जालना : पर्यूषण पर्वाच्या तिसर्या दिवसाची सुरुवात अंतर्कृत दशांग सूत्राच्या पवित्र पठणाने झाली. या प्रसंगी उपस्थित भक्तांशी संवाद साधताना परम पूज्य रमणिकमुनिजी म. सा.यांनी जिनवाणी श्रवणाचे महत्त्व गहनपणे सांगितले. महाराजांनी स्पष्ट केले की, भगवान महावीर स्वामींच्या वचनातून प्राप्त झालेले हे ज्ञान अत्यंत मौल्यवान आहे आणि त्याचा स्वीकार न करता जीवनात खर्या अर्थाने आत्मिक प्रगती साधणे अशक्य आहे. आत्मिक संपदा आणि मोहनिया कर्मांवर विजय महाराजांनी सांगितले की, आत्मिक ज्ञान ही खरी संपदा आहे, जी ऐकण्यापुरती मर्यादित नसून प्रत्यक्ष जीवनात लोभ, क्रोध, मोह यावर विजय मिळवण्यासाठी वापरली पाहिजे. त्यासाठी त्याग, संयम आणि नियमित साधना हा अविभाज्य मार्ग आहे. भक्तांनी ध्यान, प्रार्थना आणि आत्मावलोकन करून आपल्या आत्म्याची प्रबलता वाढवावी. पर्वांचे उद्दिष्ट आणि आध्यात्मिक संदेश पर्यूषण पर्वाचा मुख्य हेतू श...
श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म सा ने शुक्रवार को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन अन्तगड सूत्र के माध्यम से सूत्र में वर्णित महान करुणा मूर्ति मोक्षगामी आत्मा श्री गजसुकुमाल मुनि के चरित्र पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि अपूर्व सहनशीलता, क्षमा,समता और करुणा की प्रतिमूर्ति थे महान साधक गजसुकुमाल मुनि। जिनके मस्तक पर सोमिल ने गर्म गर्म अंगारे रख दिये थे। पर करुणा मूर्ति गजसुकुमाल मुनि ने उस अपार तीव्र वेदना को भी समभाव से सहन किया और सामने वाले पर जरा भी क्रोध विषम भावों को नहीं लाते हुए महान क्षमा के गुण को धारण करते हुए सब कर्मो की निर्जरा कर परम पद मुक्ति को प्राप्त किया। ऐसे अपूर्व सहनशीलता समता और क्षमा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए आगम के इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठो पर अपना ना...
विश्व के समस्त प्राणियों की एकमात्र यही कामना है कि मुझे सुख मिल जाये और मेरे जीवन के तमाम दुःख टल जाये। सुख प्राप्ति के लिए मनुष्य अनेक प्रकार की प्रवृत्ति करता है, नानाविधि प्रयास करता है किन्तु अफसोस यह है कि हर प्रवृत्ति और प्रयास उसे दुःख के महागर्त में डुबो देता है इसीलिए दुनिया का एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिलेगा जो दुःखी न हो। यह संसार विचित्रता, विविधता और विषमता से भरा हुआ है। ऐसे संसार में जीते हुए हर कदम पर दुःख तो होंगे ही परन्तु आते हुए दुःखों को हम सुख में बदलें, यही हमारी विशेषता है। दुःख को रोकना मनुष्य के बस की बात नहीं है किन्तु आये हुए दुःखों को सुख में बदलना उसके हाथ में है। ज्ञानियों का कथन है कि दुःखों के बीच यदि शांति से जीना हो तो अपनी दृष्टि को बदल लो क्योंकि दृष्टि से ही सुख-दुःख का संवेदन होता है। यदि कोई दुःख का संवेदन करे तो उसे अवश्य दुःख होगा और न करे तो नहीं ...
कर्म के कारण आत्मा का एक जन्म से दूसरे जन्म को प्राप्त करना संसार है। संसार के सब प्राणी समान नहीं है। सबकी बुद्धि, वैभव और क्षमता भिन्न-भिन्न हैं। जिसके पास यह साधन उपलब्ध है उसका मन गर्व से भर जाता है, और जिसके पास साधन नहीं होते उसके मन में हीन भावना पनपती है। इस दोहरी बीमारी की चिकित्सा संसार-अनुप्रेक्षा द्वारा होती है। यह संसार परिवर्तनशील है। इसमें कोई भी व्यक्ति निरन्तर एक स्थिति में नहीं रहता। जन्म के साथ ही रोग, बुढ़ापा और मृत्यु का दुःख उसे घेरे रहता हैं। कहीं जन्म की खुशियाँ मनाई जाती हैं तो कहीं रोगी का पीड़ित स्वर सुनाई देता है। कहीं विवाह उत्सव रचा जा रहा है तो कहीं चिताएं जल रही हैं। वस्तुतः यह संसार असार और दुःखमय है। संसार के रंगमंच पर प्राणी विभिन्न पात्रों के साथ पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई आदि के रूप में विविध सम्बन्ध बनाता है। किसी से मैत्री करता है तो किसी से दुश्...
चिंचवडः येथील प्रसिध्द उद्योजक, चिंचवड श्टेशन श्री संघाचे पुर्व अध्यक्ष, जैन विद्या प्रसारक मंडलाचे विश्वस्त श्री जयप्रकाशजी रांका यांचा अम्रुतमहोत्सवी सन्मान आकुर्डी निगडी प्राधिकरण श्री संघाच्या विश्वस्तांनी शाल माळा, व वपुष्पगुच्छ देऊन केला व सुद्दरुढ आरोग्याची मंगलकामना केली. याप्रसंगी संघाध्यक्ष सुभाषजी ललवाणी, वरिष्ट उपाध्यक्ष विजयजी गांधी, विश्वस्त धनराजजी छाजेड, कोषाध्यक्ष नेनसुखजी मांडोत व सोबत सौ रेखाजी रांका
पर्युषण पर्व के द्वितीय पुष्पमे साध्वी स्नेहाश्री जी ने स्तवन के माध्यमसे अपनी बात रखी! स्वर्ग सरीखा लगे सु्नेहरा, मंदीरसा सुंदर हो, ऐसा अपना घर हो! हॅंसी खुंशी हो, जहॉं सभी सुखकर हो, कर्मयोग के किस्मत से मिली जमी हो! प्रेम, त्याग और मर्यादा, जिसकी नींव बड़ी हो! विश्वास के दिवारे से बना परिवार हो! रहे रोशनी ज्ञानकी उसमें, आगम भावके दरवाज़े हो! चंद्रमा जैसी रोशनी, माता-पिता ईश्वर हो! प्रेम प्यार , मिठास का रस कैसा घोले, ईश्वर के हिफ़ाज़त का त्योहार हो! दिवरानी- जिठानी में बहन बहन का प्यार हो, होली की सौग़ात हो हर शाम माता पिता के चरणो की मालिश कर दिवाली हो! एक दुसरो के प्रति सदैव स्नेह भाव बना रहे और उसी मे जीवन की भव्यता और दिव्यता है! अंतगड सुत्र का वाचन साध्वी श्रुतप्रज्ञा श्रीजी कर रहे है! गुरुमॉं समवसरण की यात्रा करा रहे है! 18 बहनो ने दयाव्रत धारण किया है! गांधी परिवार द्वारा सामुहिक ...
जालना (प्रतिनिधी) : जालना शहरात सुरु असलेल्या पर्युषण पर्वाच्या दुसर्या दिवसाचे आयोजन आज अत्यंत भक्तिभावाने झाले. सकाळपासूनच श्रावक-श्राविकांनी जिनालयात मोठ्या संख्येने उपस्थित राहून धर्मप्रवचनाचा लाभ घेतला. या प्रसंगी प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी आपल्या ओजस्वी शैलीत उपस्थितांना जिनवाणी श्रवणाचे महत्त्व समजावून सांगितले. जिनवाणीचे औषधासारखे महत्त्व मुनीश्रींनी प्रवचनात सांगितले की – जसे डॉक्टरांचे औषध आपल्याला समजले नाही तरी ते शरीरावर प्रभाव करते, त्याचप्रमाणे जिनवाणीचे शब्द आपल्याला समजले नाहीत तरी आत्म्यावर त्याचा प्रभाव पडतो. श्रवण करताना प्रत्येक शब्द परमाणु प्रमाणे कानांवर स्पर्श करतो आणि आत्मिक शुद्धतेकडे नेतो. भगवान अरिष्टनेमींचे चरित्र सभेत मुनीश्रींनी भगवान अरिष्टनेमींच्या जीवनातील द्वारिका नगरीतील सहस्रनाम वनातील प्रसंगाचे तपशीलवार वर्णन केले. श्रीकृष्ण व देवकी यांच्याशी...
श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म .सा. ने पर्व पर्यूषण के दुसरे दिन गुरुवार को धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि संसार में माता पिता की सेवा ईश्वर की सेवा के समान है। श्रीकृष्ण ने अपने माता पिता की आदर्श सेवा भक्ति, उनकी हर आज्ञा का विनम्रता से पालन करके जगत के समक्ष एक अनुपम, दिव्य आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि माता पिता अपने जीवन का सर्वस्व बलिदान करते हुए अपनी संतान का पालन पोषण करते हुए अपने बच्चों को संसार की हर खुशी प्रदान करने के लिए दिन रात अथक परिश्रम मेहनत करते हैं। वही बच्चे बड़े होकर जब अपने वृद्ध मां बाप की सेवा नहीं करते हैं और कुछ नौजवान जब अपने माता पिता को घर से बाहर निकाल देते हैं और उन्हें वृद्धावस्था में लाचार असहाय हालत में वृद्धाश्रम में छोड़ कर आ जाते हैं...
जालना (प्रतिनिधी) : आज जालना येथे पर्युषण पर्वाचा शुभारंभ मोठ्या श्रद्धाभावाने करण्यात आला. हे पर्व जैन धर्मातील अत्यंत महत्त्वाचे असते. आत्मशुद्धी, संयम, क्षमाशीलता, आणि धार्मिक अनुशासन या मूल्यांवर आधारित या पर्वाचा पहिला दिवस प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांच्या मार्गदर्शनाखाली हे पर्व साजरे करण्यात आले. या सोहळ्यात शहरभरातील विविध भागांतून मोठ्या संख्येने श्रद्धालू उपस्थित होते. धार्मिक विधी आणि भक्तिभाव पर्वाच्या पहिल्या दिवशी उपस्थित श्रद्धालूंनी गुरू गणेश धाम येथे पवित्र वातावरणात सहभागी होऊन प्रभु महावीर स्वामींच्या अमृतवाणीचा अनुभव घेतला. प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी उपस्थितांना समजावून सांगितले की, पर्युषण हा आत्मशुद्धीचा महत्त्वपूर्ण काळ आहे, जिथे प्रत्येक जैन अनुयायीने आपल्या मन, वाणी आणि कर्मावर संयम ठेवणे आवश्यक आहे. भक्तांनी या दिवशी विशेष उपवास केला, प्रातःकाल आणि संध्याकाळी जप...
इन्सान के जीवन की सबसे बड़ी पॅुंजी होती है दुऑं की दौलत, पर्वाधिराज पर्यषण पर्व का जपतप आराधना से शुभारंभ हुआ ! महाराष्ट्र सौरभ, उपप्रवरतिनी पु. चंद्रकला़श्री जी म.सा.,शासन सुर्या पु स्नेहाश्रीजी म.सा. एवं मधुरकंठी पु. श्रुतप्रज्ञाश्री जी म.सा. आदि ठाणा 3 के पावन सानिध्य मे चातुर्मास गतिमान हो रहा है! आज पर्युषण पर्व के प्रथम पुष्प मे स्नेहाश्री जी ने अपने पुर्वाधिराज के स्वागत मे “ मेरे महावीर भगवान, मेरे मनमंदीर मे आओ” स्तवन पेश कर पर्वपर्युषण प्यारा जग को जगाने आया, भव्य संदेश मनोहर सबको सुनाने आया! रात्र पुरी हुई, अंधकार पुरा हो गया! सम्यकत्व का सुर्योदय हुआ! मंगलमय प्रभात हुई! सभी पर्व का राजा पर्युषण पर्व आया है! इंसान के जीवन की सबसे बड़ी पुंजी दुऑंओ की दौलत होती है! प्रणाम से चरण वंदना पंचांग साष्टांग प्रणाम के परिणाम अच्छे होते है! प्रणाम से ग्रह दशा बदलती है! अपने दिन की शुरुवात ...
महापर्व पर्युषण आत्म-जागरण का पर्व है। अपने आप पर अनुशासन का पर्व है। विभाव से स्वभाव की ओर बढ़ने का पर्व है। अपने आपको बाहर से समेटकर भीतर से संलग्न करने का पर्व है। पर्युषण पर्व समग्र कषायों से विरति का संकल्प लेते हुए क्षमा-विनय-सरलता, समता, संतोष और सद्भाव-सौहार्द की अभिवृद्धि करने का पर्व है। सर्वथा विशुद्ध, इस आध्यात्मिक पर्व में आत्म-निरीक्षण, आत्म-चिंतन, आत्म-रमण और स्वभाव-रमण कीऔर जीवन के प्रति विशिष्ट चिंतन जगाने वाले इस पर्व की आराधना पूर्ण सजगता के साथ की जानी चाहिए। पर्युषण का अर्थ आत्मा के चारों ओर प्रमाद आदि के कारण कर्मों और कषायों का जो कचरा एकत्रित हो गया है, उस कचरे को जलाकर नष्ट कर दे, उस प्रक्रिया का नाम पर्युषण है। आत्मा के समीप आना, आत्मा के सम्मुख रहना या आत्मा के द्वारा आत्मा का, स्वयं के द्वारा स्वयं का ध्यान लगाना है। अपना ध्यान और ज्ञान करना सचमुच बहुत बड़ी बा...
श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म .सा. ने बुधवार को पर्यूषण पर्व के प्रथम दिवस पर पर्युषण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पर्यूषण यह आध्यात्मिक पर्व है। इस पर्व को मनाने के लिए देवलोक से देवता भी मेरु पर्वत पर आकर अष्ट दिवस तक इस पर्व को धूमधाम से महोत्सव रूप मानते हैं। संसार के भौतिक राग रंग को छोड़कर, आमोद प्रमोद, सांसारिक प्रवृत्तियों को छोड़कर आध्यात्मिक साधना, तप त्याग आराधना, सामायिक, प्रतिक्रमण संवर दया पौषध, उपवास, जप तप के साथ प्रतिदिन प्रार्थना, प्रवचन जिनवाणी श्रवण करना और अपनी आत्मा के निकट रहना ही पर्यूषण पर्व का महान संदेश जगत के जीवन के लिए और साधक आत्माओं के लिए कर्म निर्जरा की पावन प्रेरणा प्रदान करता है। यह पर्व अंधकार से प्रकाश की ओर, हिंसा से अहिंसा की ओर, पशुता से मानवता की ओर एवं भोग से त्याग क...