ज्ञान वाणी

जीवन की सफलता के लिए उदारता को अपनाएं: कपिल मुनि

चेन्नई. गोपालपुरम स्थित छाजेड़ भवन में विराजित कपिल मुनि ने कहा इंसान का जीवन एक तिजोरी के समान है इसमें सद्गुण रूपी आभूषण रखें व दुर्गण नहीं। कृपणता जीवन में उदारता के गुण को प्रकट नहीं होने देता। जहां उदारता है वहां मधुरता और सरसता का वास है। उदार व्यक्ति ही लोकप्रिय और भगवान की कृपा का पात्र बनता है। जहां सिर्फ संग्रह है वहां खारापन होता है। समुद्र इसका ज्वलंत उदाहरण है । नदी का पानी मीठा होता है क्योंकि वह वितरण करती है। कंजूस व्यक्ति बड़ा शोषण कर्ता भी होता है वह येन केन प्रकारेण धन संग्रह के लिए न्याय नीति, धर्म, कानून और मानवता सबकी बलि चढ़ा देता है ऐसा व्यक्ति न खुद चैन से जीता है और न किसी को चैन से जीते हुए को देख पाता है उसके सारे कृत्य जघन्य और अमानवीय बन जाते हैं । कंजूस के समान पाखंडी और क्रूर व्यक्ति ढूंढऩे पर भी नहीं मिलता। स्वयं के जीवन पथ को आलोकित करने के साथ दूसरों की ज...

परमात्मा से जोड़ती है भक्त की पवित्रता: आचार्य पुष्पदंतसागर

चेन्नई. कोंडीतोप स्थि सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंतसागर ने कहा भक्त की पवित्रता परमात्मा से जोड़ती है। सरलता परमात्मा के करीब ले जाती है एवं निष्कपटता परमात्मा बनाती है जो आत्मीयता से मिलती है। सत्य का रसपान कराती है। भक्त जब भगवान की भक्ति में डूबता है तो परमात्मा से कहता है मैं एकमात्र तुम्हारा और तुम मेरे हो। मैं चाहे निंदा का पात्र बनूं या प्रशंसा का। हंसाना है या रुलाना, पास बुलाना है या दूर भगाना है, तृप्ति का नीर बरसाना है या अतृप्ति की आग लगानी है। फूल बनकर महकूं या शूल बनकर चुभूं यह सब तुम्हारी मर्जी पर है। आत्मा की अनंत शांति को प्रकट करने तुम्हारी शरण में आया हूं। भगवान की शरण में भिखारी बनकर या पुजारी बनकर जाएं। सुदामा व मीरा की तरह बनकर जाएं तो हृदय का कमल खिल जाएगा। भगवान मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार करें। मेरी शक्ति नहीं है कि मैं बड़ा बनूं। आपके गीत गाऊं और ल...

जैन सबसे पहले भगवान महावीर का अनुयायी उसके बाद किसी संप्रदाय का

चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने  बुधवार को प्रवचन में जैन धर्म की शक्ति और इसकी विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सबसे पहले हम भगवान महावीर के अनुयायी हैं, उनके उपासक हैं उसके बाद विभिन्न संप्रदायों को मानने वाले। संप्रदाय तो व्यवस्था मात्र है। उन्होंने  दरकते रिश्तों पर एक प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि श्रावक-श्राविकाओं को धर्म और रिश्तों को निभाने के लिए भगवान राम, भरत, लक्ष्मण और उर्मिला के त्याग से प्रेरणा लेेने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज में रिश्तों में उतनी मधुरता नहीं दिखती जितनी अतीत में होती थी। आज का पुरुष पत्नी मोह में अपने मां-बाप, भाई-बहन और अन्य रिश्तों की उपेक्षा करने लगा है। आज का मानव अपनी मर्यादाएं भूलने लगा है,  जो समाज के लिए ठीक नहीं है। इससे पूर्व साध्वी महाप्रज्ञा ने कहा कि मानव जो मिला है आनन्द नही...

संसार में मालिक नहीं मेहमान बनकर जीएं : कपिल मुनि

चेन्नई गोपालपुरम स्थित छाजेड़ भवन में विराजित कपिल मुनि ने कहा जीवन तो एक समझौते का नाम है इसलिए सामंजस्य करके जीवन यात्रा तय करने में ही भलाई है। सबके प्रति प्रेम और मैत्री का व्यवहार और परस्पर उपकार करते हुए सहयोग की भावना रखकर जीना ही सफल और सार्थक जीवन की पहचान है। सजगता और सेवा भावना से ओतप्रोत जीवन ही सही मायने में जीवन है। एक ऐसा जीवन जिसके चारों और शांति और समता का निवास होता है। इस संसार में हर आदमी के साथ समस्याएं हैं। व्यक्ति का पुण्य कमजोर है और कर्म भारी। उग्र पुरुषार्थ और व्यवस्थित आयोजन के बावजूद जीवन प्रतिकूलताओं से घिरा रहने वाला है। आदमी दुखी इसलिए है कि ये संसार उसके लिए अनुकूल नहीं है। हम सब कुछ अपने अनुकूल चाहते हैं और वैसा नहीं होने पर दुखी हो जाते हैं। हमें याद रहे कि हम इस संसार के मालिक नहीं बल्कि कुछ दिनों के लिए इस धरती पर मेहमान बनकर आये हैं। मेहमान की बात घर मे...

समान व सम्मानपूर्वक दिया जाता है दान: मुनि संयमरत्न विजय

चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा कि युवतियों के कटाक्ष रूपी बाणों से भेदे जाने वाले काम में आसक्त पुरुष व धन के लोभ में आकुल-व्याकुल हुए प्राणी तो हजारों देखने को मिलेंगे, लेकिन काम और धन की प्राप्ति में मूलभूत कारण धर्म ही है, ऐसा जानकर जो मानव हमेशा धर्म करता रहता है, ऐसे प्राणी तो जगत में विरले ही होते हैं। धूल के ढेर में जैसे मणि मिलना, भयंकर प्राणियों से भरे जंगल में जैसे नगर मिलना, वृक्ष रहित मारवाड़ प्रदेश में वृक्ष की घनी छाया मिलना और मूर्खता रूपी पुष्पों को उत्पन्न करने के लिए गांव रूपी बगीचे में जैसे विद्वानों की सभा मिलना दुर्लभ है, वैसे ही क्लेश के आवेश से भरे इस संसार में शुद्ध बुद्धि का मिलना बड़ा ही दुर्लभ है। हमारी जिस क्रिया से अन्य लोग भी प्रभावित हो, वही वास्तविक प्रभावना है। समान रूप से व सम्मानपूर्वक बैठकर दिया जाने वाला दान...

मोक्ष मार्ग में बाधक है मद और पद : साध्वी धर्मलता

चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा जिसमें मैं और मेरेपन का भाव है उस जीव को मोक्ष नहीं मिलता। अभिमानी कहता है जगत मेरा सेवक है मंै ही सब कुछ हूं जबकि विनयवान कहता है मंै जगत का सेवक हूं, प्रभु के सामने अल्पज्ञ हूं। जहां नमस्कार है वहां पुरस्कार और जहां अहंकार है वहां तिरस्कार है। अभिमान से विराधना और विनय से साधना संपन्न होती है। जीवन यदि दूध है तो विनय उसे स्वादिष्ट बनाने वाली मिश्री है। जैसे ५० किलो दूध को नींबू की कुछ ही बूंद फाड़ देती हैं वैसे ही अभिमानी पूरे जीवन को बिगाड़ देता है। मद और पद मोक्ष मार्ग में बाधक है। मिट्टी की काया और दौलत की माया का कोई भरोसा नहीं, जब तक भीतर के अहम की वायु रहेगी मानव फुटबॉल की तरह चारों गति में ठोकरें खाता रहेगा। अत: इन्सान को धन, ज्ञान, सौंदर्य व बल-तप किसी भी विषय का अहंकार नहीं करना चाहिए। साध्वी अपूर्वाश्री ने कहा संसार क...

संतों के दर्शन से हीे पुण्यवानी का बंध: साध्वी धर्मप्रभा

चेन्नई. एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा संतों का वैराग्य ऐसा पक्का होता है कि जीवन में आने वाली बड़ी बाधाओं व विपदाओं से भी वे नहीं घबराते और न ही अपने पथ को छोड़ते हैं। एक महापुरुष का जीवन व आचरण उस नारियल की तरह होता है जो ऊपर से कडक़ लेकिन अंदर से कोमल, मधुर व गुणकारी होता है। ऐसे ही सच्चा संत ऊपर से कडक़ दिखता है लेकिन जब किसी जीव को दुखी देखते हैं तो वे द्रवित हो उठते हैं। सरोवर, वृक्ष, संत और मेघ ये चारों सदैव परोपकार के लिए ही जीते हैं। संत, बदली और नदी इन तीनों की चाल भुजंग जैसी होती है ये जहां भी जाते हैं वहां सबको निहाल कर देते हैं। संतों का मात्र दर्शन करने से ही पुण्यवानी का बंध होता है। संतों को तीर्थ से भी बढक़र बताया गया है क्योंकि तीर्थस्थल पर जाने से फल मिलता है और संतों के मात्र दर्शन से ही आत्मकल्याण हो जाता है। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा सांसारिक प्...

जीवन की सफलता के लिए चारित्रवान बनें: गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा मनुष्य को संतों का सानिध्य बहुत ही कठिनाई से प्राप्त होता है। ऐसा मौका अगर मिला है तो पूरे दिल से इसका लाभ उठाना चाहिए। गुरु भगवंतों की वाणी को अगर मनुष्य अपने आचरण में उतारता है तो उसका जीवन कल्याण की ओर बढ़ता है। जब भी यह अवसर मिले तो समय निकाल का इसका लाभ लेना ही चाहिए। जीव वाणी हमारे जीवन को प्रकाशित कर देता है। गुरु भगवंतों के सानिध्य में जाने वाला उत्तम पुरुष कहलाता है। परमात्मा की वाणी सुनने मात्र से जीवन को नया प्रकाश मिलता है। भाग्यशाली लोग ही गुरु भगवंतों के समीप जाकर प्रवचन का लाभ लेते हैं जो बेहतर बनाता है। परमात्मा की भक्ति के समय लोगों को मन में उल्लास रखनी चाहिए। ऐसा करने से जीवन में अनेक प्रकार की अनुभूति होती है। सागरमुनि ने कहा व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का लगातार प्रयास करते रहना चाहिए। प्रकाश ...

मुनि वही जिसके पास विवेक है : प्रवीणऋषि

चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा तैयारी के साथ किया जाने वाला कार्य निसंदेह पूर्ण होता है इसलिए मरने से पहले उसकी तैयारी करें। जो मृत्यु को जीता है उसे मृत्यु का भी कष्ट नहीं होता। जिसने मरने से पहले मृत्यु का आभास नहीं किया वे अपने अंत समय में भी संथारे की साधना नहीं कर पाते। आचारांग सूत्र में बताया कि जीव जिस योनि में जाता है, उसी के शरीर से प्रेम करता है, दु:ख और कष्टों से बचकर जीना चाहता है। खटमल से लेकर शेर तक सभी जीव अपने शरीर को बचाने के कष्टों से भागते रहते हैं, उन्हें भय आयुष्य कर्म के बंध के कारण मृत्यु से भय लगता ही है, जिस तन में आत्मा रहती है उसे बनाए रखने और सम्मान पाने की लालसा में हिंसा, परिग्रह और दुष्कर्म करती रहती है। दु:खों से मुक्ति और सुखों की चाहत में साधना ही नहीं विराधना भी की जा सकती है इसलिए संयम और विवेक अपनाना चाहिए।...

प्रेम सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ तत्व: आचार्य पुष्पदंतसागर

चेन्नई. सुंदेशा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंतसागर ने कहा प्रेम सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ तत्व है। हालांकि प्रेम के नाम पर ही सबसे अधिक दुव्र्यवहार हो रहा है। धोखा दिया जा रहा है और लोग वासना की तड़प बुझाने को ही प्रेम समझ रहे हैं। आदमी प्रेम के नाम पर ही धोखा खा रहा है। प्रेम की ताकत के सामने संसार झुकता है। रावण ने वासना के चलते ही सीता का अपहरण किया था। उसे राम ने नहीं उसके काम ने मारा था। हिरणी प्रेम के कारण अपने बच्चे को बचाने के लिए सिंह का सामना करती है और सफल भी होती है। मानतुंग आचार्य का कहना है कि सर्वशक्तिमान मानव को वासना के नाम पर गड्ढे में गिरने नहीं दूंगा। हम दुर्गति में भटकने के लिए पैदा नहीं हुए। यदि परमात्मा बनना है तो ऊर्जा को ऊध्र्वगामी बनाओ। ऊर्जावान पुरुषों एवं राम, महावीर का ध्यान व स्मरण करो। परमात्मा के ध्यान से स्वयं को चार्ज करो। इससे हमारी आत्मा को इस अंधकार में फि...

निर्जरा के साथ स्वत: अर्जित हो जाता है पुण्य: आचार्य महाश्रमण

चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में विराजित आचार्य महाश्रमण ने ‘ठाणं’ आगम के प्रथम स्थान में बताया गया है कि पुण्य एक है। जब कोई आदमी शुभ कर्म करता है तो उससे निर्जरा तो होती ही है, उसके साथ पुण्य का बंध भी होता है। शुभ कर्म और योग की प्रवृत्ति से दो कार्य होते हैं- पहला कार्य होता है कर्म निर्जरा और आत्मा निर्मल बनती है। आत्मा के साथ पुण्य का बंध भी हो जाता है। पुण्य का बंध कभी भी स्वतंत्र रूप में नहीं होता। पुण्य का बंध तभी होता है जब आदमी शुभ योग अथवा कर्म में प्रवृत्त हो। पुण्य का बंध धार्मिक क्रिया करने से होता है। जिस प्रकार अनाज के साथ भूसी भी स्वत: प्राप्त हो जाती है, उसी प्रकार शुभ कर्मों से निर्जरा रूपी अनाज के साथ-साथ पुण्य रूपी भूसी भी स्वत: प्राप्त हो जाती है। आदमी द्वारा किए जा रहे शुभ कर्मों से निकलने वाले सूक्ष्म कण शुभ होते हैं जो आत्मा से चिपकते ज...

अज्ञान हमारे जीवन का सबसे कट्टर शत्रु : कमल मुनि कमलेश

राष्ट्रसंत कमल मुनि कमलेश के प्रवचन     कोलकाता. अज्ञान हमारे जीवन का सबसे कट्टर शत्रु है। अनर्थ की खान और पापों की जननी है। अज्ञान से बढक़र और कोई जहर नहीं। एक शब्द का ज्ञान दान विश्व की संपूर्ण संपत्ति के दान से बढक़र है। अज्ञान दशा में की गई कठोर से कठोर साधना सफलता के बजाय संघर्ष में परिवर्तित हो जाती है। राष्ट्रसंत कमल मुनि कमलेश ने महावीर सदन में जनसभा को संबोधित करते हुए सोमवार को कहा कि अज्ञान का सघन अंधकार साक्षात परमात्मा भी सामने आकर खड़े हो जाए तो उनका साक्षात्कार नहीं होने देता। दुश्मन तो तन का नुकसान कर सकता है लेकिन अज्ञान आत्मा का जन्म जन्मांतर तक नुकसान करता है। मुनि ने कहा कि अज्ञान के कारण व्यक्ति हर स्थान पर उपहास और हंसी का पात्र बनता है। अज्ञान सही स्वरूप का साक्षात्कार नहीं कर सकता। किसी को अज्ञान से मुक्त करना सबसे बड़ा दान पुण्य सेवा और तीर्थ कराने के समान है। उन्हों...

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