो खुद में सुगंध पैदा करो। तुम पहले कमल बनो, विषय कषाय से ऊपर उठो। इस जगत में महावीर एक फूल है जो सुगंधित है और एक फूल आप है जो ज्ञान की सुगंध से रहित है। तुम एक फल हो जो अपनी सुगंध को खोज नहीं पाए। केवल ज्ञानी जहां बैठते है उस जगह को गंध कुटी कहते है। क्योंकि वहां केवल ज्ञान की सुगंध आती है। फूल सुबह खिलते है और शाम को मुरझा जाते है। ऐसे ही जीवन है। जीवन...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा जो दूसरों को दुख देता है वह अपने लिए दुख निर्मित करता है। दूसरे को सुख देना स्वयं को ही सुख देना तथा दूसरे को सजा देना खुद को ही सजा देना है। तुम्हारे बंधन और मुक्ति में तुम्हारे अतिरिक्त कोई और नहीं है। तुम जो भी करोगे अपने ही लिए करोगे यही धर्म का सार है। कभी ऐसा न हो पंथों का निषेध करने में परमात्मा का ही निषेध हो जाए। साधु निंदा अपनी ही निंदा है एवं साधु की प्रशंसा स्वयं की प्रशंसा है। साधु और पंथ की निंदा करने में स्वयं का परमातम ही छूट जाए। उससे बचना है जो मंदिर में छिपा है। उसे बचाना है जो मूर्ति में छिपा है। उसे छिपाना है जो स्वयं में छिपा है। जीव की हिंसा स्वयं की हिंसा एवं जीव पर दया खुद की दया के समान है। इसीलिए संत प्रेमी आत्महितैषी पुरुष कभी किसी जाति-पंथ-संत की निंदा नहीं करता। जब भगवान का विचार होता है त...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा राखी का त्यौहार अपनी वृत्ति-प्रवृत्ति बदलने एवं राक्षसी वृत्ति त्यागने का पर्व है। हैवान मत बनो इन्सान बनो। माता-बहनों को बुरी नजर से बत देखो। माता-पिता और भारतीय संस्कृति की रक्षा करना तुम्हारा ही कर्तव्य है। हमें यह त्यौहार प्रेरणा देने आया है कि हमारा दूसरा जन्म हो सके। इस त्यौहार के तीन नाम हैं-श्रावणी पूर्णिमा, नारियली पूनम एवं रक्षाबंधन। इसे ब्राह्मणों का त्यौहार कहते हैं। ब्राह्मण का अर्थ जातिवाद नहीं बल्कि ब्रह्म का आचरण करने वाला होता है यानी ब्रह्म में रमने की भावना जाग्रत करने वाला। हमारे जीवन में चार त्यौहार आते हैं-रक्षाबंधन, दशहरा यानी क्षत्रियों एवं वीरों का त्यौहार, दीपावली अर्थात वैश्यों का त्यौहार एवं होली यानी शूद्रों का त्यौहार। यह त्यौहार रक्षा संदेश लेकर आया है कि तुम ऊर्जा पुरुष हो। तुम्हारे मे...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा सत्य पुस्तकों में नहीं आत्मा में है। ज्ञान को नहीं ज्ञाता को पाओ। शास्त्र पढक़र आचरण में नहीं उतारा तो भगवान महावीर को पूरा नहीं आधा उतारा है। अंधेरा दिख रहा है तो प्रकाश करो, दुख है तो सुख की तलाश करो। बेहोशी है इसलिए जाग जाओ। मूर्छा ही दुख है। यदि दुखी हैं तो पिछला हिसाब देखो। पिछले जन्म में दीन-दुखियों की सेवा नहीं की बल्कि उनको सताया होगा। यदि सुखी हो तो पिछले जन्म में सेवा, दान, पूजा आदि का परिणााम है। जब तक पाप पकता नहीं फल मिलता नहीं। जब पाप पक जाता है जेल में सड़ता है एवं हाथ-पांव गलते हैं। दर-दर भटकता है। जो संतों पर विश्वास नहीं करते, अपने माता-पिता पर विश्वास नहीं रखते एवं सम्मान नहीं करते उनकी दशा हमेशा बुरी ही होती है। दुखी होने पर उन कारणों को जड़ से उखाड़ फेंकें और प्राणी सेवा, पूजा-भक्ति एवं संत सेवा करन...
चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा हमें मानव शरीर तो मिला है लेकिन मानव दृष्टि, भौतिक ज्ञान व समझ नहीं मिली इसलिए भटक गए। मान-सम्मान एवं भौतिक सामग्री में रम गए। हमारे पास बड़ी शक्ति है लेकिन उसका उपयोग नहीं जानते। धर्म की चार दीवारों में बांध दिया है। अपने-अपने संप्रदायों की जंजीरों में जकड़ दिया है। हमारी दृष्टि सिकुड़ गई है। अरिहंत एवं आत्मा का संशेषन नहीं होता। हम बाहर भटक रहे हैं। कैरियर ने कैरेक्टर छीन लिया है। चारित्र चला गया और चित्र एवं तस्वीर रह गई। सच्चा भक्त परमात्मा को देखने के बाद कहता है आपको देख लेने के बाद मन अन्यत्र आकर्षित नहीं होता। जब तक आपका परिचय नहीं हुआ था तब तक पागलों की भांति इधर-उधर भटक रहा था। जीव का निर्णय नहीं किया था। जबसे आपको देखा है, आपका परिचय हुआ है आप तक पहुंचा हूं यही मेरी साधना है और सागर का मधुर जल पीने क...
चेन्नई. कोण्डितोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा, पाप-पुण्य का हिसाब रखना जरूरी है। किसी का अपमान किया हैं तो उससे क्षमा मांगें। यही पुण्य-पाप का हिसाब है। यदि आदमी परमात्मा की भक्ति में डूब जाए, एकाग्र हो जाए, शुद्ध एवं शुभ भावों से भर जाए, तो उसके मन एवं आत्मा से कई प्रकार का अज्ञान, अंधकार, पाप एवं विचार समाप्त हो जाते हैं। पाप की विशेषता है कि वह जाने से पहले अपनी संतति छोडक़र जाता है यानी दूसरे पाप को छोड़ जाता है। हमारे जन्म-मरण की परम्परा सदियों पुरानी है। हमने सदियों से बाहर की गंदगी को अंतर में भरने का प्रयास किया है और अंतस के प्रकाश को बाह्य वस्तु देखने में बर्बाद किया है। हिंसा, झूठ, चोरी, क्रोध, मोह, माया ये सब पाप कर्म हैं। शरीर रूपी घड़ा सोने के समान है मगर हमने उसमें जहर का कचरा भर रखा है। आदमी अहंकार के जोश में धर्म का अपमान करता है। जवानी के...