अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता व अन्य साध्वीवृन्द के सान्निध्य में 10 सितंबर को देवलोक गमन हुए जयगच्छाधिपति ग्यारहवें पट्टधर आचार्य शुभचंद्र की श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। साध्वी कुमुदलता ने आचार्य के प्रति अपनी भावांजलि व्यक्त करते हुए कहा कि राजस्थान की माटी के इतिहास का जितना वर्णन किया जाए कम है। करोड़ों में से एक व्यक्ति ही संयम पथ पर चलता है। आचार्य शुभचंद्र ने संयम पथ पर चलकर समाज को कई शिक्षाएं दी और मर्यादाओं का पालन करने का संदेश दिया। उनके पास ज्ञान और विनय का खजाना था। यह संसार एक सराय है और दुनिया उसी को याद करती है जो दुनिया को कुछ दे जाता है। इस माटी में कई महान संतों का जन्म हुआ है। उन्हीं में से एक संत पुरुष थे आचार्य शुभचंद्र जिनका जन्म पाली जिले में हुआ। जो दुनिया में आता है, वह जाता भी है। जैन धर्म में आचार्य शुभचंद्र की शिक्षा...
माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के अंतर्गत त्रिपृष्ठ भव की घटनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा आदमी के जीवन में व्यवहार का बहुत महत्व होता है। भावना हो तो परिवार में बिखराव नहीं प्रेम हो सकता है। सद्व्यवहार से परिवार में सुख-शांति का माहौल कायम हो सकता है। जहां परस्पर सहयोग, व्यक्तिगत स्वार्थ की बात न हो उस परिवार में मानो सुख का पारावार आ सकता है। वह सबसे सुखी परिवार हो सकता है। उन्होंने कहा माना महाव्रत का बहुत ऊंचा राजमार्ग है लेकिन इस पर चलना सबके लिए मुश्किल हो सकता है इसलिए सामान्य आदमी छोटे-छोटे संकल्पों के द्वारा भी अपने जीवन को आध्यात्मिक गति दे सकता है। कोई आगंतुक आ जाए तो उसका सम्मान करने का प्रयास करना चाहिए। आगंतुकों का यथोचित सत्कार व सम्मान किया जाना चाहिए। समुचित सम्मान का व्यवहार हो, उदारतापूर्ण व्यवहार ह...
मण्डिया के तेरापंथ भवन में पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के पांचवें दिन अणुव्रत चेतना दिवस पर आराधकों को संबोधित करते हुए उपासकजी पदमचंद जी आंचलिया ने कहा कि अगर भाग्य के भरोसे रहकर पुरुषार्थ नहीं करते हैं, तो कर्मों का उदय यानि विपाकोदय नहीं होता है! वह प्रदेशो मे आकर चले जाते हैं! भाग्य को जगाने के लिए हमें पुरुषार्थ करना अपेक्षित है! हमारे भाग्य को लिखने वाले हम स्वयं है! मिथ्यात्व- विपरीत श्रद्धा ,गलत मान्यता ! उपासकजी ने धर्म की प्रक्रिया के छह- द्वार बताये – सुलभ बोधि, सम्यक् दृष्टि, देशवती, महाव्रती , वीतराग, अयोगी ! पूर्व मान्यताओं, धारणाओं को तोड़े बिना हम विकास नहीं कर सकते हैं! मिथ्या -विपरीत मान्यताओं को तोड़े बिना सम्यक् दृष्टि बन नहीं सकते! जीवन की सफलता का आधार सम्यक दृष्टि है! सम्यक् दर्शन से सम्यक् ज्ञान प्राप्त होता है ! सम्यक ज्ञान प्राप्ति के बाद ही हम सम्यक आचरण...
एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि आत्मा में प्रशम गुण नहीं आता तब तक मोक्षगुण और परम सुख का अनुभव नहीं हो सकता। सम्यक दृष्टि, ज्ञानी, ध्यानी और तपस्वी भी उस सुख का अनुभव नहीं ले सकते जिस सुख का अनुभव शांत आत्मा ही कर सकती है। शम का अर्थ है शांत और प्रशम का अर्थ है विशेष शांत। कषाय ,तृष्णा, लालसा से मन में उद्वेग उत्पन्न होता है। भावों में उग्रता, उत्तेजना और चंचलता आती है और जब तक यह उत्तेजना बनी रहती है तब तक शांति नहीं मिलती। जिसका मन अंशात होता है उसे संगीत, भोजन, मान-सम्मान और दूसरे कामें में सुख का अनुभव नहीं होता। नीचे चूल्हे की जलती आग से ऊपर शीतलता कैसे आ सकती है। प्रशम भाव आने से जो आत्मिक सुख और आनंद प्राप्त होता है वो ज्ञान ध्यान से भी श्रेष्ठ है। सबसे पहले प्रशम की ही साधना करना चाहिए। साध्वी स्नेह प्रभा ने ब्रह्मचर्य का महत्व बताते हुए कहा कि ये तपों...
एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि विकारों की पहचान सम्यकत्व के लक्षण से होती है। यही श्रद्धा के लक्षण मोक्ष का लर्निंग लाइसेंस है। हमारी श्रद्धा गुरु, देव और धर्म पर मजबूत होनी चाहिए। व्यवहार में विचार करें तो विश्वास से तैरते हैं तो किनारे भी मिलते हैं। इसके सामने स्वर्ग की गद्दी भी हिल जाती है। शरीर में जो स्थान रीढ़ की हड्डी का है वही स्थान जीवन में श्रद्धा का है। जैसे दांतों के बीच जिव्हा सुरक्षित रहती है वैसे ही संसार में समदृष्टि आत्मा भी सावधान रहती है। जब तक आदमी समझ नहीं पकड़ता वहां तक ही जीवन में अंधेरा है। जैसे बालक न जानकर बेर को पकड़ क र कीमती रत्न छोड़ देता है वैसे ही मिथ्यावी भी समेकित रत्न को छोडक़र भोगों में लिप्त हो जाता है। शरीर की हड्डी टूटने पर एक्सरे से, सिर में गांठ होने पर सीटी स्कैन कर और शरीर की गांठ का सोनोग्राफी से निदान किया जाता है। आ...
मंगलवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज द्वारा पर्युषण पर्व के अवसर पर ‘‘व्यवसाय की सफलता’’ विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित हुआ। उपाध्याय प्रवर ने बताया कि परमात्मा ने जैन धर्म में सर्वज्ञ बनना अनिवार्य किया गया है। ऐसी बातें जिन्हें पुण्य-पाप की कसौटी पर नहीं कसा जा सके उनका समाधान भी तीर्थंकर प्रभु ने दिया है। परमात्मा महावीर ने कहा है कि बिजनेस की सफलता से पहले बिजनेसमेन का व्यक्तित्व, चरित्र और प्रतिभा का विकास होना जरूरी है। सफलता का पहला सूत्र है- परस्परोग्रह जीवानां। जब तक परस्पर सहयोग नहीं करते सफल होने की संभावना नहीं है। पुराने समय में अन्यत्र व्यापार हेतु जाने के लिए दूसरों को भी अपने सहयोग देते हुए साथ ले जाकर व्यापार बढ़ाने में मदद की जाती थी, आपस में सहयोग रहता था। जब अपने स...
साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा अपनी संतान को सशक्त बनाने के लिए पांच वर्ष तक पुत्र का लालन-पालन करना चाहिए, जब दस वर्ष का हो जाए तो उसे नियंत्रण में रखना चाहिए तथा जब वह सोलह साल का हो जाए,तब उसके साथ मित्र जैसा बर्ताव करना चाहिए। जिस तरह हंसों की सभा में बगुले शोभायमान नहीं होते, वैसे ही विद्वानों की सभा में मूर्ख शोभायमान नहीं पाते। इसलिए वे माता-पिता वैरी और शत्रु हैं, जो अपनी संतान को सुसंस्कारों की शिक्षा से सुशिक्षित नहीं करते। पुत्र यदि दुराचारी है तो यह मां का दोष है, पुत्र यदि मूर्ख है तो पिता का दोष है, पुत्र यदि कंजूस है तो वंश का दोष है और पुत्र यदि दरिद्र है तो यह स्वयं पुत्र का ही दोष है। पर्यूषण पर्व क्षमापना पर्व के नाम से जाना जाता है। क्षमापना पराये को भी अपना बना देती है। प्रभु महावीर मातृ भक्त थे, माता-पिता का अपने प्रति मोह देखकर म...
साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा कि जो नींद लेते हैं वे आत्मगुण खोते हैं लेकिन जो जागते हैं वे आगे जाते हैं। पर्यूषण पर्व मनुष्य को उसकी गलतियों को सुधारने का मौका देता है। ऐसे मौके का लाभ उठा कर जीवन को मंगलमय बना लेना चाहिए। जो गुरु के चरणों में आते हैं परमात्मा बन जाते हैं। इसके लिए सबसे पहले खुद के अंदर विनय और समर्पण की भावना आनी चाहिए क्योंकि विनय के बिना गुरु का मिलन संभव नहीं है। संसार में आकर मनुष्य पैसे और परिवार के पीछे तो भाग कर पतन पाया लेकिन अब परमात्मा की ओर बढ़ कर उत्थान करने का प्रयास करना चाहिए। इससे पहले उपप्रवर्तक विनयमुनि ने अंतगढ़ सूत्र पढ़ा। इस मौके पर संघ के अध्यक्ष आंनदमल छल्लाणी व अन्य लोग उपस्थित थे। मंत्री मंगलचंद खारीवाल ने संचालन किया। इसी बीच शुभचन्द्र , जिनका देवलोकगमन हो गया, को श्रद्धांजलि दी गई। पर्यूषण पर्व नींद से उठने और आगे ज...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि मित्रता जरूरी नहीं पाप से बचना जरूरी है। पशु सेवा अवश्य करनी चाहिए। द्वार पर आए गरीब को दान अवश्य दें। दान न दे सको तो मीठे शब्द अवश्य कहें अपशब्द नहीं। छोटे छोटे पुण्य के कार्य करके जीवन सफल बना सकते हो। ये सत्य है कि एक फूल से इत्र नहीं निकाला जा सकता। असंख्य फूल से निकाला जा सकता। इसी तरह छोटे छोटे सत्य कार्य करते रहो एक दिन वह महान अवसर बन आ जाएगा। जो छोटे छोटे पाप कार्य से बचते हैं एक दिन महान कार्य संपन्न करते हैं। छोटा धर्म कार्य भी बड़ा ही होता है और महान सत्कार्यो का उपवन बन महकता है। गांधी इसके उदाहरण हैं। यह स्वतंत्रता उन जैसे महान आत्माओं द्वारा दिया गया पुरस्कार है। आग की एक छोटी सी चिंगारी को छोटा मत समझना उससे पूरा वन जल सकता है। ऋण को छोटा मत समझना कभी भी दिवाला निकालवा सकता है। घाव को छोटा मत समझना ...
आरकाट के श्री एसएस जैन स्थानक भवन में विराजित साध्वी श्री मंयकमणिजी ने कहा कि आत्महित में सहायक बनने वाले प्रभु वचनों का श्रवण दुर्लभ है। प्रभु वचन पाप से बचाती है,और संस्कार,सद्गति,सदगुण भी प्रभु वचनों से प्रापत होती है। लोगों को श्रवण के बाद उन वचनों को मनन में लेना चाहिए। यही नहीं मनन चिंतन करके मन के कुसंस्कारों के दमन करना और आत्म हित के लिए शुभ भावों को अर्जित करना चाहिए जो प्रभु वचनों से ही सुलभ है। चातुर्मास का लक्ष्य है परमात्मा की शरणागति में जाना। परमात्मा का प्यार पाना है। सदाचारिता,कर्तव्य परायणता,परलोकचिंता, पुण्यश्रद्धा में पवित्रता लानी है। इन पांच गुण से हम प्रभु का प्यार पा सकते हैं।
वेलूर के शांति भवन में विराजित श्री ज्ञानमुनिजी ने दिगवंत आचार्य श्री शुभचंद्रजी म.सा को भाव भीनी श्रद्धाजंली अर्पित करने के बाद कहे कि आचार्य श्री शुभचंद्रजी महाराज वयोवृद्ध अनुभवी सरलमना दीर्घ तपस्वी महान सेवा भावी पुरानी पीढ़ी के महान संत के निधन से जैन संघ की अत्यंत क्षति पूर्ति हुई जिसकी पूर्ति निकट भविष्य में असंभव है। आचार्य श्री सदा प्रसन्न मुख सब के प्रति वात्सल्य से ओत पोत व्यक्तित्व के धनी थे। इसी कारण सभी सम्प्रदाय के संत उनसे मिलना चाहते थे,उनसे मिलते थे और मिलकर अत्यंत प्रसन्नता का धन्य भाग्य अनुभव करते थे। ऐसे विरल व्यक्तित्व के धनी आचार्य श्री को श्री ज्ञानमुनिजी सहित काफी संख्या में श्रावक व श्राविकाएं भाव भीनी श्रद्धाजंली अर्पित किये। फिर धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्री ज्ञानमुनि ने कहे कि धर्म चार प्रकार के होते है-दान,शील,तप व धर्म है। मानव जीवन में सयमं अति अवश्यक...
विचारों के आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम भाषा होती है। भाषा लिखित भी होती है तो मौखिक भी होती है। बोलना होता है। आदमी मौन भी कर लेता है और बोल भी लेता है, वह कोई खास बात नहीं होती है, किन्तु आदमी बोलते हुए भी मौन कर ले, वह विशेष बात होती है। बोलना कोई बड़ी बात नहीं विवेकपूर्ण बोलना बड़ी बात होती है। माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा के क्रम में मरीचिकुमार के भव सहित सभी सोलहवें भव तक की कथा का वर्णन करते हुए यह कहा। ‘वाणी संयम दिवस पर आचार्य ने कहा कि वाणी एक महत्वपूर्ण तत्व है। आदमी को कटु नहीं मिष्ठभाषी बनने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपनी वाणी को संयमित रखते हुए कठोर अथवा कटु भाषा बचने का प्रयास करना चाहिए। वाणी में विनय हो, वह मिष्ठ हो। भाषा में अच्छे शब्दों का प्रयोग हो तो वाणी और भी सुन्दर बन सकती है।...