ज्ञान वाणी

जीवन को अध्यात्म से जोडऩे पर आनंद का अनुभव होता है: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा जीवन को अध्यात्म से जोडऩे का लक्ष्य बनाने पर जो आनंद का अनुभव होता है। यह कहीं नहीं मिल सकता। समर्पण भावना से परमात्मा के चरणों में जाने वाला जीवन को ज्ञानी बना लेता है। जीवन को सफल बनाने के लिए परमात्मा के चरणों में समर्पित होना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा दया व्रत कर पर्यूषण पर्व का लाभ लेना चाहिए। परमात्मा की वाणी भाग्यशाली आत्मा को ही सुनने का मौका मिलता है। इसका लाभ लेने से पीछे कभी नहीं हटना चाहिए। अब तक दूसरों की बातें सुनी लेकिन अब परमात्मा की वाणी सुनकर जीवन को सजाने का अवसर आया है। प्रवचन सुनकर दूध में पड़ा हुआ बताशा जैसे घुल जाता है वैसे ही अपना जीवन बदल सकते हैं। सागरमुनि ने कहा आचरण आत्मा को परमात्मा बना देता है लेकिन सबसे पहले श्रमण कर ज्ञानप्रकाश प्राप्त करें। आचरण का लाभ तप के बाद ही मिल पाता है। बिना तपाराधना के कोई भी ...

बिना मंजिल के रास्तों पर चलेंगे तो भटकते ही रह जाएंगे: प्रवीणऋषि

पुरुषवाक्कम स्थित एमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा बिना मंजिल के रास्तों पर चलेंगे तो भटकते ही रह जाएंगे। जिसे अपनी मंजिल नजर आए उसे परमात्मा श्रद्धाशील कहते हैं। अपनी मंजिल चुनें और फिर उसे प्राप्त करने की तैयारी शुरू करें। अपने रास्ते नहीं मंजिल तय करें। गति ही संसार का नियम है लेकिन जीव की प्रगति तभी हो सकती है जब वह चाहेगा। कोई जीव कैसे प्रगति कर सकता है? कई जीवों को बहुत परिश्रम के बाद भी प्रगति नहीं कर पाते। गति अधो भी हो सकती है और ऊध्र्व भी, यह जीव की इच्छा पर निर्भर करता है। प्रगति का पहला रहस्य है- तुम्हारा लक्ष्य, ध्येय और कामना क्या है। तपस्या करने के बाद भी समाधि का जागरण नहीं हो पाता, पूर्णता व लक्ष्यपूर्ति नहीं हो पाती इसका एकमात्र कारण है कि हमने साधनों को साध्य बना दिया है। युद्ध को भी कला बनाया जा सकता है। इसके लिए स्वयं को कलाकार बनना पड़ता है। अपने इस ...

दुर्जन व्यक्ति का आनंद भीड़ को गुमराह करने में है सुधारने में नहीं: पुष्पदंत सागर

कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा दुर्जन व्यक्ति का आनंद भीड़ को गुमराह करने में है सुधारने में नहीं, ताकि उसकी प्रतिष्ठा बनी रहे। लोगों में उसका दबदबा बना रहे। अपनी उन्नति को पुष्ट करने व अपनी दुर्भावना से सबको जोड़ता रहे। यह जघन्य अपराध है। अच्छा आचरण करना दूसरा व्यक्ति स्वीकार करेगा या नहीं इसमें संदेह है। कोई दुर्जन अपनी दुष्प्रवृत्तियों को जगजाहिर कभी नहीं करता। वह बदनामी से डरता है। भीड़ का नहीं विवेक का अनुसरण करना चाहिए। भीड़ का अनुसरण करने वाला सुधरता नहीं बिगड़ता है। एक कुशल वक्ता हजारों-लाखों को कुछ मिनट के भाषण में गुमराह कर सकता है लेकिन भाषणकर्ता को स्वयं को सुधारने में वर्षों लग सकते हैं। व्यक्ति अपना स्वास्थ्य रोगी को नहीं देता लेकिन अपना रोग दूसरों को दिए बिना नहीं रहता। उन्होंने कहा मेरा प्रयास दुर्जनों को सज्जन बनाने का है एवं जो सज्...

चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि ने जैन दिवाकर दरबार में धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि आज तीसरे दिन महापर्व पर्युषण पर बोलते हुए कहा कि श्रावक को 8 बातों का पालन करना चाहिये। *( 1 ) शास्त्र सुनना* *( 2 ) यथा शक्ति तप करना – अथार्त अगर आप में शक्ति है तो तपस्या करनी चाहिये। किसी कारण से नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं ,परंतु तपस्या कर सकते हैं तो अवश्य करें नहीं तो तपस्या के चोर ( तपचोर ) कहलाते हैं। ( 3 ) अभयदान – जीवो को कसाई के हाथों से बचाकर के जीवनदान चाहिये। ( 4 ) सुपात्र दान अर्थात जब भी अवसर मिले अपने हाथों से सुपात्र दान देकर के अपने देय पदार्थ को अपने हाथों से देकर के कृतार्थ करें। ( 5 ) ब्रम्हचर्य का पालन – हमें जीवन में शील का पालन करना चाहिये ज्यादा से ज्यादा कम से कम बीज पंचमी अष्टमी ग्यारस...

साधना का पर्व सुनहरा विषय पर प्रेरक उद्बोधन तेले के तपस्यार्थियों का निकला वरघोड़ा

अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में साध्वी कुमुदलता व अन्य साध्वीवृन्द के सान्निध्य तथा गुरु दिवाकर कमला वर्षावास समिति के तत्वावधान में शनिवार को करीब 700 तेले तप के तपस्यार्थियों का भव्य वरघोड़ा निकाला गया। विभिन्न मार्गों से होता हुआ वरघोड़ा दिवाकर दरबार में पहुंचकर धर्मसभा में परिवर्तित हो गया। इस अवसर पर अपने मंगल उद्बोधन में तपस्यार्थियों की प्रशंसा करते हुए साध्वी कुमुदलता ने कहा कि श्रद्धालुओं के प्रबल पुण्योदय से ही यह ऐतिहासिक धर्म आराधना संभव हुई। कर्मों के पुण्योदय से ही इतनी तपस्याएं हुई और इतने लोग धर्म से जुड़े। अगर तपस्यार्थी आगे आएंगे तो अन्य श्रावक-श्राविकाएं भी तपस्या के लिए प्रेरित होंगे। आगम वाणी के माध्यम से साधना का पर्व सुनहरा विषय पर उन्होंने मुनि गजसुकुमार का जीवन वृतांत सुनाया। उन्होंने कहा कि मां देवकी को उदास देखकर भगवान श्रीकृष्ण उनकी उदासी कारण पूछ बैठते हैं। देव...

संस्कारों की विरासत कष्ट और तूफान में काम आती है: प्रवीणऋषि

पुरुषावाक्कम स्थित श्री एमकेएम जैन मेमोरियल में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा जैसा आचरण वह करता है उसे दूसरे लोग सहज ही स्वीकार करते हैं। संस्कारों की विरासत कष्ट और तूफान में काम आती है। जिस दिन मां-बाप की नजर में बेटा बड़़ा हो जाए, बेटा का दुर्भाग्य उसी समय शुरू हो जाता है। इसलिए अपने मां-बाप के सामने कभी बड़े मत बनो, बल्कि बच्चे ही बनकर रहो। माता-पिता को चाहिए कि अपनी संतति से दूरी न रखकर उनको गले लगाएं ताकि बच्चे का मन न भटके, उसे बुरी आदतें न लगे, गलत संगत में नहीं पड़े अन्यथा बिगडऩे के तो हजारों रास्ते खुले रहते हैं। जीवन में आने वाली कठिनाइयों से कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। अंतगढ सूत्र में भाग्य से लडऩे वालों के दो उदाहरण हैं, एक सुलसा और दूसरे श्रीकृष्ण। श्रीकृष्ण द्वारा नियति को चुनौती देना ही उनका सबसे बड़ा कार्य था। वे अपने जन्म से आयुष्य पर्यन्त भाग्य और नियति को चुन...

भूल सुधारने के लिए कोई वक्त बुरा नहीं: कपिल मुनि

गोपालपुरम स्थित छाजेड़ भवन में विराजित कपिल मुनि ने अष्ट दिवसीय पर्वाधिराज पर्यूषण प्रवचन माला के तहत शनिवार को कहा कि श्रमण संस्कृति का चरम और परम उद्देश्य बंधन से मुक्ति प्राप्त करना है। भूल करने के लिए कोई वक्त अच्छा नहीं होता और भूल सुधारने के लिए कोई वक्त बुरा नहीं होता। भूल का अहसास होते ही उसका निराकरण कर लेना चाहिए। उन्होंने कहा, आदमी के व्यक्तित्व की पहचान उसके वचन व्यवहार से होती है। इंसान क्रिया-कलाप करते हुए वीतरागता के उद्देश्य से जीवन यात्रा तय करता है। जीवन में तप-त्याग के आदर्शों को सजाने की प्रेरणा का उपहार लेकर आता है पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व। इसका भौतिकता से कोई ताल्लुक नहीं है। इन दिनों में श्रावक-श्राविकाएं अपनी प्रवृत्ति को अध्यात्म रस से अनुप्राणित करते हैं। जीवन में जो प्रमाद और भूल हुई है उसका संशोधन करना ही इस पर्व का ध्येय होना चाहिए । हमारा शब्द प्रयोग और बातचीत ...

मनुष्य को अपने कर्तव्यों को कभी नहीं भूलना चाहिए: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन शनिवार को कहा कि पर्यूषण के समय में एक अद्भुत धर्म का नजारा देखने को मिलता है। मनुष्य को अपने कर्तव्यों को कभी नहीं भूलना चाहिए। जो अपने मां बाप के लिए हर प्रकार से समर्पित होकर सेवा करते हैं वे ही जीवन में आगे जा पाते हैं। जब माता पिता शरीर से लाचार हो तो पुत्र ही उनका आधार और सहारा होता है। त्यागी आत्माएं त्याग से और धर्म की आत्माएं धर्म को देखकर प्रसन्न होती है। जैसा घर का संस्कार होता है वैसा ही उनके अनुजों को संस्कार मिलते हैं। उचित लालन-पालन करने के बाद ही श्रवण कुमार ने भी अपने माता पिता की समर्पित भाव से सेवा की। जिनके बच्चे धार्मिक और नैतिक संस्कारों को अपनाते हैं वही व्यक्ति आगे चलकर श्रवण कुमार जैसे बनते हैं। उन्होंने कहा पर्यूषण पर्व के इस दिवस पर हमें आत्मा की निर्जरा करनी चाहिए। सागरमुनि ने कहा कि...

तानो का चरम विकास ही मोक्ष है: साध्वी धर्मलता

एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि जीवन में सम्यक ज्ञान,दर्शन और चरित्र की अराधना करना आवश्यक है। यह त्रय रत्न आत्मा का निज गुण है। मोक्ष का मार्ग है। तानो का चरम विकास ही मोक्ष है। जैसे यात्रा में पाथेय, पैसा और बिस्तर जरुरी है, एक के बिना भी शांति नहीं रहती। वैसे ही मुक्ति की मुसाफिरी के लिए त्रय रत्न जरुरी है। जीवन में हाइट, व्हाइट से भी ज्यादा जरूरी है राइट चरित्र। एक्टर हो या डायरेक्टर, कैरेक्टर सही होना चाहिए तो ही कल्याण के सोपान पर आगे बढ़ पाओगे। अधिक सुनकर कम बोलना ही बुद्धिमानी है। जीवन में भक्ति रूपी तीर्थ हो त्याग रूपी पानी हो सदाचार रूपी स्नान हो तब जीवन चंद्रमा के समान निर्मल, फूल के समान कोमल और सूर्य के समान उज्ज्वल बन सकता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान तेले का महत्व की प्रस्तुति पिंकी डूंगरवाल, कविता गुंदेचा, ज्योति डूंगरवाल, हेमा गुंदेचा, अनिता ...

स्वाध्याय ज्ञानवर्धन का उपाय: आचार्य महाश्रमण

माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने कहा कि जो तत्व जैसा है उसे यथार्थ रूप में प्रस्तुत करना उस पर श्रद्धा करना उसका सम्यक होता है। आदमी की आत्मा अनादि काल से भ्रमण कर रही है। भगवान महावीर की आत्मा भी अनादि काल से भ्रमण करने के उपरान्त मोक्ष को प्राप्त हो चुकी है। इस प्रकार एक प्रकार से कहा जा सकता है कि प्रत्येक आत्मा कभी न कभी मिथ्यादृष्टि ही थे। ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्राÓ के विशेष सम्बोधन में आचार्य ने भगवान महावीर के प्रथम भव नयसार के जीवन का वर्णन करते हुए उनका साधुओं से मिलना और साधुओं को आहार करवाने, साधुओं द्वारा नयसार को उपदेश देने और उसके बाद नयसार को सम्यकत्व की प्राप्ति तथा मृत्यु के उपरान्त प्रथम देवलोक में जाने की घटना सहित भगवान महावीर की आत्मा के दूसरे जन्म भगवान ऋषभ के कुल में भरत के पुत्र मरिचि के रूप में पैदा होने के प्रसंग...

विश्व कल्याण की भावना से करें पर्व की आराधना: साध्वी धर्मप्रभा

एसएस जैन संघ एमकेबी नगर स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि यह पर्व साधना की उत्कृष्ट स्थिति का ज्ञान कराता है। यह उत्तम मांगलिक और आत्मशुद्धि की उपासना का संदेश देता है। आत्मा को राग से वीरागता, क्रोध से क्षमा, द्वेष से स्नेह, मान से विनय, माया से सरलता ,लोभ से संतोष और विषमता से समता की ओर अग्रसर करने वाला पर्व है। भावों की निर्मलता और विश्व कल्याण की भावना से पर्व की आराधना करें। सभी प्राणियों के सुख और कल्याण की कामना करें। उदारता, कोमलता और सहिष्णुता के भावों से हृदय को स्वच्छ करे तभी पर्व मनाना सार्थक होगा। यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि दूसरों के गुण-दोष पर ध्यान न देकर खुद अपनी आलोचना करना, अपने गुण दोषों पर ध्यान देना ही लाभकारी है। साध्वी स्नेह प्रभा ने कहा कि सच्ची मैत्री वो होती है जिसमें छोटा -बड़ा, ऊंच-नीच, गरीब-अमीर का कोई भेदभाव नहीं होता। विपदा की घड़ी में भी ज...

संस्कार हीन और चरित्र रहित शिक्षा उत्पात मचा सकती है: पुष्पदंत

कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि संस्कार हीन और चरित्र रहित शिक्षा उत्पात मचा सकती है लेकिन शांति का कारण नहीं बन सकती। अमीर उच्चपद को टिकाने के लिए, गरीबों को प्रलोभन देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करेगा। अनपढ़ अक्सर जालसाजी का शिकार बनता है। वह बैंकों व महाजनों से कर्जा लेकर चुकाते-चुकाते थक जाता है। लेकिन ऋण कम नहीं होता। साहुकार और राजनेता उसके अनपढ़ होने का फायदा उठाते हैं। राजनेता कहते हैं अशिक्षित को शिक्षित बना भी दोगे तो क्या उनमें सरलता, सज्जनता आत्मयीता आ जाएगी। सज्जनता, विनम्रता हीन शिक्षा अभिशाप ही सिद्ध होगी। अपराध कम नहीं होगें। नेपोलियन के पास सब कुछ था फिर भी शक्तिहीनों को दबाया। अमीर देश धमकाने में लगे हुए हैं। संस्कार सहित शिक्षा वरदान है। संस्कार डालने और मन को पवित्र बनाने की योजनाएं बनाए तो संस्कृति बच सकती है, नहीं तो गरीब आश्वासन की भुखमरी...

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