चेन्नई. साहुकारपेट स्थित जैन भवन में विराजित उपाध्याय प्रवर रवीन्द्र मुनि ने कहा सालों से मंदिर जाने के बाद भी अगर व्यक्ति के जीवन में बदलाव नहीं आता तो उसका मंदिर जाना सफल नहीं हो सकता। सामायिक को सफल करना है तो हमे खुद की जांच करनी होगी, तभी जीवन सफल हो पाएगा। समस्त प्राणियों के प्रति मानव को मैत्रीभाव रखना चाहिए। स्वयं से ज्यादा दूसरों की चिंता करने को ही मैत्री भाव कहते है। प्रत्येक व्यक्ति कोई न कोई धार्मिक रास्ता अपना कर धर्म में आगे निकलने की कोशिश करता है। लोग सामायिक करते तो है लेकिन सिर्फ ऊपरी मन से। माला फेरने और भगवान का नाम लेने से सामायिक पूरी नहीं होती, इसके लिए बहुत सारे विधि विधान होते हंै जिनसे करने पर ही सामायिक सफल होती है। सामायिक, जाप और तपस्या करने के बाद भी अगर व्यक्ति के जीवन में बदलाव नहीं आता तो समझें सामायिक सफल नहीं हुई। सामायिक करने के बरसों बाद भी अगर व्यक्ति...
युवा शक्ति कुछ भी कर सकती है चेन्नई. साहुकारपेट स्थित जैन भवन में विराजित उपाध्याय प्रवर रवीन्द्र मुनि के सानिध्य एवं श्री एस.एस जैन संस्कार मंच के तत्वावधान में रविवार को सोमवार को युवा सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस अवसर पर रवीन्द्र मुनि ने कहा युवा शक्ति ऐसी शक्ति होती है जो चाहे तो कुछ भी कर सकती है। इसके लिए सबसे जरूरी बात यह है कि आगे आकर एकजुट होकर काम में लगना होगा। अगर हम एक साथ मिलकर किसी भी काम में कदम बढ़ाएंगे तो उसमें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। <br \/>\r\nयुवा शक्ति को हमेशा आगे निकलना चाहिए। उसकी शक्ति अगर चाहे तो किसी भी मुकाम को हासिल कर सकती है। युवाओं को जोस और होस में रहकर ही अपने काम को अंजाम देना चाहिए। युवाओं को अधिकाधिक संख्या में संघ से जुड़ कर अपने से बड़ों के परामर्श के साथ काम को आगे ले जाना चाहिए। मुनि ने कहा मैं बस यही कहना चाहता हूं कि ज्यादा से ज्यादा युव...
चेन्नई. सईदापेट जैन स्थानक में विराजित ज्ञानमुनि ने कहा आश्विन (आसोज) के महीने में आत्मसाधना के लिए नवपद ओली की आराधना करते हैं। मुनि ही क्या सामान्य व्यक्ति भी इस तप की आराधना में अनंत कर्मों का क्षय कर पर सुख प्राप्त कर लेता है। नवपद ओली मन, वचन, काया को तो ठीक करती ही है आत्मा को भी पूर्ण शुद्ध कर देती है। अरिहंत सिद्ध की आराधना करते हुए एवं भक्ति-श्रद्धा में जीवन डुबोते हुए चलें, निश्चित ही एक दिन अरिहंत सिद्ध बन जाएंगे। सब कर्मों का नाश हो जाएगा। भगवान आते हैं बुलाने वाला चाहिए। मन में दया, सरलता, प्रेम, श्रद्धा-भक्ति का समर्पण होगा तो निश्चित ही भगवान आएंगे। मुनि ने कहा भाई-भाई एवं सास-बहू लड़ रही हैं, ऐसे घर में भिखारी भी नहीं आएगा, वह भी भाग जाए तो उस घर में भगवान कैसे आएंगे। जब आत्मा सरलता, सहजता, कोमलता, पवित्रता आएगी तभी परमात्मा आएंगे। मुनि ने बताया कि स्नान, प्रश्न पूछना, गायन...
चेन्नई. नवपद में सब कुछ है लेकिन हम इधर-उधर दौड़ते रहते हैं। नवकार पर श्रद्धा नहीं करते। व्यक्ति स्वार्थ एवं इच्छाओं की पूर्ति के लिए भटकता रहता है लेकिन यह नवकार तो इच्छाओं का ही नाश कर देता है और आत्मा से परमात्मा बना देता है। परमात्मा से मांगें जरूर लेकिन अपने लिए नहीं सबके लिए खुशी और सुख मांगें। आप स्वत: ही सुखी हो जाएंगे। मुनि ने कहा हम मांगते ही रहते हैं मांगने की आदत हो गई है। सब कुछ मिल जाए फिर भी तो नई-नई इच्छा करके मांगते हैं और यही दुख का कारण है। धर्म करें कंकर से शंकर एवं गरीब से अमीर बन जाएंगे। धर्म हमेशा फल देने वाला है। सबको छोड़कर केवल चिंतामणि मंत्र नवकार मंत्र का ध्यान करें, इसमें अरिहंत, सिंह, आचार्य, उपाध्याय, साधु, ये पांचों सारे पापों का नाश एवं मंगल करने एवं सारे कर्मों को नष्ट करने वाले हैं। इसलिए इनकी शरण में जाएं एवं आराधना करें। ये ही भवपार उतारने वाला हैं। इस ...
चेन्नई, साहुकारपेट स्थित श्री जैन भवन में विराजित उपाध्याय प्रवर रवीन्द्र मुनि ने कहा बोलने से भी व्यक्ति की ऊर्जा खर्च होती है। जैसे व्यक्ति काम करके थक जाता है वैसे ही बोलने से भी उसकी ऊर्जा घट जाती है। मनुष्य बोलना तो तीन साल से ही सीखता है लेकिन क्या बोलना है जीवन भर नहीं सीख पाता। जैसे बोलना जरूरी होता है वैसे ही मौन रहना भी जरूरी है। यदि बोलते ही जाएगा तो ऊर्जा तो खर्च होगी ही। यदि यही रवैया रहा तो धीरे धीरे ऊर्जा का यह खजाना भी खत्म हो जाएगा। आदमी को क्या एवं कितना बोलना है की भी जानकारी रखनी चाहिए। भगवान कहते हैं मौन रखने वाला मुनि होता है और यदि वह धर्म के बारे में बोलता है तो भी वह मौन ही माना जाता है। अधर्म के बारे में बोलने वाला मुनि नहीं हो सकता। मुनि ने कहा व्यक्ति को बोलने से पहले सोचना चाहिए। जरूरी होने पर ही बोलना चाहिए अन्यथा शांत रहना चाहिए। बिना प्रमाण के कोई भी बात किस...
चेन्नई. ईदापेट जैन स्थानक में विराजित ज्ञानमुनि ने कहा हिंसा अधर्म का मार्ग है, यह दुखों की खान है, नरक का द्वार है इसलिए ङ्क्षहसा से हमेशा बचें और दया धारण करें। हिंसा अशांति एवं दुख-दुर्गति देती है। यही कारण है पहले लोग जीवन जीने में भी ज्यादा हिंसा से बचते थे। समय बदल गया, आज पग-पग पर हिंसा के साधन हो गए हैं। पुराने जमाने के लोग बड़े दयालु होते थे। कमजोर, अमुक जानवरों व गरीबों की बहुत सहायता करते थे और वह भी चुपचाप बिना किसी प्रकार के प्रचार के। मुनि ने कहा व्यक्ति चार बातों से चतुर बनता है- मित्रता ज्ञानी से, पंडित के पास बैठने से, राजाओं की सभाओं में जाने से। दया धर्म का मूल है। जहां दया होगी वहां परमात्मा का वास होगा। सारे ज्ञान, शास्त्र एवं जिनवाणी आदि का सार यही है कि जीवों पर दया करो, उनकी रक्षा करो औ हिंसा का त्याग करो। संचालन राजेंद्र लूंकड़ ने किया।
चेन्नई, साहुकारपेट स्थित श्री जैन भवन में विराजित उपाध्याय प्रवर रविन्द्र मुनि ने कहा कि व्यक्ति का मन ही उसका सबसे बड़ा मित्र और सत्रु होता है। मन में अगर नाकारात्मक भावना उत्पन्न होती है तो वह सत्रु है और साकारात्मक उत्पन्न होतो मित्र होता है। लेकिन जब तक मनुष्य स्वयं से कोशिश नहीं करेगा तो उसके सुखी, दुखी होने का कारण कोई और नहीं हो सकता है। जीवन में सत्रुता का भाव रखने वाले व्यक्ति अगर किसी को सहद भी देते है तो वह जहर का काम करता है। वहीं अच्छी सोच वाले अगर जहर भी दे तो वह अमृत बन जाता है। व्यक्ति का सब कुछ उसके मन पर ही निर्भर करता है। वह जैसा सोचता है वैसा ही उसके साथ होता है। दुनियां में दिखावा करना झूठ बोलना बहुत ही आसान है। जो सच्चाई के मार्ग पर चलते है उन्हें जीवन में कभी भी परेशानी नहीं आती है। आज के समय में व्यक्ति के आचरड़ को देख कर लगता है कि मनुष्य के चोले में इंसान नहीं बल्...
चेन्नई सईदापेट जैन स्थानक में विराजित ज्ञानमुनि ने कहा कल्याण चाहते हैं तो नम्र बनकर रहना होगा। धर्म के अंदर जाने के चार गुर हैं-पहला क्षमा यानी सहनशील होना चाहिए। इसी से एकता रहती है। दूसरे को निभाया जा सकता है। यह व्यक्ति को मजबूत करती है। दूसरा है सहनशीलता। क्षमा और सहनशीलता संत का आ ाूषण है। तीसरा विनय-द्वार। विनय धर्म का मूल है। चौथा सरलता, यह धर्म का पात्र है। सरल पात्र में ही धर्म टिकता है। कौवा बाहर से ही नहीं अंदर से भी काला है जबकि बगुला बाहर से सफेद और अंदर काला है। वह बाहर से तो साधु दिखता है लेकिन उसके काला भरा है। बगुला जैसे धर्मी बाहर तो दिखते धार्मिक हैं लेकिन अंदर पाप से भरे होते हैं। मुनि ने संथारे पर प्रकाश डालते हुए बताया कि संथारे से पहले आलोचना करना और अपने पूरे जीवन के पाप बोलना, फिर प्रतिक्रमण के बाद संथारा किया जाता है। तभी आत्मशांति मिलता है। जो सरल हैं वही संथारा...
चेन्नई, साहुकारपेट स्थित श्री जैन भवन में विराजित उपाध्याय प्रवर रवीन्द्र मुनि ने कहा व्यक्ति का सब कुछ ज्ञान और राग पर निर्भर करता है। जिन मिट्टी में मैत्री भाव का प्रभाव होने पर ज्ञान होता है वैसे ही राग के परिहार से साधुता आती है। जीवन में जैसे उजाले के समय में अंधेरा नहीं और अंधेरे के समय में उजाला नहीं होता है। इनको एक साथ करने की अगर व्यक्ति कोशिश करे तो कभी पूरी नहीं होती, क्योंकि दोनों को एक साथ रखना संभव नहीं। अगर व्यक्ति चाहे तो सफेद रंग में काले रंग को मिला सकता है लेकिन उनको कभी भी एक साथ नहीं कर सकता। उसी प्रकार यदि व्यक्ति के जीवन में ज्ञान का सद्भाव है तो राग का अभाव होगा। एक का सद्भाव दूसरे के अभाव का कारण बनता है। जीवन में राग का भाव है तो निश्चय ही उसके जीवन में ज्ञान का अभाव होगा। एक दम राग खत्म होना संभव नहीं होता। राग कोई चीज नहीं है जिसे जब चाहे तब बदल दें। संसार की क...