साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने मंगलवार को कहा कि मनुष्य को जितना हो सके भलाई के कार्य करने चाहिए। अगर किसी की भलाई नहीं कर सकते तो बुराई भी नहीं करनी चाहिए। जीवन को सफल बनाने के लिए हमेशा अच्छाई के ही विचार रखने चाहिए। जितना संभव हो सके मनुष्य को भलाई और उपकार के कार्य करने चाहिए। उन्होंंने कहा यदि हम किसी का बुरा करते हैं तो अपनी आत्मा का बुरा भी हो जाता है। जब तक अच्छाई का गुण जीवन में नहीं आएगा तब तक हम धार्मिक नहीं बन सकते। जानते हुए भी अगर मनुष्य किसी की धरोहर लेने की कोशिश करता है तो यह पाप होता है। जीवन को धर्म के कार्यों से जोड़ते रहना चाहिए। सागरमुनि ने कहा मनुष्य को चारित्र और तप इसी भव में मिलता है, इसका पूरा लाभ उठाना चाहिए। ज्ञान की आराधना के साथ चारित्र की आराधना भी करनी चाहिए क्योंकि मनुष्य भव में ही चारित्र का आराधना करना संभव है। यह जीवन एक बार गया त...
पुरुषावाक्कम स्थित एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा हम दूसरों के साथ जो व्यवहार करते हैं वह पहले स्वयं के साथ करें। किसी की नकारात्मकता को जुबान पर मत लाओ। यदि आप उसे उजागर करते रहेंगे तो आप भी उन नकारात्मकताओं को ग्रहण कर लेंगे। दूसरे में भलाई देखने के लिए स्वयं भला बनना पड़ता है। उन्होंने कहा परमात्मा कहते हैं कि सचित आहार से हिंसा के साथ चोरी भी लगती है। दुनिया में जैन दर्शन ही है जो सचित आहार लेने से मना करता है। पानी में त्रसकाय जीवों के अलावा पानी स्वयं भी जीव है। वह सूक्ष्म नामकर्म नहीं लेकिन सूक्ष्म जीव है। उसे अचित करने के कुछ समय बाद जल पुन: सचित हो जाता है। पानी को छानकर उबालें, नहीं तो अपकाय के साथ त्रसकाय की हिंसा लगेगी। छानकर गरम करेंगे तो केवल अपकाय की हिंसा होगी, त्रसकाय की नहीं। जब सचित वस्तु आपके शरीर में जाती है तो एकेन्द्रिय जीव अपन...
अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने कहा श्रावक को प्रतिक्रमण करना जरूरी है। यदि इन्सान शारीरिक रूप से थक जाने के स्नान कर जिस तरह तरोताजा महसूस करता है उसी तरह श्रावकों को प्रतिक्रमण के स्नान से आत्मा की थकान को दूर करना चाहिए। साध्वी महाप्रज्ञा ने कहा आज के इस कम्प्यूटर युग में हर काम बहुत तेज गति से होते हैं। मोबाइल व्यक्ति के जीवन का अहम हिस्सा बन गया है। लोगों को उसके उपयोग के बारे में जानकारी भी जल्द ही हासिल हो जाती है। घर-घर में मोबाइल छाया हुआ है। अगर आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो जीवन भी एक मोबाइल है। जिस प्रकार मोबाइल में आप अहम चीजों को सेव करते हैं, अनावश्यक फाइल को डिलिट कर देते हैं, उसी प्रकार जीवन रूपी मोबाइल में भी सदगुणों को सेव करें, दुर्गुणों को डिलिट करेंऔर निंदा रूपी वाइरस को खत्म करें। अगर निंदा का दुर्गुण व्यक्ति में होता है तो...
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि भाग्य रथ के दो पहिए है, बुद्धि और पुरुषार्थ। बुद्धि तो पूर्व भव के क्षयोपशम से प्राप्त होती है और पुरुषार्थ से खिल उठती है। पुरुषार्थ के अनुसार ही भाग्य का निर्माण होता है। उद्यम के द्वारा ही मानव महामानव बनता है। आत्मा से परमात्मा, नर से नारायण और देह से देहातीत बनने के लिए पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। धर्म, अर्थ , काम और मोक्ष ये चार प्रकार के पुरुषार्थ है। धर्म और मोक्ष कल्याण की ओर ले जाते है। अर्थ और काम संसार के भाव भ्रमण को बढ़ा देते है। सद्पुरुषार्थ की ओर बढ़कर चरम लक्ष्य को पा सकते है। आठ कर्मों का नष्ट हो जाना ही मोक्ष है। उसमें पुरुषार्थ का प्रथम स्थान बताया है। इसलिए पुरुषार्थ सोच समझकर और सही मायने में किया जाए। इस अवसर पर सोनाली लुंकड़ ने आठ उपवास के प्रत्याख्यान लिए।
एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि जिदंगी एक बंासुरी की भांति है जो अपने में खाली और शून्य होते हुए भी संगीत पैदा करने का सामथ्र्य लिए हुए है। यह बजाने वाले पर निर्भर करता है कि कौन कैसे बजाता है। उस पर राग के सुर गाता है या वैराग्य के। बांसुरी के दिव्य स्वर आत्मा को जगा सकते है। जीवन छोटा हो या बड़ा हो महत्व इस बात का नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि जीवन कैसे जिया जाता है। जीवन छोटा ही हो पर प्रशस्त जीवन जियो। यदि हमें जीवन जीने का सलीका न आया तो जीवन जीने का क्या मकसद? हम जी रहे हैं क्योंकि सांस चल रही है। एक अंधी और अंतहीन पुनरुक्ति में जीवन बीतता चला जा रहा है। साध्वी स्नेह प्रभा ने कहा कि भोग में रोग का, कुलीन को पतन का, धनवान को राजा का, मौन में दीनता का, बल में शत्रुता का, रुप में बुढ़ापे का, शास्त्र ज्ञान में वाद विवाद का, गुणवान को दुर्जन का, शरीर धारण करने ...
साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय, भुवनरत्न विजय ने कहा जो मानव माता-पिता के हितकारी चरणों की पूजा करता है, उसकी यश-कीर्ति चारों दिशाओं में फैलने लगती है। उसे तीर्थों की यात्रा का फल मिल जाता है, वह सज्जनों के हृदय को आनंदित करता है, उससे पाप का विस्तार दूर हो जाता है, कल्याण की परंपरा को प्राप्त करके वह अपने कुल में धर्म-ध्वजा को लहराता है। पवित्रता व पुण्यता के पुंज समान माता-पिता की जहां भक्ति होती है,वहां पर जैसे समुद्र के प्रति नदियां स्वत: आकर्षित हो चली आती हैं, वैसे ही उसके पास लक्ष्मी स्वत: चली आती है। जैसे हरे-भरे वृक्ष की ओर पक्षी खुद चले आते हैं, वैसे ही सुख सुविधाएं स्वत: चली आती है और पानी में जैसे कमलों की श्रेणियां फैलने लगती है, वैसे ही पितृ-भक्त का मान-सन्मान बढऩे लगता है। माता-पिता के मनोहर चरणों की पूजा करने से जैसी शुद्धि हमारे भीतर होती है,...
माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सुत्र के दूसरे अध्याय का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने बताया कि पद्मप्रभु और वासुपूज्य ये दो तीर्थकर पद्म गौर वर्ण के थे| दोनों का शरीर समान था, लाल रंग के थे| पद्म का दूसरा नाम कमल होता है| प्राकृत एवं संस्कृत शास्त्रों में कमल को अनासक्ति के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है| अध्यात्म में अनासक्ति का बड़ा महत्व है| आसक्ति आदमी को डूबा देती है और अनासक्ति ऊपर उठा देती हैं| गृहस्थ जीवन में भी अनासक्ति की भावना रहे| गृहस्थ परिवार, समाज में रहते हुए भी चक्रवती भरत की तरह निर्लिप्त रहे| आचार्य श्री ने आगे कहा कि जो आदमी हर समय मृत्यु को याद करता है, वह अनासक्त भाव में रह सकता हैं| अनित्यता का भाव और उसकी अनुप्रेक्षा अनासक्ति का पाठ पढ़ाने वाली है, मौत को सामने रखने वाली होती है| आसक्ति पतन की ओर ले जा सकती है, अत: व्य...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा सच्चा सम्राट वही होता है जिसने अंहकार, अधिकार, आकांक्षाओं को जीता है। शरीर और इंद्रियों पर शासन कर रहा है वही सम्राट है। आत्म विजेता ही सम्राट है। आत्म विजेता बनने के लिए पित्त की नहीं चित्त की, धन की धर्म, विज्ञान की नहीं वीतराग की कषाय की नहीं करुणा की जरुरत होती है। शक्ति और धनबल से दूसरों को दबाने वाला सम्राट नहीं भिखारी है। जैन धर्म में तीर्थ शब्द महत्वपूर्ण है। श्वेताबंर ,दिगंबर, स्थानक वासी , मंदिरमार्गी सभी इसे मानते हैं। तीर्थंकर यानी जिसने चरम सीमा पा ली। आत्म शुद्धि की चरम सीमा को पहुंच गए। परम ज्ञान केवल ज्ञान को उपलब्ध हो गए। आत्मा की तीन अवस्था होती है-शुभ, अशुभ ,शुद्ध। शुद्ध की परम अवस्था में दुनिया की शक्तियां तीर्थंकर के चरणों में नतमस्तक होती है। यह जीवन एक कपड़ा है। हृदय की मशीन चलती रहती है और चदरिय...
भारत का दक्षिण हिस्से में अवस्थित तमिलनाडु राज्य। जहां लगभग साल के बारह महीने ही गर्मी का अनुभव होता है। आम तौर पर देखा जाए तो जुलाई, अगस्त व सितम्बर माह में भी यहां का तापमान न्यूनतम 30 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम 38 डिग्री सेल्सियस के आसपास होता है, किन्तु जब से जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता भगवान महावीर के प्रतिनिधि अखण्ड परिव्राजक महातपस्वी शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी अहिंसा यात्रा के साथ शांति का संदेश देते हुए तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में पधारे तब से मानों वातावरण का मिजाज भी बदला-बदला-सा नजर आ रहा है। सूर्य का आतप जहां लोगों को झुलसाने वाला होता है, वह आज सूरज आजकल ज्यादातर बादलों की ओट में अदृश्य रहता है। कभी तेज निकला भी तो आसमान में बादल उमड़ आते हैं और तपती धरती को अपने जल से अभिसिंचित कर वातावरण में को पुनः सुहावना बना देते हैं। ऐसा यहां के लोगों का...
राष्ट्रसंत महोपाध्याय श्री ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि जीवन जीने के दो रास्ते हैं-संत जीवन और गृहस्थ जीवन। व्यक्ति संत जीवन में है या गृहस्थ जीवन में यह महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि वह कैसा जीवन जी रहा है यह खास बात है। जनक, भरत, पुणिया जैसे गृहस्थ लोग भी संत की तरह जीवन जी लिया करते हैं तो कुछ संत होकर भी दुनियादारी में उलझ जाते हैं। महावीर जैसे लोग 30 साल की भरी जवानी में भी संन्यास ले लेते हैं तो दूसरी तरफ 70 साल का बूढ़ा आदमी भी मोह-माया में फँसा रह जाता है। दशरथ सिर के एक सफे द बाल देखकर वैराग्य से भर गए और यहाँ तो सिर के सारे बाल ही सफेद हो चुके हैं, पर कहीं वैराग्य की किरण भी नजर नहीं आती। भले ही हम कपड़े बदलकर संत बन पाएं कि न बन पाएं, पर मनोदशाओं को बदलकर पहले गृहस्थ संत अवश्य बन जाएं। संत ललितप्रभ कोरा केन्द्र मैदान में अध्यात्म सप्ताह के पहले दिन सीखें, निर्लिप्त होने की कला विष...
श्री मरुधर केसरी जैन गुरु सेवा समिति तमिलनाडु के तत्वावधान में सोमवार को वेपेरी में रिथर्डन रोड स्थित सीयू शाह भवन में सोमवार को देवलोक गमन पर वरिष्ठ उपप्रवर्तक रूपमुनि की श्रद्धांजलि सभा हुई। उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि, उपप्रवर्तक विनयमुनि व गौतममुनि, साध्वी कुमुदलता के सान्निध्य में हुई सभा बड़ी संख्या में समाज के लोगों ने हिस्सा लिया। सभा को संबोधित करते हुए उपाध्याय प्रवर ने कहा गुरुदेवों के प्रति लोगों की श्रद्धा है इसलिए लोग यहां उपस्थित हैं। उनसे हमें बहुत कुछ मिलता है। रूपमुनि की जुबान ऐसी थी कि पूरा जमाना उनका गुणगान करता है। जहां वे चलते थे पूरा जमाना उधर ही चलता था। उन्होंने कहा जयकारा उनका नहीं लगता जो स्वयं का जाप करते हैं बल्कि उनका लगता है जो दूसरों का जाप करते हैं। उन्होंने हमेशा समाज की भलाई देखी थी। लोगों को उन्होंने जीना सिखाया और इसलिए उनको मानव का मसीहा माना जाता है। उन्...
यहंा बेरी बेक्काली स्ट्रीट स्थित शांति भवन में ज्ञानमुनि ने कहा आत्मा के कर्मों को नष्ट करने या मिटाने पर ही मोक्ष संभव है। ये कर्म ही संसार में भटकाव का मूल कारण है और यही बाधा रूप है। अनुकूल कर्म सुख की अनुभूति करवाते हैं जबकि प्रतिकूल कर्म दुख का कारण बनते हैं। हालाकि दोनों ही बंधन रूप हैं। मोह कर्म सबसे भयंकर है। यह अच्छी-अच्छी आत्माओं को भटका देते हैं। यह मोह कर्म आठ कर्मों का राजा है। उसे जीतना एवं नष्ट करने पर सारे कर्म धीरे-धीरे क्षीण होते चले जाते हैं। जिसने मोह को जीत लिया उसने सब कुछ जीत लिया। अभिमान और स्वाभिमान दोनों अलग-अलग होते हैं। अभिमान में घमंड होता है जबकि स्वाभिमान में गौरव। हारने वाला मुंह नहीं दिखाता और जीतने वाले के लिए ढ़ोल बजते हैं। परिवार के बंधन के कारण व्यक्ति बंधन में पड़ा रहता है।