ज्ञान वाणी

20वें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का अनुष्ठान किया गया

अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता व अन्य साध्वीवृन्द के सान्निध्य में मन की शांति, जीवन में सुख, संघ परिवार व समाज के संकट निवारण के उद्देश्य से गुरुवार को 20वें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का अनुष्ठान किया गया। चेन्नई के अलावा बाहरी क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में आए श्रद्धालुओं ने अनुष्ठान में भाग लिया। अनुष्ठान के सहयोगी परिवारों का सम्मान किया गया। इसके बाद सुनील जिनेश टाटिया के 11 उपवासों के पच्चखाण हुए। इससे पूर्व गुरु दिवाकर कमला वर्षावास समिति युवा संघ, महिला मंडल सेवा संघ द्वारा चौकी स्थापना की गई। समिति के सदस्यों ने बताया कि शुक्रवार को पदमावती के एकासन किए जाएंगे जबकि शनिवार को रक्षाबंधन के उपलक्ष्य में होने वाले कार्यक्रम को लेकर तैयारियां चल रही है। रविवार को उपप्रवर्तक विनयमुनि के सान्निध्य में मरुधर केसरी मिश्रीमल व व शेरे राजस्थान रूपच...

धर्माराधना से परिपूर्ण हो जीवन : आचार्य श्री महाश्रमण*

*केन्द्रीय मंत्री श्री विजय सामला ने किये आचार्य श्री महाश्रमण के दर्शन माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सुत्र के दूसरे अध्याय का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि दो प्रकार की आराघना होती है – धर्म की आराधना एवं केवली की आराधना| श्रावक बारह व्रत, सामायिक, पौषध, साधु – साध्वीयों की सेवा उपासना इत्यादि निर्वध कार्य करता है, यह धर्माराधना हैं| साधु ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप की निरअतिचार साधना करता है वह भी धर्माराधना हैं| आचार्य श्री ने आगे कहा कि चौदह पुर्वधारी श्रुत केवली, अवधि ज्ञानी, मन:पर्यवज्ञानी और केवली के द्वारा की गई आराधना केवली आराधना कहलाती है| आचार्य श्री ने राजा सिद्धराज जयचन्द द्वारा व्यवहार में रहते हुए मैं कैसे धर्माराधना करू? इस प्रश्न के उत्तर में आचार्य श्री हेमचन्द्र ने राजा को पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जो अपने जीवन ...

आहार और विचार दोनों जुड़वां भाई: साध्वी धर्मलता

ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा शरीर का आधार आहार है जिसके बिना शरीर का निर्वाह नहीं हो सकता। आहार हितकारी और परिमित होना चाहिए। भले ही खाने के लिए बहुत सी वस्तुएं हैं लेकिन पेट को डस्टबिन नहीं बनाएं। साध्वी ने कहा स्वाद के लिए खाना अज्ञानता एवं स्वास्थ्य के लिए खाना समझदारी व साधना के लिए खाना योग है। आहार तीन प्रकार का होता है-सात्विक आहार जो मानसिक भावना को पवित्र करता है। राजसिक आहार जो जीवन में विलासिता पैदा करता है तथा तामसिक आहार विकार उत्पन्न करता है। आहार और विचार दोनों जुड़वां भाई हैं। ये दोनों अलग नहीं रह सकते। जैसा आहार होगा वैसे ही विचार पैदा होंगे। दिन में एक खाना आहार, दो बार खाना भोजन और बार-बार खाना, खाना भी नहीं। एक बार खाने वाला योगी, दो बार खाने वाला भोगी एवं बार-बार खाने वाला रोगी होता है। साध्वी अपूर्वाश्री ने कहा क्रोध जीव को नरकगामी बना देता है।...

दुख का साथी कोई नहीं: साध्वी धर्मप्रभा

एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा इस स्वार्थमय संसार में इन्सान पर सभी आपत्तियों एवं घोर कष्ट के बादल मंडराते हैं और उसके लिए सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। ऐसे समय में अपने सगे-संबंधी भी शत्रु बन जाते हैं। उसके प्रति सहयोग की भावना नष्ट हो जाती है। संसार में सुख साथी तो लाखों हैं लेकिन दुख का साथी कोई नहीं। दुख में यदि कोई साथी है तो वह है धर्म। जो हमेशा जीव व इन्सान के साथ रहता है। चलते हुए को गिराने वाले तो बहुत हैं लेकिन गिरे हुए को हाथ पकडक़र उठाने वाले बिरले ही होते हैं और वही पुरुष इतिहास बनते हैं। धन के अहंकार में इन्सान अंधा हो जाता है वह किसी के दुख, पीड़ा व वेदना को समझने की क्षमता खो देता है। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा जो शिष्य स्वच्छंदता त्याग कर अपने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करता है और संयम का आराधक बनकर एवं गुरु को अपना मार्गदर्शक समझकर उनकी आज्ञा का पाल...

चौदह पूर्व का सार है नवकार: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में जारी नवदिवसीय नवकार महामंत्र की आराधना के पांचवें दिन मुनि संयमरत्न विजय ने एसो पंच नमुक्कारो पद के वर्णानुसार एलुर, सोनागिरि (जालोर), पंचासरा,चंद्रावती, नडिय़ाद, मुछाला महावीर, कापरड़ाजी व रोजाणा तीर्थ की भाव यात्रा करवाई। मुनि ने बताया कि नवकार के प्रभाव से हमें लोभ से निवृत्ति और संतोष की प्राप्ति होती है। नवकार के कुल 68 अक्षर होते हैं और 6+8 का योग करने पर 14 होते हैं। नवकार में चौदह बार न(ण) आता है जो नौ तत्व और पांच ज्ञान का प्रतीक है। 14 का अंक और चौदह ‘न’ इस बात का भी संकेत करते हैं कि नवकार मंत्र चौदह पूर्व का सार है। जिनशासन का सार और चौदह पूर्वों का समावेशक यह नवकार मंत्र जिसके मन-मंदिर में प्रतिष्ठित है, उसका संसार कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बिना ज्ञान के दया धर्म का पालन करना असंभव है। ज्ञानी व्यक्ति एक श्वासोच्छवास में जितने कर्मों की...

मनुष्य जन्म बहुत ही अनमोल है: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा मनुष्य जन्म बहुत ही अनमोल है इसलिए समय को व्यर्थ करने के बजाय सत्संग व प्रभु भक्ति में ध्यान लगाना चाहिए। यह भव बहुत ही महत्वपूर्ण है इसलिए सोच समझ कर ही आगे बढऩा चाहिए। उन्होंने कहा इस स्वार्थी दुनिया में बहुत ही संभल कर चलने की जरूरत है। मनुष्य को गुरुदेवों के सानिध्य में जाकर ज्ञान प्राप्ति करनी चाहिए। जिस तरह सागर में से एक बूंद जाने पर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता उसी प्रकार गुरुदेवों के पास ज्ञान का भंडार होता है। उनके सान्निध्य में जाकर भव को व्यर्थ होने से बचा लेना चाहिए। जीवन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव रखें। परिवार में अगर एकता और एक दूसरे को समझने का भाव होगा तो धर्म, तप करने का भी अलग ही आनंद मिलेगा। अपने स्वर्ग जैसे परिवार को नरक बनाने से बचें। उन्होंने कहा अपने इस अनमोल जीवन को राग- द्वेष से नहीं बल्कि प्रेम भाव से बिता...

जन्म, मरण और जीवन तीनों एक दूसरे के पूरक है: प्रवीणऋषि

पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा जन्म, मरण और जीवन तीनों एक दूसरे के पूरक हैं। परमात्मा के गणधर पहले दीक्षा लेते हैं व धर्म ग्रहण करते हैं फिर परमात्मा से अपने सवाल पूछकर जिज्ञासाएं प्रकट करते हैं। अत: पहले धर्म को जाने बिना ग्रहण करें। परमात्मा का ज्ञान प्राप्त हो जाए तो आर्त और रौद्र ध्यान कभी नहीं होगा, जीवन में शांति और दु:खों का नाश होता है। जब बीज मरता है तो ही पौधा जन्मेगा। यही जीवन-मरण का सत्य है। गौरवमय जीवन जीने का एकमात्र सूत्र सरलता है। जो मन, वचन, कर्म से समान होता है वही जीवन में सकारात्मक व सरल होता है। जीवन से जैसे-जैसे सरलता गायब होती है अशुभ का बंध होता जाता है। पारिवारिक रिश्तों में पारदर्शिता होनी चाहिए। किसी से भी छल-कपट और द्वेष न करें। सरल बनने का उद्देश्य भी केवल संसार में दिखावा नहीं बल्कि सफलता, शांति और स्वयं सिद्ध बनना होना च...

मूर्छित चेतना आदमी को कुपथ की ओर भी आगे बढ़ता है: आचार्य महाश्रमण

माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में विराजित आचार्य महाश्रमण ने बुधवार को कहा की चेतना मूर्छित बन जाती है जिससे आदमी कुपथ की ओर भी आगे बढ़ सकता है। आचार्य ने ‘ठाणं’ आगमाधारित प्रवचन में कहा द्वेष प्रत्यया मूर्छा के दो भेद बताए गए हैं-गुस्सा और अहंकार। द्वेष के कारण आदमी गुस्सा ही नहीं अहंकार भी कर लेता है। गुस्सा और अहंकार करने से आदमी की चेतना मूर्छित हो जाती है। अहंकार में आया व्यक्ति किसी अन्य का ध्यान नहीं रखता। वह अहंकार में स्वयं का भला भी नहीं सोच पाता। जब आदमी के अहंकार को कोई ठेस लगती है तो आदमी गुस्से में आ जाता है। इस प्रकार गुस्से और अहंकार का जोड़ा है। अहंकार करने वाला गुस्से में जा सकता है और गुस्सा करने वाला अपना ही नुकसान कर सकता है। नमस्कार गुस्से का अंत करने वाला है। नमस्कार महामंत्र में ‘णमो’ के द्वारा मानो बार-बार अहंकार पर चोट पहुंचाई जाती है। प्रेक्षाध...

वैभव से हजार गुना महान होता है तप और त्याग – श्री ललितप्रभ

महोपाध्याय श्री ललितप्रभ महाराज ने कहा कि वैभव कितना ही महान क्यों न हो, पर वह तप और त्याग से ज्यादा कभी भी महान नहीं हो सकता। भले ही सिकन्दर के पास महावीर से हजार गुना ज्यादा वैभव था, पर वह महावीर के त्याग से कभी महान नहीं कहलाएगा। जिसने वैभव को केवल इकठ्ठा किया वह सिकन्दर बना, पर जिसने वैभव को भी हँसते-हँसते त्याग कर दिया वह महावीर बन गया। एक तरफ सिकन्दर की मूर्ति हो और दूसरी तरफ महावीर की मूर्ति, यह सिर श्रद्धा से तो महावीर के चरणों में ही झुकेगा। उन्होंने कहा कि भारत तप और त्याग की भूमि है। यहाँ समृद्धि का सम्मान होता है, पर पूजा हमेशा त्याग की होती है। यह सत्य है कि दुनिया सम्पन्नता से प्रभावित होती है और सम्पन्न व्यक्ति ही सब जगह मुख्य अतिथि बनता है, पर वह भी जब किसी त्यागी-तपस्वी को देखेगा तो उसका सिर अपने आप तपस्वी के आगे झुक जाएगा। श्री ललितप्रभ कोरा केन्द्र मैदान में आयोजित सत्सं...

जिसने मन को बिगाड़ा उसका सबकुछ बिगड़ गया: साध्वी धर्मलता

आज व्यक्ति संस्कारहीन बनकर पास्चत्या संस्कृति की ओर बढ़ता चला जा रहा है। परमात्मा ने एक बूँद जल के अंदर असंख्य जीव बताये है। हमे उन्हें हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए.महासती धर्मलता ने धरम सभा को सम्बोधित करते हुए बताया की यदि कच्चा पानी नहीं पिए तो भगवान् की आज्ञा का पालन होगा। कैप्टन स्कॉर्से बी ने पानी की एक बूँद में 36450 जीव देखे है। मनुष्य का मन स्थिर नहीं है. उसे जैसा बनाओ वैसा बनता है। जिसने मन को बिगाड़ा उसका सबकुछ बिगड़ गया। जिसने मन को साधा उसने सब कुछ साध लिया। महासती ने कहा की अहंकार नर्क का द्वार है। अहंकार से आदमी फूल सकता है फ़ैल नहीं सकता समजाज में जब लोगो का अहंकार टकराता है तो समाज टूटता है। संतो का अहंकार टकराता है तो धर्म टूटता है। परिवार में अहंकार टकराया तो परिवार टूटता है। इसलिए हमे अहंकार रूप झूले को छोर नम्रता रूपी झूले पर झूलना चाहिए।

परम् की प्राप्ति में बाधक राग : आचार्य श्री महाश्रमण

*मूच्छा से मुक्त जीवन जीने की दी प्रेरणा *श्रीमती रंजनी दुगड़ “श्राविका गौरव अलंकरण” से सम्मानित माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सुत्र के दूसरे अध्याय का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि मूर्च्छा के दो प्रकार की होती हैं – प्रेयश प्रत्यया और द्वेष प्रत्यया| मूर्च्छा एक मोह का आवरण है जो चेतना को आवर्त कर देती है| जैसे आकाश में चमकते हुए सूर्य को बादल आच्छादित कर देते हैं, ठीक वैसे ही चेतना की निर्मलता को मोह रुपी बादल आच्छादित कर देते हैं| जैसे बादलों से आकाश आच्छादित होने पर उसकी तेजस्विता मंद हो जाती है, ठीक उसी प्रकार चेतना की तेजस्विता मंद हो जाती है| मूर्च्छा का आवरण चेतना को मूढ़ बना देता है| मूर्च्छा को ही मोह कहा जा सकता है| मोह, मूर्च्छा, कशमल ये पर्यायवाची शब्द है| आचार्य श्री ने आगे कहा कि प्रेयस यानी राग और द्वेष के कार...

गुरुदेव रूपमुनि के आदर्श जीवन में उतारें : विनयमुनि और गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक विनयमुनि और गौतममुनि के सानिध्य में गुरुदेव रूपचंद की श्रद्धांजलि सभा हुई। इस मौके पर गौतममुनि ने कहा गुरुदेव ने जीवनभर परोपकार के कार्य कि। उनकी प्रेरणा से ही अनेक गौशालाएं, अस्पताल और जीव दया केंद्र स्थापित किए गए। उन्होंने भगवान महावीर के अहिंसा का संदेश घर घर तक पहुंचाया। लोगों को उनके आदर्शों के अनुसरण का संकल्प लेना चाहिए। सागरमुनि ने भी उनका गुणगान किया। सभा में संघ के कोषाध्यक्ष गौतमचंद दुगड़ एवं अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे। मंत्री मंगलचंद खारीवाल ने संचालन किया।

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