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जीवन का सार तत्व धर्म है: आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी

जीवन का सार तत्व धर्म है : देवेंद्रसागरसूरि श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में बिराजित आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने धर्म प्रवचन के माध्यम से उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन का सार तत्व धर्म है। धर्म से ही जीवों की वास्तविक पहचान होती है। इसलिए धर्म का स्थान सर्वोपरि है और किसी भी सत्ता का स्थान उससे ऊपर नहीं है। हर हालत में धर्म की रक्षा करनी है। अगर किसी का धर्म चला गया तो उसका सब कुछ चला गया।   दूध से उसकी सफेदी हटा देने से उसे दूध नहीं कहेंगे। इसी प्रकार किसी भी सत्ता का धर्म नष्ट हो जाने से उसकी विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है। जब कोई जीव या कोई सत्ता अपने धर्म से हट जाती है तो उसका सर्वनाश हो जाता है। इसलिए किसी भी हालत में धर्म को नष्ट नहीं करना है, धर्म को बचाना है। संक्षेप में कहें तो परोपकार करना और अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को निभ...

आरवाइए काॅस्मो फाउंडेशन और जेपीओएस ने स्वास्थ्य जांच शिविर के लाभार्थी एवं कार्यकर्ताओं का किया सम्मान

राजस्थान यूथ एसोसिएशन (आरवाइए) कॉस्मो फाउंडेशन एवं जैतारण पट्टी ओसवाल संघ (जेपीओएस) द्वारा शनिवार को मनोहरमल कमला कांकरिया आरवाइए काॅस्मो कैंसर डिटेक्शन सेंटर में आयोजित एक समारोह में सात दिवसीय मास्टर हेल्थ चेकअप एवं कैंसर जांच शिविर के समापन के तहत लाभार्थी परिवार व का कार्यकर्ताओं सम्मान किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. सुनील सिंघवी एवं विशिष्ट अतिथि ‘राजस्थान रत्न’ सुभाषचंद रांका थे। इस मौके पर जेपीओएस की ओर से आरवाइए काॅस्मो के अध्यक्ष रंजीत गादिया, फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी अभय लोढ़ा का भी सम्मान हुआ। जेपीओएस के अध्यक्ष महावीरचंद सिंघवी ने स्वागत भाषण देते हुए शिविर के सफलतापूर्वक आयोजन के लिए फाउंडेशन के मैनेजमेंट व स्टाफ का आभार प्रकट किया। उन्होंने भविष्य में भी ऐसे शिविर आयोजित करने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का आश्वासन दिया। मुख्य अतिथि ने अपने संबोधन में उपस्थित ल...

सामायिक करना अपने आप मे एक साधना है: जयतिलक मुनिजी

  नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन कि आत्मबन्धुओं, सामायिक करना अपने आप मे एक साधना है। जिसकी यह साधना सफल हो जाती है उसका अनंत संसार परिभ्रमण मिट जाता है। इसलिए यह सामायिक की साधना प्रत्येक व्यक्ति को करनी चाहिए। यह सबसे सरल, सुगम, उत्तम साधना हो । एक सामायिक में संसार के सब त्याग, प्रत्याख्यान का समावेश हो जाता है। इसलिए सामायिक को रानी मधुमक्खी की उपाधि दी गयी है। जो सामायिक की रुचि पूर्वक भाव पूर्वक सम्यक आराधना करते है वे जानते है कि सामायिक से कितने अनुपम सुख की अनुभूति होती है। जबरदस्ती, लोक लाज से सामायिक करने वाला सामायिक के सुख से वंचित रह जाता है। सामायिक में लीन हो कर जो सामायिक का आस्वादन करेगा उसे ही सामायिक का महत्व समझ आयेगा। ज्ञानी- जन इसलिए कहते है कि सामायिक को समझो और जीवन में धारण कर लो। सामायिक करने वाला विश्व के सभी प्रकार के पापों, भोगों कामनाओं स...

इन्द्रियों के पराधीन रहोगे तो मानव भव के साथ अपनी आत्मा को मलिन होने से नहीं बचा पाओगें: महासती धर्मप्रभा

Sagevaani.Com @चैन्नई। इन्द्रिया वश मे हो गई तो मानव को संसार मे पूज्यनीय और महान बना सकती है।शुक्रवार को साहूकार पेठ जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि इन्द्रिया हमारी अच्छे फल भी देती है और बुरे फल भी देती है। इन्द्रियों के पराधीन व्यक्ति अपने मानव भव को बिगाड़ सकता और अपनी आत्मा को वो मलिन होने से नहीं बचा सकता है। मनुष्य को अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करनी है तो उसे इन्द्रियों को वश में करना ही पड़ेगा। ज्ञान और साधना एक ऐसी शक्ति है,जिसके माध्यम से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। ज्ञान मे वो कला है।जिसकी शक्ति से इंसान अपनी इन्द्रियो को वश में कर सकता है। जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया समझों उसने स्वयं तो क्या उसने दुनिया पर विजय प्राप्त कर ली और परमात्मा के करीब पहुंच गया। मनुष्य अपनी इन्द्रियों के वशीभूत होकर संसार में कई ऐसे पाप कर्म कर ...

सर्व धर्म समभाव का मतलब है सब धर्म का भला हो: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि सब धर्म का कर सम्मान मैं सर्व धर्म समभाव में विश्वास रखती हूं सर्व धर्म समभाव का मतलब है सब धर्म का भला होl हमसे दूसरों का सबका भला हो सर्वधर्म भाव वाले सर्वधर्म शब्दार्थ सब की प्रति अच्छी सोच अच्छा व्यवहार भलाई का रास्ताl यह नहीं देखा कि कौन हिंदू कौन मुसलमान, सिख, ईसाई या पारसी भलाई का रास्ता सबके प्रति भलाई का नजरिया रखता हैl दूध का सार मलाई और धर्म का सार भलाई हमने सबका भला हो हमारा खून हमारी औकात अगर किसी के काम आ सके हमसे किसी का भला हो जाए तो सौभाग्य जीवन के लिए एक ही मंत्र अपना एक भी पॉजिटिव खास तौर पर सस्ता सच्चे नेता को जीने के लिए मनुष्य की आग में जलने से बचने के लिए मां की श...

समझदार मानव जीवन के सभी प्रसंग में स्वयं की वास्तविक चेतना से ही जुड़ता है: वैभवरत्नविजयजी म.सा.

     🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  🪷 *विश्व विभूति प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न युग प्रभावक, राष्ट्रसंत श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय : अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7*🪔 ~ यह मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठ फल है समाधिदशा और यह ज्ञानदशा से ही प्रकट होती है। ~ समझदार मानव जीवन के सभी प्रसंग में स्वयं की वास्तविक चेतना से ही जुड़ता है। ~ साधक स्वयं की साधना में ही निमग्न रहता है और अन्य जीवों के प्रति भी हित की दृष्टि रखता है। ~ जो साधक प्रबल शक्तिशाली शल्य रहित है उसे कोई भी कठिन से कठिन परिषह, उपसर्ग भी दुखी नहीं कर सकते। ~तीन कल में और तीन लोक में मोक्ष में जाने का मार्ग केवल एक ही है वह है सम्यक् दर्शन, ज्ञान, चारित्र। ~ समाधि भाव में साधक को जो...

होश में जीने वाला अपनी वाणी की पूंजी को पुण्य में खर्च करता है : साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

जैन साध्वियों ने बताया- वाणी आपको तीर्थंकर बना सकती है और नरक के द्वार भी खोल सकती है Sagevaani.com @शिवपुरी। प्रसिद्ध जैन साध्वी रमणीक कुंवर जी म.सा. की सुशिष्या साध्वी नूतन प्रभाश्री जी, साध्वी पूनमश्री जी और साध्वी वंदनाश्री जी का गंगा, जमुना और सरस्वती की तरह समन्वय प्रवचनों में अद्भुत रंग भर रहा है। साध्वी पूनमश्री जी ने आज जीवन में होश की महत्ता पर आधिकारिक रुप से व्याख्यान देते हुए कहा कि जिंदगी को जोश से नहीं, बल्कि होश से जीना चाहिए। उन्होंने अपनी बात जहां पूर्ण की वहां से साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने प्रारंभ किया और बताया कि होश पूर्वक जीने वाला व्यक्ति अपनी वाणी की पूंजी का कभी दुरुपयोग नहीं करता। वचन वह अनमोल पूंजी है जो आपको तीर्थंकर बना सकती है वहीं नरक के द्वार भी खोल सकती है। साध्वी पूनमश्री जी और साध्वी नूतन प्रभाश्री जी के प्रवचनों के बीच में साध्वी वंदनाश्री जी भजनों की ऐ...

समय अपने आप में न भूत है, न वर्तमान है, न भविष्य है : देवेंद्रसागरसूरि

पुण्य और पाप कर्म दोनों ही बांधते है। एक लोहे की जंजीर है तो एक सोने की। लोहे की जंजीर से छुटकारा पाने का मन भी करता है। लेकिन अगर जंजीर सोने की हो, तो छूटने का मन नहीं करेगा। पाप कर्म बंधन है तो पुण्यकर्म भी बंधन है। उपरोक्त बातें आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन संघ में प्रवचन देते हुए कही। उन्होंने आगे कहा कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं होता है। समय के साथ हर वस्तु बदलती रहती है तो उसके साथ मनुष्य के विचार और कार्य भी। हर इंसान की इच्छा होती है है कि उसके जीवन में सुख-शांति और आनंद स्थायी रहे, लेकिन ऐसा होता नहीं है। अगर ये चीज़ स्थायी चाहिए तो जीवन में कुछ बदलाव करने पड़ेंगे, जब आप सुख में होते हो तो इसमें एक इच्छा होती है। फिर मन करता है कि अब यह परिस्थिति बनी रहे। हमेशा सुख बना रहे। यह कामना जब मन में उत्पन्न होती है तो हम भूल जाते हैं कि परिस्थिति परिव...

दानधर्म से इतिहास बनता है, संपत्ति से नहीं: आचार्य उदयप्रभ सूरीजी

किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीजी के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने अध्यात्म कल्पद्रुम ग्रंथ के कुल सोलह अधिकार में चौदहवें अधिकार मिथ्यात्व का निरोध कैसे किया जाए, उसकी विवेचना करते हुए कहा कि मन के अंदर रहा मिथ्यात्व और साधन में रहा परिग्रह, दोनों बहुत ही दोषपूर्ण है। परिग्रह का मतलब है संपत्ति का अनावश्यक संग्रह करना। उन्होंने कहा संपत्ति खराब नहीं है, परिग्रह खराब है। संपत्ति से इतिहास नहीं बनता है, दानधर्म से इतिहास बनता है। ज्ञानियों ने परिग्रह को छोड़ने के लिए धन के ममत्व का त्याग करना बताया है। उन्होंने कहा धर्म के क्षेत्र में मिथ्यात्व सबसे बड़ा अपमानजनक शब्द है। सम्यक्त्व आने पर ही जागृति आती है। मिथ्यात्व का उन्मूलन करने का उपाय है सद्गुरु का प्रवचन श्रवण करना। सम्यक्त्व की सबसे महत्वपूर्ण परिभाषा है जिनेश...

जब तक तत्वों का बोध नहीं होता तब तक जीव मुक्त नहीं हो सकता है: जयतिलक मुनिजी

  यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने नव तत्वों का स्वरूप इस प्रकार बताया, जीव अनादिकाल से शुभ-अशुभ प्रवृत्तियाँ करते हुए आठ कर्मों का बधं करता रहता है जब तक तत्वों का बोध नहीं होता तब तक जीव मुक्त नहीं हो सकता है। जिनेश्वर देवों ने सम्पूर्ण लोक का मंथन करके सार निकाला। संसार का सार ही नव तत्व है। बाकी सब कुछ असार है। तत्वों को जान कर समझ कर आचरण करने योग्य तत्वों को धारण करो जानने योग्य तत्वों को जानो और छोड़ने योग्य तत्वों को छोड़ो। तत्व स्वरूप को जानने का लक्ष्य मोक्ष तत्व को पाना है। ज्ञानी जन कहते है परीक्षा देने की भावना जरूर रखनी चाहिए। लौकोत्तर ज्ञान की परीक्षा देने से ज्ञान प्राप्त होता है। मुख्य दो तत्व है जीव अजीव इनके साथ बोल जुड़ते है और नव तत्व के प्रकार बनते है। जो चेतना वान है सुख-दुःख का भोक्ता है वह जीव है विशेष ज्ञान का ज्ञाता है...

भाग्य व सौभाग्य में फर्क क्या?

सौभाग्य प्रकाश संयम सवर्णोत्सव चातुर्मास खाचरोद पुज्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनि जी महारासा-  *बोद्धिदाता दुःखत्राता, आनन्ददाता, सदगुरुम्* *सौभाग्य गुण सम्पन्नम् श्री सौभाग्य गुरुवे नमः ॥2॥* श्री सोभग्यमल जी महारासा आप सौभाग्य गुण से संपन्न थे? भाग्य व सौभाग्य में फर्क क्या? भाग्य-→ पाप-पुण्य का उदय, दोनों भावों का समावेश, आश्रव में दोनों का समावेश पुण्य व पाप भोगता है वह *आश्रव* तत्व दो, पदार्थ विशिष्ट 9, साथ में पूण्य व पाप को डाल दिया। *सौभाग्य* – वह भाग्य जिसमे पुण्य का उदय विशिष्ट पाप का उद‌य कम, अतिषय पुण्य लेकर जा रहा है, परम सौभाग्य का उदय था। जिसके जीवन में पुण्य ज्यादा पाप का उदय कम हो वह सौभाग्यशाली होता है। महापुरुषों के जीवन में दुःख भी सुख लेकर आता है।  वे नन्दलालजी मासा. से जुड़े और धर्म से जुडे सोभाग्यशाली।            *जन्माष्टमी* *कृष्ण महाराज* – कृष्ण वासुदेव थे...

इंसान की इच्छाएँ ही भटकाती औंर आत्मा को संसार में अटकाती है: महासती धर्मप्रभा

Sagevaani.com @चैन्नई। इंसान की इच्छाएँ ही भटकाती और आत्मा को संसार में अटकाती है। गुरूवार साहूकार पेठ के जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने सैकड़ों श्रध्दांलूओ को सम्बोधित करते हुए कहा कि इच्छाएं ही हमे भटकाती और अटकाती है और हमारे समस्त दुःखों की जड़ भी हमारी इच्छाएं ही है। जो हमारी आत्मा को संसार मे अटकाये रखती है। मनुष्य इच्छाओं के गुलाम और दास बनकर सुख नही भोग सकता है और ना हि संसार से तिर पाता है। संसार के रिश्ते केवल शरीर तक ही है, और हमारी आत्मा का रिश्ता अनंत है । फिर मनुष्य इच्छाओं का दास बनकर अपनी गति को बिगाड़ रहा है,और संसार मे भटक रहा है। इंसान के भीतर मे संसार नहीं है यह बात मनुष्य के समझ आ जाए तो वह अपनी इच्छाओं के गुलाम नहीं बन पाएगा और इच्छाओं का दमन करके संसार के भटकाव से आत्मा को मोक्ष दिला सकता है। आश्क्ति और मोह एक ऐसा बंधन है जो हमे संसार से बाहर नहीं निकलने देता है। मनुष्...

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