*क्रमांक — 477* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹गृहीत कर्म पुद्गलों का परिणामों के कारण द्विस्वभावता* *👉 ग्रहण से पूर्व तक कर्मपुद्गल शुभ अथवा अशुभ के विशेषण से विशिष्ट नहीं होते हैं। जीव उन कर्म पुद्गलों को ग्रहण करते समय ही अपने परिणाम और आश्रय की भिन्नता के कारण शीघ्र शुभ और अशुभ रूप में परिणत कर देता है। उदाहरण स्वरूप एक ही आहार धेनु (गाय) के शरीर में दूध के रूप में और सर्प के शरीर में विष के रूप में परिणत होता है अर्थात् एक ही आहार भिन्न-भिन्न जीवों में भिन्न रूप में परिणत हो जाता है। ठीक उसी प्रकार कर्म पुद्गलों का भी पुण्य और पाप रूप में परिणमन होता है।* *क्रमशः ……….. आगे की पोस्ट से जानने का प्रयास करेंगे निर्जरा के पश्चात् कर्म का स्वरूप के बारे में।* *✒️लिखने में कुछ गलती हुई हो तो तस्स मिच्छामि दुक्कडं।* विकास जैन।